मंगलवार, 28 अप्रैल 2026

318 वाँ एक शे’र गिरह-नामा: 25 अप्रैल, 2026

318 वाँ एक शे’र गिरह-नामा: 25 अप्रैल, 2026

एक‌ शे'र‌ अर्ज़ किया है’ मंच के साप्ताहिक 2 तरही मिसरों पर आधारित #डिजिटल_वीडियो_गोष्ठी का 318 वाँ तरही मुशायरा कार्यक्रम।

 आज का मुशायरा इन दो मिसरों पर आधारित था:

 635 वाँ मिसरा: 'मय ख़ाना भी वीरों है कलीसा भी हरम भी'l  

~ जुहूर नज़र 


636 वाँ मिसरा: 'मिलती नहीं हर एक को सौगात ग़मों की' ।

~ केवल कृष्ण शर्मा 

                                 *****^*****

 जायज़ा लीजिए अलग अलग ज़ावियों से इन मिसरों पर लगाई हुई गिरह का;

635 वें मिसरे:  'मय ख़ाना भी वीरों है कलीसा भी हरम भी

पर 'एक शे'र अर्ज़ किया है' के शायरों की लगाई गईं गिरह:


दौलत की हवस खा गई है सबका भरम भी
‘मय-ख़ाना भी वीराँ है कलीसा भी हरम भी’। 1 l
~अकबर शाद उदयपुरी, भारत


क्या ढूँढ़ने निकले थे सभी दश्त-ए-जुनूँ में
‘मय-ख़ाना भी वीराँ है कलीसा भी हरम भी’। 2 l
~अकबर शाद उदयपुरी, भारत


कुछ दिल ही समझ पाते हैं इस दर्द की दौलत
मिलती नहीं हर एक को सौगात ग़मों की 
~डॉ० भावना कुँअर, ऑस्ट्रेलिया


चहकी न उछल-कूद गिलहरी ने मचाई 
‘मय-ख़ाना भी वीराँ है कलीसा भी हरम भी’।
~ दिगंबर नासवा, मलेशिया


क्या रूठ के वो जा चुका हर एक जगह से 
‘मय-ख़ाना भी वीराँ है कलीसा भी हरम भी’।
~ममता 'किरण', भारत


क्या कर ली यहाँ सबने ही हद पार जुनूं की
‘मय-ख़ाना भी वीराँ है कलीसा भी हरम भी’।
~प्रेम बिहारी मिश्रा, भारत


तेरी गली में , मौला मेरे , रंग है शायद 
‘मय-ख़ाना भी वीराँ है कलीसा भी हरम भी’।
~रेनू हुसैन, भारत


महँगाई ने रक्खी है कमर तोड़ सभी की
‘मय-ख़ाना भी वीराँ है कलीसा भी हरम भी’।
~ प्रज्ञा त्रिवेदी , भारत


अफ़वाह किसी ने तो उड़ाई है शहर में
‘मय-ख़ाना भी वीराँ है कलीसा भी हरम भी’।
~के पी सक्सेना, भारत 


किस खोज में दीवानें सभी आज लगे हैं,
‘मय-ख़ाना भी वीराँ है कलीसा भी हरम भी’।
~मनोज 'अबोध', भारत


सब जा के जमा हो गए क्या दश्ते जुनूँ में
‘मय-ख़ाना भी वीराँ है कलीसा भी हरम भी’।
~सज्जाद अख्तर, भारत


खुलवाओ किसी हाल भी ईरान की खाड़ी,
‘मय-ख़ाना भी वीराँ है कलीसा भी हरम भी’।
~ अशोक सिंह, न्यूयॉर्क 


*✨*☀️**✨**


 636 वें मिसरे: 'मिलती नहीं हर एक को सौगात ग़मों की'

 पर 'एक शे'र अर्ज़ किया है' के शायरों की लगाई गईं गिरह:


हर ग़म को यही सोच के सीने से लगाया
‘मिलती नहीं हर एक को सौगात ग़मों की’।
~सज्जाद अख्तर, भारत


सहते हैं जो हँस हँस के उन्हीं पे हो इनायत
‘मिलती नहीं हर एक को सौगात ग़मों की’।
~प्रज्ञा त्रिवेदी ,भारत


हाँ सबके मुकद्दर में ये होती नहीं दौलत, 
मिलती नहीं हर एक को सौगात ग़मों की।
~अनमोल प्रकाश शुक्ला, भारत 


दो आँखें गुहरबार हैं, दिल ग़म का ख़ज़ीना 
'मिलती नहीं हर एक को सौग़ात ग़मों की' l
~डाॅ. आदेश त्यागी, भारत


रब चुनता है कुछ लोगों को देने को ये नेमत 
‘मिलती नहीं हर एक को सौगात ग़मों की’।
~ममता किरण, भारत


दिल आपको सागर की तरह चाहिए गहरा 
‘मिलती नहीं हर एक को सौगात ग़मों की’।
~ दिगंबर नासवा, मलेशिया


मुझपर तो मेहरबान रहीं ग़म की लकीरें 
‘मिलती नहीं हर एक को सौगात ग़मों की’।
~रेनू हुसैन, भारत 


ग़मग़ीन हैं तो और कहें इससे भला क्या 
‘मिलती नहीं हर एक को सौगात ग़मों की’।
~मनोज 'अबोध', भारत 


चलते रहें जो साथ में ता-उम्र हमारे,
‘मिलती नहीं हर एक को सौगात ग़मों की’।
~ अशोक सिंह , न्यू यॉर्क 


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इस कार्यक्रम का यू-ट्यूब वीडियो देखने के लिए यहाँ क्लिक करिये:


©️सर्वाधिकार सुरक्षित। इस पोस्ट में साझा किए गए सभी गिरह के शे'र 'एक शे'र अर्ज़ किया है' पटल पर शामिल शायरों के हैं। इनमें से कोई भी शे'र शायर की लिखित पूर्व सहमति के बग़ैर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है।

संपादक

~ कौसर भुट्टो, दुबई


 


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