मंगलवार, 27 जनवरी 2026

305 वाँ एक शे’र गिरह-नामा: 24 जनवरी, 2026

305 वाँ एक शे’र गिरह-नामा: 24 जनवरी, 2026

एक‌ शे'र‌ अर्ज़ किया है’ मंच के साप्ताहिक 2 तरही मिसरों पर आधारित #डिजिटल_वीडियो_गोष्ठी का 305 वाँ तरही मुशायरा कार्यक्रम।

 आज का मुशायरा इन दो मिसरों पर आधारित था:

609 वाँ मिसरा: "ख़ालिक की 'इनायत के सिवा कुछ भी नहीं है " ।
~इन' आम थानवी


610 वाँ मिसरा: "है उसका निगहबान होना ज़रूरी" ।

~ 'एक शेर कार्यशाला

                                 *****^*****

 जायज़ा लीजिए अलग अलग ज़ावियों से इन मिसरों पर लगाई हुई गिरह का;

609 वें मिसरे: 'ख़ालिक की 'इनायत के सिवा कुछ भी नहीं है' 
पर 'एक शे'र अर्ज़ किया है' के शायरों की लगाई गईं गिरह:


 इस बात से इनकार भला कौन करेगा!
‘ख़ालिक़ की 'इनायत के सिवा कुछ भी नहीं है’।
~के पी सक्सेना, भारत 


इस ग़म भरी दुनिया मे किसी दोस्त का मिलना
‘ख़ालिक़ की 'इनायत के सिवा कुछ भी नहीं है’।
~ प्रज्ञा त्रिवेदी , भारत


मिट्टी से भी इंसान बना देता है पल में 
‘ख़ालिक़ की 'इनायत के सिवा कुछ भी नहीं है’।
~संजीव दुआ, भारत


मुझको जो मयस्सर है अभी तक वो सभी कुछ
‘ख़ालिक़ की 'इनायत के सिवा कुछ भी नहीं है’।
~सज्जाद अख़्तर, भारत


राहों मे बिछे हैं जो मेरी चाँद सितारे,
‘ख़ालिक़ की 'इनायत के सिवा कुछ भी नहीं है’।
~अनमोल प्रकाश शुक्ला, भारत 


मसनद पे जो क़ाबिज़ हैं ये कुछ कूढ़मगज भी 
‘ख़ालिक़ की 'इनायत के सिवा कुछ भी नहीं है’। 1 l
~ लक्ष्मी शंकर बाजपेई, भारत


हम जैसे को ये तेरी मोहब्बत जो मिली है, 
‘ख़ालिक़ की 'इनायत के सिवा कुछ भी नहीं है’। 2 l
~ लक्ष्मी शंकर बाजपेई, भारत


इज़्ज़त, ये मुहब्बत के ज़ख़ीरे, ये मसर्रत,
‘ख़ालिक़ की 'इनायत के सिवा कुछ भी नहीं है’।
~खुर्रम नूर भारत


ये चाँद सितारों का सरे आम निकलना, 
‘ख़ालिक़ की 'इनायत के सिवा कुछ भी नहीं है’।
~रेनू हुसैन भारत


धरती पे उगे अन्न औ मेघों से गिरे जल,
‘ख़ालिक़ की 'इनायत के सिवा कुछ भी नहीं है’।
~ममता 'किरण' भारत


ये साँस की सौग़ात, ये जीवन की कहानी 
‘ख़ालिक़ की 'इनायत के सिवा कुछ भी नहीं है’।
~मनोज 'अबोध' भारत


ये कार, ये बंगला , ये नई शान, ये शौक़त 
‘ख़ालिक़ की 'इनायत के सिवा कुछ भी नहीं है’।
~रूबी मोहंती भारत


ये रहमतें, ये बरकतें,.सब्र ओ सुकूँ साँसें, 
'ख़ालिक की इनायत के सिवा कुछ भी नहीं है।
~कौसर भुट्टो, दुबई 


शामिल हूँ जो दुनिया के तमाशों में अभी तक,
‘ख़ालिक़ की 'इनायत के सिवा कुछ भी नहीं है’।
~ अशोक सिंह, न्यूयॉर्क 


*✨*☀️**✨**


 610 वें मिसरे: ‘है उसका निगहबान होना ज़रूरी’

 पर 'एक शे'र अर्ज़ किया है' के शायरों की लगाई गईं गिरह:


जो मिलना है मिल जाएगा वक्त पर सब 
‘है उसका निगहबान होना ज़रूरी’।
~ दिगंबर नासवा, मलेशिया


फ़क़त राह मिलने से मंज़िल मिली कब, 
‘है उसका निगहबान होना ज़रूरी’।
~प्रेम बिहारी मिश्रा, भारत


जो इक रूह रहती है हम सब के भीतर 
‘है उसका निगहबान होना ज़रूरी’।
~लक्ष्मी शंकर वाजपेई भारत


हरिक चीज़ होगी मयस्सर हमें फिर 
‘है उसका निगहबान होना ज़रूरी’।
~ममता किरण भारत


नज़र इक अदद तो सभी को मिली है
‘है उसका निगहबान होना ज़रूरी’।
~प्रज्ञा त्रिवेदी ,भारत


नहीं कोई ताबीज़ यूँ ही फलेगी!
‘है उसका निगहबान होना ज़रूरी’।
~के पी सक्सेना , भारत 


बियाबान जंगल के जैसी है दुनिया 
'है उसका निगहबान होना ज़रूरी' l
~रेनू हुसैन, भारत 


नहीं जीतना कोई भी जंग मुश्किल 
‘है उसका निगहबान होना ज़रूरी’।
~मनोज 'अबोध', भारत


है औक़ात इंसा की क्या,जो करे कुछ 
‘है उसका निगहबान होना ज़रूरी’।
~रूबी मोहंती, भारत


गुज़र हो दिल-ओ-जॉं से बे-फ़िक्री की तो,
‘है उसका निगहबान होना ज़रूरी’।
~ अशोक सिंह , न्यू यॉर्क 


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इस कार्यक्रम का यू-ट्यूब वीडियो देखने के लिए यहाँ क्लिक करिये:


©️सर्वाधिकार सुरक्षित। इस पोस्ट में साझा किए गए सभी गिरह के शे'र 'एक शे'र अर्ज़ किया है' पटल पर शामिल शायरों के हैं। इनमें से कोई भी शे'र शायर की लिखित पूर्व सहमति के बग़ैर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है।

संपादक

~ कौसर भुट्टो, दुबई


 


रविवार, 18 जनवरी 2026

304 वाँ एक शे’र गिरह-नामा: 17 जनवरी, 2026

304 वाँ एक शे’र गिरह-नामा: 17 जनवरी, 2026

एक‌ शे'र‌ अर्ज़ किया है’ मंच के साप्ताहिक 2 तरही मिसरों पर आधारित #डिजिटल_वीडियो_गोष्ठी का 304 वाँ तरही मुशायरा कार्यक्रम।

 आज का मुशायरा इन दो मिसरों पर आधारित था:

607 वाँ मिसरा: 'उम्र का तंग न पैमाना बनाया होता'।

~ बहादुर शाह ज़फ़र


608 वाँ मिसरा: 'बस अब तो फ़ैसले होंगें यहीं तेरे यहीं मेरे' । 
~ अंजुम ख़ालिक

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 जायज़ा लीजिए अलग अलग ज़ावियों से इन मिसरों पर लगाई हुई गिरह का;

607 वें मिसरे: 'उम्र का तंग न पैमाना बनाया होता'

पर 'एक शे'र अर्ज़ किया है' के शायरों की लगाई गईं गिरह:


इंतज़ार उनका था मंजूर क़ज़ा तक भी गर
'उम्र का तंग न पैमाना बनाया होता'। 1 ।
~ प्रज्ञा त्रिवेदी , भारत


इंतज़ार मिलने का ताउम्र भी कर लेते गर
'उम्र का तंग न पैमाना बनाया होता'। 2 ।
~ प्रज्ञा त्रिवेदी , भारत


अक़्ल ने दिल से ज़रा पहले सुना होता गर
'उम्र का तंग न पैमाना बनाया होता'।
~अकबर 'शाद' उदयपुरी, भारत


ख़्वाहिशों को जो खुले पँख दिए उड़ने के 
'उम्र का तंग न पैमाना बनाया होता'।
~ दिगंबर नासवा, मलेशिया


काम लिक्खे थे मिरे नाम जो दुनिया भर के 
'उम्र का तंग न पैमाना बनाया होता'।
~मनोज 'अबोध' भारत


मेरी ख़्वाहिश पे बिठा देना था पहरा या फिर 
'उम्र का तंग न पैमाना बनाया होता'।
~ममता 'किरण' भारत 


जुस्तजू की नहीं जब तय है हद-ए-इम्कानी,
‘उम्र का तंग न पैमाना बनाया होता’।
~ अशोक सिंह, न्यूयॉर्क 


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 608 वें मिसरे: 'बस अब तो फ़ैसले होंगें यहीं तेरे यहीं मेरे'

 पर 'एक शे'र अर्ज़ किया है' के शायरों की लगाई गईं गिरह:


चले आओ कि बैठें  रू-ब-रू होकर के  हम दोनों
'बस अब तो फ़ैसले होंगें यहीं तेरे यहीं मेरे' । 1 ।
~प्रज्ञा त्रिवेदी ,भारत


नहीं होती किताबत में कोई ग़लती कभी 'उससे '
'बस अब तो फ़ैसले होंगें यहीं तेरे यहीं मेरे' । 2 ।
~प्रज्ञा त्रिवेदी ,भारत


नहीं है कोई जन्नत दूसरी या फिर जहन्नुम ही 
'बस अब तो फ़ैसले होंगें यहीं तेरे यहीं मेरे' ।
~मनोज 'अबोध' भारत


किसी भी इक अदालत से बड़ी अपनी अदालत है 
'बस अब तो फ़ैसले होंगें यहीं तेरे यहीं मेरे' ।
~ममता 'किरण' भारत


ख़ुदा मौजूद है दुनिया में तो रोज़े क़यामत क्यों
'बस अब तो फ़ैसले होंगें यहीं तेरे यहीं मेरे' ।
~सज्जाद अख़्तर, भारत


वफ़ा किसने निभाई और किसने बेवफ़ाई की,
'बस अब तो फ़ैसले होंगें यहीं तेरे यहीं मेरे' ।
~अनमोल प्रकाश शुक्ला, भारत 


क़यामत तक न रुक पाऊँगी मैं इंसाफ़ की ख़ातिर 
‘बस अब तो फ़ैसले होंगे यहीं तेरे यहीं मेरे’ ।
~श्वेता सिंह 'उमा' रूस


मिलेगा क्या अदालत में सिवा पेशी के मेरी जॉं!
'बस अब तो फ़ैसले होंगे यहीं तेरे यहीं मेरे’।
~के पी सक्सेना , भारत 


बिताए छै यही है सातवाँ सम्बन्ध अब जानम 
'बस अब तो फ़ैसले होंगें यहीं तेरे यहीं मेरे' ।
~ दिगंबर नासवा, मलेशिया


कचहरी कोर्ट दुनिया दारी की बातें न ही आतिश,
‘बस अब तो फ़ैसले होंगे यहीं तेरे यहीं मेरे’।
~ अशोक सिंह , न्यू यॉर्क 


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संपादक

~ कौसर भुट्टो, दुबई


 


रविवार, 11 जनवरी 2026

303 वाँ एक शे’र गिरह-नामा: 10 जनवरी, 2026

303 वाँ एक शे’र गिरह-नामा: 10 जनवरी, 2026

एक‌ शे'र‌ अर्ज़ किया है’ मंच के साप्ताहिक 2 तरही मिसरों पर आधारित #डिजिटल_वीडियो_गोष्ठी का 303 वाँ तरही मुशायरा कार्यक्रम।

 आज का मुशायरा इन दो मिसरों पर आधारित था:

605 वाँ मिसरा: "हम मुद्दतों उदास रहे कुछ नहीं बना" ।
~कोमल जोविया


606 वाँ मिसरा: "आज तो रूह पे मारा है तमाचा तू ने"।
~ हिमांशी बावरा

                                 *****^*****

 जायज़ा लीजिए अलग अलग ज़ावियों से इन मिसरों पर लगाई हुई गिरह का;

605 वें मिसरे: 'हम मुद्दतों उदास रहे कुछ नहीं बना'

पर 'एक शे'र अर्ज़ किया है' के शायरों की लगाई गईं गिरह:


आ जाये फ़िक्र ओ फ़न का अदब ये ही सोचकर,
 'हम मुद्दतों उदास रहे कुछ नहीं बना'।
~ प्रज्ञा त्रिवेदी , भारत


उस बेवफ़ा ने भूल के अपनी ख़बर न ली
 'हम मुद्दतों उदास रहे कुछ नहीं बना'।
~ लक्ष्मी शंकर बाजपेई, भारत


जिसका बना हो हाथ खड़ा कर के बोल दे 
 'हम मुद्दतों उदास रहे कुछ नहीं बना'।
~ दिगंबर नासवा, मलेशिया


सारी ये कायनात हँसी जब वो हँस पड़ी,
 'हम मुद्दतों उदास रहे कुछ नहीं बना' ।
~आलोक 'अविरल', भारत


जब टूटने लगी हमारी निस्बतों की डोर,
'हम मुद्दतों उदास रहे कुछ नहीं बना' ।
~रेनू हुसैन, भारत


उनको बगैर मांगे हर इक शय हुई नसीब,
'हम मुद्दतों उदास रहे कुछ नहीं बना' । 1 l
~सज्जाद अख़्तर, भारत


साला ससुर या सास रहे कुछ नहीं बना 
'हम मुद्दतों उदास रहे कुछ नहीं बना' l 2 l
~सज्जाद अख़्तर, भारत


हर कोई आ गया तेरी दिल जोई के लिए 
'हम मुद्दतों उदास रहे कुछ नहीं बना' l 3 l
~ सज्जाद अख्तर ,भारत 


इक दिन की मयकशी में ही सब कुछ लगे अलग, 
‘हम मुद्दतों उदास रहे कुछ नहीं बना’।
~ अशोक सिंह, न्यूयॉर्क 


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 606 वें मिसरे: ‘आज तो रूह पे मारा है तमाचा तू ने’

 पर 'एक शे'र अर्ज़ किया है' के शायरों की लगाई गईं गिरह:


क़ौल पे, अहद- ए- वफ़ा पे मेरे यूँ शक करके
'आज तो रूह पे मारा है तमाचा तूने' l 1 ।
~प्रज्ञा त्रिवेदी ,भारत


बिल डिनर का कभी तुम भी तो चुकाओ , (कहकर)
'आज तो रूह पे मारा है तमाचा तूने' l 2 ।
~प्रज्ञा त्रिवेदी, भारत


बातों बातों में जो अहसान जता बैठा है,
'आज तो रूह पे मारा है तमाचा तू ने' l
~अनमोल प्रकाश शुक्ला, भारत 


छोड़ते आए थे  नादांन समझकर पहले
‘आज तो रूह पे मारा है तमाचा तू ने’।
~के पी सक्सेना , भारत 


ज़ख़्म जो तू ने दिए हैं वो दिखें भी कैसे
‘आज तो रूह पे मारा है तमाचा तू ने’।
~संजीव दुआ, भारत 


बेरुख़ी सामने ग़ैरों के नहीं ठीक सनम 
'आज तो रूह पे मारा है तमाचा तू ने' l
~ दिगंबर नासवा, मलेशिया


ज़ख़्म चेहरे का ही होता तो मैं सह भी लेता
'आज तो रूह पे मारा है तमाचा तू ने' l
~अकबर 'शाद', भारत


आज देखी है मैंने तल्ख जुबाँ तेरी भी,
'आज तो रूह पे मारा है तमाचा तूने' ।
~रेनू हुसैन, भारत 


कर के शक यूँ मेरी नीयत पे, मेरी ग़ैरत पर,
‘आज तो रूह पे मारा है तमाचा तू ने’।
~ अशोक सिंह , न्यू यॉर्क 


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©️सर्वाधिकार सुरक्षित। इस पोस्ट में साझा किए गए सभी गिरह के शे'र 'एक शे'र अर्ज़ किया है' पटल पर शामिल शायरों के हैं। इनमें से कोई भी शे'र शायर की लिखित पूर्व सहमति के बग़ैर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है।

संपादक

~ कौसर भुट्टो, दुबई


 


302 वाँ एक शे’र गिरह-नामा: 3 जनवरी , 2026

 302 वाँ एक शे’र गिरह-नामा: 3 जनवरी , 2026

एक‌ शे'र‌ अर्ज़ किया है’ मंच के साप्ताहिक 2 तरही मिसरों पर आधारित #डिजिटल_वीडियो_गोष्ठी का 302 वाँ तरही मुशायरा कार्यक्रम।

 आज का मुशायरा इन दो मिसरों पर आधारित था:

603 वाँ मिसरा: "जो सँभल कर चल रहा था रेंगता देखा गया"।
 ~ अंजुम लुधियानवी

604 वाँ मिसरा: ''तब कहीं फूल मुस्कुराते हैं" ।
~ अज़्म शाकिरी

                                 *****^*****

 जायज़ा लीजिए अलग अलग ज़ावियों से इन मिसरों पर लगाई हुई गिरह का;

603 वें मिसरे: '"जो सँभल कर चल रहा था रेंगता देखा गया"

पर 'एक शे'र अर्ज़ किया है' के शायरों की लगाई गईं गिरह:


वक्त की रफ़्तार के आगे है बेबस हर कोई,
'जो सँभल कर चल रहा था रेंगता देखा गया' l
~दिगंबर नसवा, मलेशिया 


जो भी थे बैसाखियों पर पा गए मंज़िल मगर,
‘जो सँभल कर चल रहा था रेंगता देखा गया’।
~अनमोल शुक्ल 'अनमोल' , भारत


जिसकी थी ग़लती अकड़ता ही रहा रिश्तों में वो,
‘जो सँभल कर चल रहा था रेंगता देखा गया’। 1 ।
~ प्रज्ञा त्रिवेदी , भारत


सामने तूफ़ाँ के ,बस था टिक सका दुस्साहसी,
‘जो सँभल कर चल रहा था रेंगता देखा गया’। 2 ।
~ प्रज्ञा त्रिवेदी , भारत


बार्डर पर देख दहशतगर्द को छुपते हुए ,
‘जो सँभल कर चल रहा था रेंगता देखा गया’। 1 ।
~लक्ष्मी शंकर वाजपेई, भारत 


जब शिकंजा और भी कसने लगा क़ानून का,
‘जो सँभल कर चल रहा था रेंगता देखा गया’। 2 ।
~लक्ष्मी शंकर वाजपेई, भारत 


वो था सत्ता के शिखर पर छल कपट के ज़ोर से ,
‘जो सँभल कर चल रहा था रेंगता देखा गया’।
~ममता किरण, भारत


तिकड़मों की होड़ में शकुनी के पॉंसे ही चलें,
‘जो सँभल कर चल रहा था रेंगता देखा गया’।
~के.पी. सक्सेना, भारत


एक सीधे रास्ते पर चलने वाला आदमी,
‘जो सँभल कर चल रहा था रेंगता देखा गया’।
~सज्जाद अख्तर, भारत


वाहनों और यात्रियों की बेतहाशा भीड़ में,
‘जो सँभल कर चल रहा था रेंगता देखा गया’।
~सज्जाद अख्तर, भारत


जो उसूलों को बताते थे धता वे बढ़ गए,
‘जो सँभल कर चल रहा था रेंगता देखा गया’।
~प्रेम बिहारी मिश्रा, भारत


क्या से क्या होता गया इस वक्त की रफ़्तार में ,
‘जो सँभल कर चल रहा था रेंगता देखा गया’।
`रेनू हुसैन भारत


जो परिंदा फ़िक्र से बिंदास था वो उङ गया,
'जो संभल कर चल रहा था, रेंगता देखा गया' ।
आलोक 'अविरल', भारत


फ़ाख्ता कल तक उड़ाते थे जो मन्त्री पद पे हैं,
‘जो सँभल कर चल रहा था रेंगता देखा गया’।
~ अशोक सिंह, न्यूयॉर्क 


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 604 वें मिसरे: "तब कहीं फूल मुस्कुराते हैं"

 पर 'एक शे'र अर्ज़ किया है' के शायरों की लगाई गईं गिरह:


मिट्टी सहती है कितनी तकलीफें 
'तब कहीं फूल मुस्कुराते हैं । 1 ।
~ लक्ष्मी शंकर बाजपेई, भारत


जब हिफ़ाज़त मिली हो कांटों की
'तब कहीं फूल मुस्कुराते हैं' । 2 ।
~ लक्ष्मी शंकर बाजपेई, भारत


जब पसीना बहाता है माली,
'तब कहीं फूल मुस्कुराते हैं। 1 ।
~अनमोल शुक्ल ' अनमोल' , भारत


जब मिले खाद औ हवा पानी,
'तब कहीं फूल मुस्कुराते हैं'। 2 ।
~अनमोल शुक्ल ' अनमोल' , भारत


रंग भरता है रात भर कोई 
'तब कहीं फूल मुस्कुराते हैं' ।
~ दिगंबर नासवा, मलेशिया


जब वो हँसता है खिलखिलाकर के
'तब कहीं फूल मुस्कुराते हैं' । 1 ।
~ प्रज्ञा त्रिवेदी , भारत


बीज उगता है चीरकर मिट्टी
'तब कहीं फूल मुस्कुराते हैं’। 2 ।
~ प्रज्ञा त्रिवेदी , भारत


जब वो होता है ख़ुश ज़रा सा भी
'तब कहीं फूल मुस्कुराते हैं'। 3 ।
~ प्रज्ञा त्रिवेदी , भारत


आप जब हमको याद आते हैं 
'तब कहीं फूल मुस्कुराते हैं’।
~ सज्जाद अख्तर ,भारत 


रात-दिन बागबॉं करे मेहनत 
'तब कहीं फूल मुस्कुराते हैं'।
~ममता किरण, भारत


हो कभी कातिले खिज़ाँ मौसम,
 'तब कहीं फूल मुस्कुराते हैं'। 1 ।
~प्रेम बिहारी मिश्रा, भारत


प्यार देता है जब उन्हें माली 
‘तब कहीं फूल मुस्कुराते हैं’। 2 ।
~प्रेम बिहारी मिश्रा, भारत


खाद पानी मिले मुहब्बत का
‘तब कहीं फूल मुस्कुराते हैं’। 3 ।
~प्रेम बिहारी मिश्रा, भारत


जब हिफ़ाज़त करें कई काँटे
‘तब कहीं फूल मुस्कुराते हैं’। 4 ।
~प्रेम बिहारी मिश्रा, भारत


जब मुहब्बत लुटाती है शबनम
‘तब कहीं फूल मुस्कुराते हैं’। 5 ।
~प्रेम बिहारी मिश्रा, भारत


जब बहारों का आता है मौसम 
‘तब कहीं फूल मुस्कुराते हैं’। 6 ।
~प्रेम बिहारी मिश्रा, भारत


जब भ्रमर मिल के गुनगुनाते हैं 
‘तब कहीं फूल मुस्कुराते हैं’। 7 ।
~प्रेम बिहारी मिश्रा, भारत


सौंप देता है दिल उन्हें माली
‘तब कहीं फूल मुस्कुराते हैं’। 8 ।
~प्रेम बिहारी मिश्रा, भारत


जब खिज़ाँ का वज़ूद मिट जाए
‘तब कहीं फूल मुस्कुराते हैं’। 9 ।
~प्रेम बिहारी मिश्रा, भारत


रात दिन चैन बागवां खोए
‘तब कहीं फूल मुस्कुराते हैं’। 10 ।
~प्रेम बिहारी मिश्रा, भारत


प्रेम की जब हवा चले मोहक
‘तब कहीं फूल मुस्कुराते हैं’। 11 ।
~प्रेम बिहारी मिश्रा, भारत


साथ जब आसमान देता है
'तब कहीं फूल मुस्कुराते हैं’ ।
~के पी सक्सेना, भारत


तितलियाँ चूमती हैं शरमा कर
'तब कहीं फूल मुस्कुराते हैं'।
अनिमेष शर्मा 'आतिश', भारत 


जब मुहब्बत दिलों में तारी हो,
'तब कहीं फूल मुस्कुराते हैं'।
रेनू हुसैन, भारत


साल भर धूप सहती है धरती,
'तब कहीं फूल मुस्कुराते हैं' ।
~शिव मोहन सिंह, किर्गिस्तान

भौरों की भन्न जब भनक आए, 
'तब कहीं फूल मुस्कुराते हैं’ ।
~ अशोक सिंह , न्यू यॉर्क 


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©️सर्वाधिकार सुरक्षित। इस पोस्ट में साझा किए गए सभी गिरह के शे'र 'एक शे'र अर्ज़ किया है' पटल पर शामिल शायरों के हैं। इनमें से कोई भी शे'र शायर की लिखित पूर्व सहमति के बग़ैर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है।

संपादक

~ कौसर भुट्टो, दुबई


 



301 वाँ एक शे’र गिरह-नामा: 27 दिसंबर , 2025

301 वाँ एक शे’र गिरह-नामा: 27 दिसंबर , 2025

एक‌ शे'र‌ अर्ज़ किया है’ मंच के साप्ताहिक 2 तरही मिसरों पर आधारित #डिजिटल_वीडियो_गोष्ठी का 301 वाँ तरही मुशायरा कार्यक्रम।

 आज का मुशायरा इन दो मिसरों पर आधारित था:

601 वाँ मिसरा: "अभी तलक तो ये पत्ता शजर का हिस्सा है"।
~खुशबीर सिंह 'शाद


602 वाँ मिसरा: ''सफ़र हमारा अभी गीली रहगुज़र पर है'। ~ शमीम अनवर

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 जायज़ा लीजिए अलग अलग ज़ावियों से इन मिसरों पर लगाई हुई गिरह का;

601 वें मिसरे: 'अभी तलक तो ये पत्ता शजर का हिस्सा है'

पर 'एक शे'र अर्ज़ किया है' के शायरों की लगाई गईं गिरह:


शजर के साथ अभी तक वजूद है इसका 
'अभी तलक तो ये पत्ता शजर का हिस्सा है'।
~सज्जाद अख्तर, भारत


मनाएं जश्न इसी बात का न क्यों आख़िर!
‘अभी तलक तो ये पत्ता शजर का हिस्सा है’। 1 l
~के.पी. सक्सेना, भारत


इसी ही बात पे उसको सुकून है कितना!
‘अभी तलक तो ये पत्ता शजर का हिस्सा है’। 2 l
~के.पी. सक्सेना, भारत


हुआ जो ज़र्द तो ख़ुद शाख इसे गिरा देगी 
'अभी तलक तो ये पत्ता शजर का हिस्सा है' । 1।
~लक्ष्मी शंकर वाजपेई, भारत ।


पड़ेगा छोड़ना इक दिन बगीचा दुनिया का 
‘अभी तलक तो ये पत्ता शजर का हिस्सा है’।2।
~लक्ष्मी शंकर वाजपेई, भारत ।


कभी तो छोड़ के नैहर ये ,जायेगी बेटी
‘अभी तलक तो ये पत्ता शजर का हिस्सा है’।
~ प्रज्ञा त्रिवेदी , भारत


तमाम भीड़ में खो जाना डर का हिस्सा है।
‘अभी तलक तो ये पत्ता शजर का हिस्सा है’।1।
~खुर्रम 'नूर', भारत ।


अभी कहाँ है अलग कोई शख़्सियत इसकी?
‘अभी तलक तो ये पत्ता शजर का हिस्सा है’।2।
~खुर्रम 'नूर', भारत ।


रही न कोई भी पहचान आज तक इस की,
‘अभी तलक तो ये पत्ता शजर का हिस्सा है’।3।
~खुर्रम 'नूर', भारत ।


न कुछ बिगाड़ सकेंगी ये आँधियाँ इसका,
‘अभी तलक तो ये पत्ता शजर का हिस्सा है’।4।
~खुर्रम 'नूर', भारत ।


ये जब मिलेगा अकेला तो इस को देखेंगे,
‘अभी तलक तो ये पत्ता शजर का हिस्सा है’।5।
~खुर्रम 'नूर', भारत ।


ये क्या रहेगा अलग होके देखते रहिए-
‘अभी तलक तो ये पत्ता शजर का हिस्सा है’।6।
~खुर्रम 'नूर', भारत ।


लगा है कबसे इसे तोड़ने में वो लेकिन
‘अभी तलक तो ये पत्ता शजर का हिस्सा है’।
~दिगंबर नसवा, मलेशिया ।


न जाने कब किसी आँगन में जा के गिर जाए,
‘अभी तलक तो ये पत्ता शजर का हिस्सा है’।
रमणी थापर, कैलिफोर्निया ।


अभी तलक तो है इसका वजूद दुनिया में,
‘अभी तलक तो ये पत्ता शजर का हिस्सा है’।
~मनोज 'अबोध', भारत


अभी तो फूल भी उगाएगी वही डाली,
‘अभी तलक तो ये पत्ता शजर का हिस्सा है’।
~अनमोल शुक्ल ' अनमोल' , भारत


हवा के झॉंसे में आ जाए ये न जाने कब,
‘अभी तलक तो ये पत्ता शजर का हिस्सा है’।
~ अशोक सिंह, न्यूयॉर्क 


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 602 वें मिसरे: 'सफ़र हमारा अभी गीली रहगुज़र पर है'

 पर 'एक शे'र अर्ज़ किया है' के शायरों की लगाई गईं गिरह:


न गीली आंखें बनें अपने प्यार की मंज़िल 
'सफ़र हमारा अभी गीली रहगुज़र पर है' ।
~ लक्ष्मी शंकर बाजपेई, भारत


गिरे तो हाथ बढ़ाने न आयेगा कोई 
'सफ़र हमारा अभी गीली रहगुज़र पर है' ।
~ दिगंबर नासवा, मलेशिया


ज़रा सी आग की दरकार है मुहब्बत में
'सफ़र हमारा अभी गीली रहगुज़र पर है' ।
~प्रज्ञा त्रिवेदी ,भारत


ये लड़खड़ाहटें अपनी हैं बस इसी बाइस,
'सफ़र हमारा अभी गीली रहगुज़र पर है' ।
~ सज्जाद अख्तर ,भारत 


अभी भी वक़्त है पाँओं फ़िसलना चाहें तो, 
‘सफ़र हमारा अभी गीली रहगुज़र पर है’।
~ अशोक सिंह , न्यू यॉर्क 


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इस कार्यक्रम का यू-ट्यूब वीडियो देखने के लिए यहाँ क्लिक करिये:


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संपादक

~ कौसर भुट्टो, दुबई


 


319 वाँ एक शे’र गिरह-नामा: 2 मई , 2026

319 वाँ एक शे’र गिरह-नामा: 2 मई , 2026 एक‌ शे'र‌ अर्ज़ किया है’ मंच के साप्ताहिक 2 तरही मिसरों पर आधारित #डिजिटल_वीडियो_गोष्ठी का  319 वा...