रविवार, 18 जनवरी 2026

304 वाँ एक शे’र गिरह-नामा: 17 जनवरी, 2026

304 वाँ एक शे’र गिरह-नामा: 17 जनवरी, 2026

एक‌ शे'र‌ अर्ज़ किया है’ मंच के साप्ताहिक 2 तरही मिसरों पर आधारित #डिजिटल_वीडियो_गोष्ठी का 304 वाँ तरही मुशायरा कार्यक्रम।

 आज का मुशायरा इन दो मिसरों पर आधारित था:

607 वाँ मिसरा: 'उम्र का तंग न पैमाना बनाया होता'।

~ बहादुर शाह ज़फ़र


608 वाँ मिसरा: 'बस अब तो फ़ैसले होंगें यहीं तेरे यहीं मेरे' । 
~ अंजुम ख़ालिक

                                 *****^*****

 जायज़ा लीजिए अलग अलग ज़ावियों से इन मिसरों पर लगाई हुई गिरह का;

607 वें मिसरे: 'उम्र का तंग न पैमाना बनाया होता'

पर 'एक शे'र अर्ज़ किया है' के शायरों की लगाई गईं गिरह:


इंतज़ार उनका था मंजूर क़ज़ा तक भी गर
'उम्र का तंग न पैमाना बनाया होता'। 1 ।
~ प्रज्ञा त्रिवेदी , भारत


इंतज़ार मिलने का ताउम्र भी कर लेते गर
'उम्र का तंग न पैमाना बनाया होता'। 2 ।
~ प्रज्ञा त्रिवेदी , भारत


अक़्ल ने दिल से ज़रा पहले सुना होता गर
'उम्र का तंग न पैमाना बनाया होता'।
~अकबर 'शाद' उदयपुरी, भारत


ख़्वाहिशों को जो खुले पँख दिए उड़ने के 
'उम्र का तंग न पैमाना बनाया होता'।
~ दिगंबर नासवा, मलेशिया


काम लिक्खे थे मिरे नाम जो दुनिया भर के 
'उम्र का तंग न पैमाना बनाया होता'।
~मनोज 'अबोध' भारत


मेरी ख़्वाहिश पे बिठा देना था पहरा या फिर 
'उम्र का तंग न पैमाना बनाया होता'।
~ममता 'किरण' भारत 


जुस्तजू की नहीं जब तय है हद-ए-इम्कानी,
‘उम्र का तंग न पैमाना बनाया होता’।
~ अशोक सिंह, न्यूयॉर्क 


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 608 वें मिसरे: 'बस अब तो फ़ैसले होंगें यहीं तेरे यहीं मेरे'

 पर 'एक शे'र अर्ज़ किया है' के शायरों की लगाई गईं गिरह:


चले आओ कि बैठें  रू-ब-रू होकर के  हम दोनों
'बस अब तो फ़ैसले होंगें यहीं तेरे यहीं मेरे' । 1 ।
~प्रज्ञा त्रिवेदी ,भारत


नहीं होती किताबत में कोई ग़लती कभी 'उससे '
'बस अब तो फ़ैसले होंगें यहीं तेरे यहीं मेरे' । 2 ।
~प्रज्ञा त्रिवेदी ,भारत


नहीं है कोई जन्नत दूसरी या फिर जहन्नुम ही 
'बस अब तो फ़ैसले होंगें यहीं तेरे यहीं मेरे' ।
~मनोज 'अबोध' भारत


किसी भी इक अदालत से बड़ी अपनी अदालत है 
'बस अब तो फ़ैसले होंगें यहीं तेरे यहीं मेरे' ।
~ममता 'किरण' भारत


ख़ुदा मौजूद है दुनिया में तो रोज़े क़यामत क्यों
'बस अब तो फ़ैसले होंगें यहीं तेरे यहीं मेरे' ।
~सज्जाद अख़्तर, भारत


वफ़ा किसने निभाई और किसने बेवफ़ाई की,
'बस अब तो फ़ैसले होंगें यहीं तेरे यहीं मेरे' ।
~अनमोल प्रकाश शुक्ला, भारत 


क़यामत तक न रुक पाऊँगी मैं इंसाफ़ की ख़ातिर 
‘बस अब तो फ़ैसले होंगे यहीं तेरे यहीं मेरे’ ।
~श्वेता सिंह 'उमा' रूस


मिलेगा क्या अदालत में सिवा पेशी के मेरी जॉं!
'बस अब तो फ़ैसले होंगे यहीं तेरे यहीं मेरे’।
~के पी सक्सेना , भारत 


बिताए छै यही है सातवाँ सम्बन्ध अब जानम 
'बस अब तो फ़ैसले होंगें यहीं तेरे यहीं मेरे' ।
~ दिगंबर नासवा, मलेशिया


कचहरी कोर्ट दुनिया दारी की बातें न ही आतिश,
‘बस अब तो फ़ैसले होंगे यहीं तेरे यहीं मेरे’।
~ अशोक सिंह , न्यू यॉर्क 


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इस कार्यक्रम का यू-ट्यूब वीडियो देखने के लिए यहाँ क्लिक करिये:


©️सर्वाधिकार सुरक्षित। इस पोस्ट में साझा किए गए सभी गिरह के शे'र 'एक शे'र अर्ज़ किया है' पटल पर शामिल शायरों के हैं। इनमें से कोई भी शे'र शायर की लिखित पूर्व सहमति के बग़ैर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है।

संपादक

~ कौसर भुट्टो, दुबई


 


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