एक शे'र अर्ज़ किया है’ मंच के साप्ताहिक 2 तरही मिसरों पर आधारित #डिजिटल_वीडियो_गोष्ठी का 318 वाँ तरही मुशायरा कार्यक्रम।
आज का मुशायरा इन दो मिसरों पर आधारित था:
635 वाँ मिसरा: 'मय ख़ाना भी वीरों है कलीसा भी हरम भी'l
~ जुहूर नज़र
636 वाँ मिसरा: 'मिलती नहीं हर एक को सौगात ग़मों की' ।
~ केवल कृष्ण शर्मा
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जायज़ा लीजिए अलग अलग ज़ावियों से इन मिसरों पर लगाई हुई गिरह का;
635 वें मिसरे: 'मय ख़ाना भी वीरों है कलीसा भी हरम भी
पर 'एक शे'र अर्ज़ किया है' के शायरों की लगाई गईं गिरह:
दौलत की हवस खा गई है सबका भरम भी
‘मय-ख़ाना भी वीराँ है कलीसा भी हरम भी’। 1 l
~अकबर शाद उदयपुरी, भारत
क्या ढूँढ़ने निकले थे सभी दश्त-ए-जुनूँ में
‘मय-ख़ाना भी वीराँ है कलीसा भी हरम भी’। 2 l
~अकबर शाद उदयपुरी, भारत
कुछ दिल ही समझ पाते हैं इस दर्द की दौलत
मिलती नहीं हर एक को सौगात ग़मों की
~डॉ० भावना कुँअर, ऑस्ट्रेलिया
चहकी न उछल-कूद गिलहरी ने मचाई
‘मय-ख़ाना भी वीराँ है कलीसा भी हरम भी’।
~ दिगंबर नासवा, मलेशिया
क्या रूठ के वो जा चुका हर एक जगह से
‘मय-ख़ाना भी वीराँ है कलीसा भी हरम भी’।
~ममता 'किरण', भारत
क्या कर ली यहाँ सबने ही हद पार जुनूं की
‘मय-ख़ाना भी वीराँ है कलीसा भी हरम भी’।
~प्रेम बिहारी मिश्रा, भारत
तेरी गली में , मौला मेरे , रंग है शायद
‘मय-ख़ाना भी वीराँ है कलीसा भी हरम भी’।
~रेनू हुसैन, भारत
महँगाई ने रक्खी है कमर तोड़ सभी की
‘मय-ख़ाना भी वीराँ है कलीसा भी हरम भी’।
~ प्रज्ञा त्रिवेदी , भारत
अफ़वाह किसी ने तो उड़ाई है शहर में
‘मय-ख़ाना भी वीराँ है कलीसा भी हरम भी’।
~के पी सक्सेना, भारत
किस खोज में दीवानें सभी आज लगे हैं,
‘मय-ख़ाना भी वीराँ है कलीसा भी हरम भी’।
~मनोज 'अबोध', भारत
सब जा के जमा हो गए क्या दश्ते जुनूँ में
‘मय-ख़ाना भी वीराँ है कलीसा भी हरम भी’।
~सज्जाद अख्तर, भारत
खुलवाओ किसी हाल भी ईरान की खाड़ी,
‘मय-ख़ाना भी वीराँ है कलीसा भी हरम भी’।
~ अशोक सिंह, न्यूयॉर्क
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636 वें मिसरे: 'मिलती नहीं हर एक को सौगात ग़मों की'
पर 'एक शे'र अर्ज़ किया है' के शायरों की लगाई गईं गिरह:
हर ग़म को यही सोच के सीने से लगाया
‘मिलती नहीं हर एक को सौगात ग़मों की’।
~सज्जाद अख्तर, भारत
सहते हैं जो हँस हँस के उन्हीं पे हो इनायत
‘मिलती नहीं हर एक को सौगात ग़मों की’।
~प्रज्ञा त्रिवेदी ,भारत
हाँ सबके मुकद्दर में ये होती नहीं दौलत,
मिलती नहीं हर एक को सौगात ग़मों की।
~अनमोल प्रकाश शुक्ला, भारत
दो आँखें गुहरबार हैं, दिल ग़म का ख़ज़ीना
'मिलती नहीं हर एक को सौग़ात ग़मों की' l
~डाॅ. आदेश त्यागी, भारत
रब चुनता है कुछ लोगों को देने को ये नेमत
‘मिलती नहीं हर एक को सौगात ग़मों की’।
~ममता किरण, भारत
दिल आपको सागर की तरह चाहिए गहरा
‘मिलती नहीं हर एक को सौगात ग़मों की’।
~ दिगंबर नासवा, मलेशिया
मुझपर तो मेहरबान रहीं ग़म की लकीरें
‘मिलती नहीं हर एक को सौगात ग़मों की’।
~रेनू हुसैन, भारत
ग़मग़ीन हैं तो और कहें इससे भला क्या
‘मिलती नहीं हर एक को सौगात ग़मों की’।
~मनोज 'अबोध', भारत
चलते रहें जो साथ में ता-उम्र हमारे,
‘मिलती नहीं हर एक को सौगात ग़मों की’।
~ अशोक सिंह , न्यू यॉर्क
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इस कार्यक्रम का यू-ट्यूब वीडियो देखने के लिए यहाँ क्लिक करिये:
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संपादक
~ कौसर भुट्टो, दुबई