रविवार, 23 नवंबर 2025

296 वाँ एक शे’र गिरह-नामा: 22 नवंबर , 2025

296 वाँ एक शे’र गिरह-नामा: 22 नवंबर , 2025
एक‌ शे'र‌ अर्ज़ किया है’ मंच के साप्ताहिक 2 तरही मिसरों पर आधारित #डिजिटल_वीडियो_गोष्ठी का 296 वाँ तरही मुशायरा कार्यक्रम।

 आज का मुशायरा इन दो मिसरों पर आधारित था:



 591 वाँ मिसरा: 'लुत्फ़ ये है कि हमें याद न आया कोई ।

~ नासिर काज़मी



592 वाँ मिसरा: 'पर सभी का तो घर नहीं होता'। 

~ रंजना वर्मा

                                 *****^*****

 जायज़ा लीजिए अलग अलग ज़ावियों से इन मिसरों पर लगाई हुई गिरह का;



 591 वें मिसरे: 'लुत्फ़ ये है कि हमें याद न आया कोई'

पर 'एक शे'र अर्ज़ किया है' के शायरों की लगाई गईं गिरह:

 

आठवीं बार किया इश्क़ तो कुछ गिल्ट तो था, 
'लुत्फ़ ये है कि हमें याद न आया कोई' । 1।
~ दिगंबर नासवा, मलेशिया


खा लिए और किए ढेर सितम जीवन भर ,
'लुत्फ़ ये है कि हमें याद न आया कोई' । 2 ।
~ दिगंबर नासवा, मलेशिया


हमने खा के वो बड़ा केक जो सल्टाया था,
'लुत्फ़ ये है कि हमें याद न आया कोई' । 1 ।
~ प्रज्ञा त्रिवेदी , भारत

 
उसने पूछा रहा कैसा ये सफ़र , हमने कहा,
'लुत्फ़ ये है कि हमे याद न आया कोई' । 2 ।
~ प्रज्ञा त्रिवेदी , भारत


याद आ जाते सितम तेरे, दुखाते दिल को,
'लुत्फ़ ये है कि हमें याद न आया कोई'।
~खुर्रम नूर, भारत


पाप जब पूछे फ़रिश्ते ने रोज़ ए महशर,
'लुत्फ़ ये है कि हमें याद न आया कोई' ।
~ लक्ष्मी शंकर बाजपेई, भारत


याद के प्रेत डसेंगे था यही डर लेकिन 
‘लुत्फ़ ये है कि हमें याद न आया कोई’ ।
~ मनोज अबोध, भारत 


कौन हमसे भी बुरा है ये जो सोचा हमने,
 'लुत्फ़ ये है कि हमें याद न आया कोई ।
~ आलोक अविरल, भारत 


खुद-नशीनी का भी अपना ही मज़ा है यारो,
'लुत्फ ये है कि हमें याद न आया कोई' ।
कौसर भुट्टो,  दुबई 


तन्हा जीने में मिले दर्द हज़ारों लेकिन, 
‘लुत्फ़ ये है कि हमें याद न आया कोई’।
~ अशोक सिंह, न्यूयॉर्क 


*✨*☀️**✨**


 592 वें मिसरे: 'पर सभी का तो घर नहीं होता'

 पर 'एक शे'र अर्ज़ किया है' के शायरों की लगाई गईं गिरह:


आ उतरती है बालों में चाँदी,
'पर सभी का तो घर नहीं होता' ।
~रूबी मोहंती, भारत 


जिस्म के साथ रूह थकती है,
'पर सभी का तो घर नहीं होता' ।
~ अकबर शाद 'उदयपुरी', भारत  


आसमाँ होता है जमीं होती,
'पर सभी का तो घर नहीं होता' ।
~शिव मोहन सिंह, कजाकिस्तान


है तलब उनको घर बुलाने की,
पर सभी का तो घर नहीं होता’ ।
~के पी सक्सेना, भारत


घर तो सबसे बड़ी ज़रूरत है
'पर सभी का तो घर नहीं होता' ।
~ सज्जाद अख्तर ,भारत 


जिस्म है इक मकाँ किराये का
‘पर सभी का तो घर नहीं होता’।
~मधु शर्मा, अमेरिका


कब से बेघर हैं प्यार, नेकी, वफ़ा..! 
'पर सभी का तो घर नहीं होता..!' 1 ।
~ लक्ष्मी शंकर बाजपेई, भारत


ढूंढें अशआर कितने ही मफ़हूम
'पर सभी का तो घर नहीं होता' । 2 ।
~ लक्ष्मी शंकर बाजपेई, भारत


है ये मुमकिन मकां बने सबका,
'पर सभी का तो 'घर' नहीं होता' ।
~प्रज्ञा त्रिवेदी ,भारत


यूँ ठिकाना सभी का होता है 
'पर सभी का तो घर नहीं होता' ।
~ दिगंबर नासवा, मलेशिया


एक सपना है घर बनाना भी,
 'पर सभी का तो घर नहीं होता'।
-रेणु हुसैन, भारत


यूँ हैं दुनिया में ख़ुशनसीब बहुत 
'पर सभी का तो घर नहीं होता' ।
~मनोज अबोध, भारत 


दिल की दहलीज़ पर कई आते, 
'पर सभी का तो घर नहीं होता'।
~कौसर भुट्टो, दुबई 


आते जाते मकीं हैं कितने ही,
‘पर सभी का तो घर नहीं होता’।
~ अशोक सिंह , न्यू यॉर्क 


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इस कार्यक्रम का यू-ट्यूब वीडियो देखने के लिए यहाँ क्लिक करिये:


©️सर्वाधिकार सुरक्षित। इस पोस्ट में साझा किए गए सभी गिरह के शे'र 'एक शे'र अर्ज़ किया है' पटल पर शामिल शायरों के हैं। इनमें से कोई भी शे'र शायर की लिखित पूर्व सहमति के बग़ैर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है।

संपादक

~ कौसर भुट्टो, दुबई


 


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