'एक शे'र अर्ज़ किया है' साप्ताहिक ऑनलाइन कार्यक्रम में हर हफ़्ते दिए गए दो मिसरों से बुनी गई गिरह, यही इस ब्लॉग की पहचान है। यह मंच शब्दों के उस सफ़र का दस्तावेज़ है जहाँ एहसास और रचनात्मकता मिलकर नई शायरी गढ़ते हैं। इस ब्लॉग का उद्देश्य रचनात्मक अभिव्यक्ति को साझा करना और शायरी प्रेमियों तक पहुँचना है।
रविवार, 23 नवंबर 2025
296 वाँ एक शे’र गिरह-नामा: 22 नवंबर , 2025
सोमवार, 17 नवंबर 2025
295 वाँ एक शे’र गिरह-नामा: 15 नवंबर , 2025
295 वाँ एक शे’र गिरह-नामा: 15 नवंबर , 2025
एक शे'र अर्ज़ किया है’ मंच के साप्ताहिक 2 तरही मिसरों पर आधारित #डिजिटल_वीडियो_गोष्ठी का 295 वाँ तरही मुशायरा कार्यक्रम।
आज का मुशायरा इन दो मिसरों पर आधारित था:
589 वाँ मिसरा: 'रहने दो अभी सागरो मीना मेरे आगे' ।
~मिर्ज़ा ग़ालिब
590 वाँ मिसरा: 'गुर्बत नसीब तेरे इरादे कहाँ के हैं।
~ बिसमिल देहलवी
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जायज़ा लीजिए अलग अलग ज़ावियों से इन मिसरों पर लगाई हुई गिरह का;
589 वें मिसरे: ‘रहने दो अभी सागरो मीना मेरे आगे'
पर 'एक शे'र अर्ज़ किया है' के शायरों की लगाई गईं गिरह:
सूफी हूँ भले पर ये पिलानी है सभी को
'रहने दो अभी साग़रो मीना मेरे आगे' ।
~ दिगंबर नासवा, मलेशिया
है तिश्नगी सदियों की ये आहिस्ता बुझेगी
'रहने दो अभी साग़रो मीना मेरे आगे' ।
~ प्रज्ञा त्रिवेदी , भारत
मुझको पता है बात ये अच्छी नहीं है पर،
'रहने दो अभी सागर-ओ-मीना मेरे आगे' ।
-रेणु हुसैन, भारत
ये सच है कि मयख़्वार नहीं हूं मैं मगर तुम,
'रहने दो अभी साग़र-ओ-मीना मेरे आगे'। 1 ।
~ सज्जाद अख्तर ,भारत
इतनी भी नहीं पी कभी तौबा भी नहीं की
रहने दो अभी साग़र-ओ-मीना मेरे आगे'। 2 ।
~ सज्जाद अख्तर ,भारत
बाल लीलाएं लिखीं सूर ने उस कान्हा की,
‘जिसको देखा ही न जाए, उसे देखा कैसे’ l
~ लक्ष्मी शंकर बाजपेई, भारत
सदियों की मिरी प्यास ये ऐसे न बुझेगी
'रहने दो अभी साग़रो मीना मेरे आगे' ।
~ मनोज अबोध, भारत
शायद यूँ ही हो जाय किसी शे’र की आमद,
'रहने दो अभी साग़रो मीना मेरे आगे' ।
रूबी मोहंती, भारत
है प्यास भी इतनी कि ये बुझती ही नहीं है,
' रहने दो अभी सागरो मीना मेरे आगे' ।
आलोक अविरल,.भारत
तौबा में अभी वक़्त है दो एक पहर का,
‘रहने दो अभी साग़र-ओ-मीना मीना मेरे आगे’।
~ अशोक सिंह, न्यूयॉर्क
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590 वें मिसरे: 'गुर्बत नसीब तेरे इरादे कहाँ के हैं।
~ बिसमिल देहलवी
पर 'एक शे'र अर्ज़ किया है' के शायरों की लगाई गईं गिरह:
रिश्ते चढ़े हैं भेंट सियासत की आज सब,
‘ग़ुर्बत-नसीब तेरे इरादे कहाँ के हैं’।
~प्रेम बिहारी मिश्र, भारत
राहों में ख़ाक छानते क्या कुछ नहीं किया,
'ग़ुर्बत-नसीब तेरे इरादे कहाँ के हैं' l 1 ।
~ अकबर शाद 'उदयपुरी', भारत
दीवार बन के रह गए अपने ही हौसले,
'ग़ुर्बत-नसीब तेरे इरादे कहाँ के हैं'। 2 ।
~ अकबर शाद 'उदयपुरी', भारत
मस्जिद से कुछ ग़रज़ न शिवाले की आरज़ू,
'ग़ुर्बत नसीब तेरे इरादे कहां के हैं' l
~ सज्जाद अख्तर ,भारत
बाज़ार से क्यों लाया है रस्सी ख़रीद के
'ग़ुर्बत -नसीब तेरे इरादे कहां के हैं' ।
~ लक्ष्मी शंकर बाजपेई, भारत
लाया तू ब्याह एक पुलिसवाली क्यूँ भला
'ग़ुर्बत नसीब तेरे इरादे कहाँ के हैं' ।
~प्रज्ञा त्रिवेदी ,भारत
क्यूँ रुक गया है राह में तू लक्ष्य छोड़ के
'ग़ुर्बत-नसीब तेरे इरादे कहाँ के हैं' ।
~ दिगंबर नासवा, मलेशिया
तुम चल दिए हो छोड़ मुहब्बत की राह को,
'गुर्बत नसीब तेरे इरादे कहाँ के हैं।
-रेणु हुसैन, भारत
कब तक मुझे सफ़र में ही रहना है ये बता,
'गुर्बत नसीब तेरे इरादे कहाँ के हैं'।
~आलोक अविरल
जो पास था उसे भी सफ़र में लुटा दिया
'ग़ुरबत नसीब तेरे इरादे कहाँ के हैं' ।
मनोज अबोध, भारत
ठोकर पे रख के चल रहा तक़दीर का लिखा,
‘ग़ुर्बत-नसीब तेरे इरादे कहाँ के हैं’। 1 ।
~ अशोक सिंह , न्यू यॉर्क
फैलाए रायता पड़ा हर एक ठौर पर,
‘ग़ुर्बत-नसीब तेरे इरादे कहाँ के हैं’। 2 ।
~ अशोक सिंह , न्यू यॉर्क
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इस कार्यक्रम का यू-ट्यूब वीडियो देखने के लिए यहाँ क्लिक करिये:
©️सर्वाधिकार सुरक्षित। इस पोस्ट में साझा किए गए सभी गिरह के शे'र 'एक शे'र अर्ज़ किया है' पटल पर शामिल शायरों के हैं। इनमें से कोई भी शे'र शायर की लिखित पूर्व सहमति के बग़ैर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है।
संपादक
~ कौसर भुट्टो, दुबई
मंगलवार, 11 नवंबर 2025
294 वाँ एक शे’र गिरह-नामा: 8 नवंबर , 2025
294 वाँ एक शे’र गिरह-नामा: 8 नवंबर , 2025
एक शे'र अर्ज़ किया है’ मंच के साप्ताहिक 2 तरही मिसरों पर आधारित #डिजिटल_वीडियो_गोष्ठी का 294 वाँ तरही मुशायरा कार्यक्रम।
आज का मुशायरा इन दो मिसरों पर आधारित था:
587 वाँ मिसरा: ‘काँटों से निकलना आसाँ था फूलों से निकलना मुश्किल है’।
~ इक़बाल सफ़ी पूरी
588 वाँ मिसरा: 'सामने मेरे आ के खड़ा हो गया’।
~ ज्ञान प्रकाश विवेक
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जायज़ा लीजिए अलग अलग ज़ावियों से इन मिसरों पर लगाई हुई गिरह का;
587 वें मिसरे: ‘काँटों से निकलना आसाँ था फूलों से निकलना मुश्किल है’
पर 'एक शे'र अर्ज़ किया है' के शायरों की लगाई गईं गिरह:
जीवन में मिला सुख दुख जो भी उसने ही हमें यह समझाया
'काँटों से निकलना आसाँ था फूलों से निकलना मुश्किल है' ।
~ दिगंबर नासवा, मलेशिया
अब हिज्र की राहों में मैंने मुस्कान का दामन थामा है,
'काँटों से निकलना आसाँ था फूलों से निकलना मुश्किल है' ।
~ अकबर शाद 'उदयपुरी', भारत
तुम जिस्म से दूरी कर बैठे पर रूह से निकलो तो जानें,
'काँटों से निकलना आसाँ था फूलों से निकलना मुश्किल है' ।
~ आलोक अविरल
कैसा है सफर ये कैसा छल मंज़र ने किसी रोकी राहें,
'काँटों से निकलना आसाँ था फूलों से निकलना मुश्किल है'।
कौसर भुट्टो, दुबई
जानोगे जो ख़ुद पर गुज़रेगी ख़ुशबू की हिरासत क्या होती,
‘काँटों से निकलना आसाँ था फूलों से निकलना मुश्किल है’।
~ अशोक सिंह, न्यूयॉर्क
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588 वें मिसरे:
'सामने मेरे आ के खड़ा हो गया’
पर 'एक शे'र अर्ज़ किया है' के शायरों की लगाई गईं गिरह:
जिससे बचने की माँगी दुआ रातभर,
'सामने मेरे आ के खड़ा हो गया' | 1 ।
~ अकबर शाद 'उदयपुरी', भारत
मैंने सोचा जिसे भूल जाऊँ वही
'सामने मेरे आ के खड़ा हो गया' | 2 ।
~ अकबर शाद 'उदयपुरी', भारत
जिसको चलना सिखाया था उंगली पकड़
'सामने मेरे आकर खड़ा हो गया' । 1l
-रेणु हुसैन, भारत
उसको नज़रें मिलानी थीं मुझसे तो फिर
'सामने मेरे आकर खड़ा हो गया' । 2 l
-रेणु हुसैन, भारत
मेरा माज़ी लिए गठरी यादों की ..कल
'सामने मेरे आ के खड़ा हो गया' |
~ लक्ष्मी शंकर बाजपेई, भारत
जितना चाहा सुकूँ फिर कोई मस'अला
'सामने मेरे आके खड़ा हो गया' । 1 ।
-प्रज्ञा त्रिवेदी ,भारत
जब भी की बन्द आँखें औ सोचा उसे
'सामने मेरे आके खड़ा हो गया' । 2 ।
-प्रज्ञा त्रिवेदी ,भारत
ढल के बच्चों में बचपन मेरा एक दिन
'सामने मेरे आ के खड़ा हो गया' ।
~ दिगंबर नासवा, मलेशिया
फिर हुआ ये कि हरइक मेरा कर्म भी
‘सामने मेरे आके खड़ा हो गया’ ।
~ मनोज अबोध, भारत
दर्प लड़ने को मुझसे मुझी से निकल,
'सामने मेरे आ के खड़ा हो गया' ।
~आलोक अविरल
मन जो विचलित हुआ,मेरा अंतःकरण,
सामने मेरे आके खड़ा हो गया। 1।
~खुर्रम नूर , भारत
ख़ौफ़ पाला था जो बेवजह दिल में वो,
सामने मेरे आके खड़ा हो गया। 2 ।
~खुर्रम नूर , भारत
वो जुदाई की साअ'त भरे आँखों में,
’सामने मेरे आ कर खड़ा हो गया’।
~ अशोक सिंह , न्यूयॉर्क
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इस कार्यक्रम का यू-ट्यूब वीडियो देखने के लिए यहाँ क्लिक करिये:
©️सर्वाधिकार सुरक्षित। इस पोस्ट में साझा किए गए सभी गिरह के शे'र 'एक शे'र अर्ज़ किया है' पटल पर शामिल शायरों के हैं। इनमें से कोई भी शे'र शायर की लिखित पूर्व सहमति के बग़ैर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है।
संपादक
~ कौसर भुट्टो, दुबई
सोमवार, 3 नवंबर 2025
293 वाँ एक शे’र गिरह-नामा: 1 नवंबर , 2025
293 वाँ एक शे’र गिरह-नामा: 1 नवंबर , 2025
एक शे'र अर्ज़ किया है’ मंच के साप्ताहिक 2 तरही मिसरों पर आधारित #डिजिटल_वीडियो_गोष्ठी का 293 वाँ तरही मुशायरा कार्यक्रम।
आज का मुशायरा इन दो मिसरों पर आधारित था:
585 वाँ मिसरा: ‘जिसको देखा ही न जाए, उसे देखा कैसे’।
~ अहमद नदीम क़ासमी
586 वाँ मिसरा: 'दो जिस्मों के बीच भले ही चाहे जितनी दूरी हो'।
~ अनुज अब्र
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जायज़ा लीजिए अलग अलग ज़ावियों से इन मिसरों पर लगाई हुई गिरह का;
585 वें मिसरे: ‘जिसको देखा ही न जाए, उसे देखा कैसे’
पर 'एक शे'र अर्ज़ किया है' के शायरों की लगाई गईं गिरह:
हूबहू उनको बताया तो सभी ने पूछा,
‘जिसको देखा ही न जाए, उसे देखा कैसे’ l 1 ।
~ दिगंबर नासवा, मलेशिया
खा क़सम तू न बताने की बता दूँगा मैं,
‘जिसको देखा ही न जाए, उसे देखा कैसे’ l 2 ।
~ दिगंबर नासवा, मलेशिया
रोज़ सपनों में वो आ जाता है, यूँ ही अब तो,
‘जिसको देखा ही न जाए, उसे देखा कैसे’ l
~ अकबर शाद 'उदयपुरी', भारत
मुझको इदराक ही हो जाता तेरे होने का,
‘जिसको देखा ही न जाए, उसे देखा कैसे’ l
~ प्रज्ञा त्रिवेदी , भारत
क्या कहूँ, मैं तो सराबोर हूँ इक ख़ुशबू में,
‘जिसको देखा ही न जाए, उसे देखा कैसे’ l
-रेणु हुसैन, भारत
तुमने बीमारे मुहब्बत की अयादत की है!
‘जिसको देखा ही न जाए, उसे देखा कैसे’ l
~ सज्जाद अख्तर ,भारत
बाल लीलाएं लिखीं सूर ने उस कान्हा की,
‘जिसको देखा ही न जाए, उसे देखा कैसे’ l
~ लक्ष्मी शंकर बाजपेई, भारत
पूछो हर ज़र्रे से ताबिंद अभी तक है जो,
जिसको देखा ही न जाए, उसे देखा कैसे’। 1 ।
~ अशोक सिंह, न्यूयॉर्क
सेर भर ख़ून जले उसका ख़याल आते ही,
‘जिसको देखा ही न जाए उसे देखा कैसे’। 2 ।
~ अशोक सिंह, न्यूयॉर्क
*✨*☀️**✨**
584 वें मिसरे:
'दो जिस्मों के बीच भले ही चाहे जितनी दूरी हो'
पर 'एक शे'र अर्ज़ किया है' के शायरों की लगाई गईं गिरह:
दिल से दिल का रिश्ता ही अब हम दोनों को बाँधेगा
'दो जिस्मों के बीच भले ही चाहे जितनी दूरी हो' ।
-रेणु हुसैन, भारत
दिल से दिल का तार न टूटा बस इतना ही काफी है
'दो जिस्मों के बीच भले ही चाहे जितनी दूरी हो’ ।
~ के पी सक्सेना, भारत
रूहों का मिलना ही सच में असली मिलना होता है
'दो जिस्मों के बीच भले ही चाहे जितनी दूरी हो' ।
~ लक्ष्मी शंकर बाजपेई, भारत
दिल के तारों से दिल का सन्देसा पा ही जाते हैं,
'दो जिस्मों के बीच भले ही चाहे जितनी दूरी हो' ।
-प्रज्ञा त्रिवेदी ,भारत
ख़त, चिट्ठी, ई-मेल, ख़बर, छुप कर कुछ भी हो सकता है,
'दो जिस्मों के बीच भले ही चाहे जितनी दूरी हो' ।
~ दिगंबर नासवा, मलेशिया
मीठी यादों की गरमाहट उनको ज़िंदा रखती है
'दो जिस्मों के बीच भले ही चाहे जितनी दूरी हो' ।
~ मनोज अबोध, भारत
प्यार मोहब्बत करने वाले रूह से बातें करते हैं,
'दो जिस्मों के बीच भले ही चाहे जितनी दूरी हो'।
~आलोक अविरल
कोई शग़्ल शायरी जैसा बन जाए मश्गला तो फिर,
‘दो जिस्मों के बीच भले ही चाहे जितनी दूरी हो’। 1।
~ अशोक सिंह , न्यूयॉर्क
खिलते रहें चमेली चम्पा इक दूजे की कुर्बत के,
‘दो जिस्मों के बीच भले ही चाहे जितनी दूरी हो’। 2 ।
~ अशोक सिंह , न्यूयॉर्क
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इस कार्यक्रम का यू-ट्यूब वीडियो देखने के लिए यहाँ क्लिक करिये:
©️सर्वाधिकार सुरक्षित। इस पोस्ट में साझा किए गए सभी गिरह के शे'र 'एक शे'र अर्ज़ किया है' पटल पर शामिल शायरों के हैं। इनमें से कोई भी शे'र शायर की लिखित पूर्व सहमति के बग़ैर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है।
संपादक
~ कौसर भुट्टो, दुबई
319 वाँ एक शे’र गिरह-नामा: 2 मई , 2026
319 वाँ एक शे’र गिरह-नामा: 2 मई , 2026 एक शे'र अर्ज़ किया है’ मंच के साप्ताहिक 2 तरही मिसरों पर आधारित #डिजिटल_वीडियो_गोष्ठी का 319 वा...
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285 वाँ एक शे ’ र गिरह - नामा: 06 सितंबर , 2025 एक शे ' र अर्ज़ किया है ’ मंच के साप्ताहिक 2 तरही मिसरों पर आधारित # डिजिटल _ वीडि...
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284 वाँ एक शे ’ र गिरह - नामा: 30 अगस्त , 2025 एक शे ' र अर्ज़ किया है ’ मंच के साप्ताहिक 2 तरही मिसरों पर आधारित # डिजिटल _ वीडिय...
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318 वाँ एक शे’र गिरह-नामा: 25 अप्रैल, 2026 एक शे'र अर्ज़ किया है’ मंच के साप्ताहिक 2 तरही मिसरों पर आधारित #डिजिटल_वीडियो_गोष्ठी का 318...