एक शे'र अर्ज़ किया है’ मंच के साप्ताहिक 2 तरही मिसरों पर आधारित #डिजिटल_वीडियो_गोष्ठी का 319 वाँ तरही मुशायरा कार्यक्रम।
आज का मुशायरा इन दो मिसरों पर आधारित था:
637 वाँ मिसरा: 'ये मत समझो कि वादा कर रहा हूँ'।
~जुबैर अली ताबिश' ।
638 वाँ मिसरा: 'अब ज़िंदगी की धूप में आ कर ग़ज़ल कहो'।
~ डॉ. कुँवर बेचैन।
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जायज़ा लीजिए अलग अलग ज़ावियों से इन मिसरों पर लगाई हुई गिरह का;
637 वें मिसरे: 'ये मत समझो कि वादा कर रहा हूँ'
पर 'एक शे'र अर्ज़ किया है' के शायरों की लगाई गईं गिरह:
भरोसा दें अगर अल्फ़ाज़ मेरे-
‘ये मत समझो कि वादा कर रहा हूँ’।
खुर्रम नूर, भारत
मेरी कोशिश रहेगी पूरी पूरी,
‘ये मत समझो कि वादा कर रहा हूँ’।
~अनमोल प्रकाश शुक्ला, भारत
फ़क़त कोशिश करूँगा भूलने की
'ये मत समझो कि वा'दा कर रहा हूँ' ।
~डाॅ. आदेश त्यागी, भारत
तुम्हारे ज़ह्न से और दिल से निकलूँ
'ये मत समझो कि वा'दा कर रही हूँ'l
~रेनू हुसैन, भारत
सताऊँगी न तुमको अब मैं, लेक़िन
‘ये मत समझो कि वादा कर रहा हूँ’।
~ प्रज्ञा त्रिवेदी , भारत
रहूँगा साथ यूँ तो मुश्किलों में
‘ये मत समझो कि वादा कर रहा हूँ’।
~मनोज 'अबोध', भारत
बहुत मुमकिन है वापस लौट आऊं
‘ये मत समझो कि वादा कर रहा हूँ’।
~सज्जाद अख्तर, भारत
करूँगा पूरी कोशिश आने की पर,
‘ये मत समझो कि वादा कर रहा हूँ’।
~ अशोक सिंह, न्यूयॉर्क
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638 वें मिसरे: 'अब ज़िंदगी की धूप में आ कर ग़ज़ल कहो'
पर 'एक शे'र अर्ज़ किया है' के शायरों की लगाई गईं गिरह:
कब तक करोगे शायरी कम्फर्ट ज़ोन में,
‘अब ज़िंदगी की धूप में आ कर ग़ज़ल कहो’।
~सज्जाद अख्तर, भारत
लिखते रहे हो ख़ूब ही जुल्फ़ों की छांव में
‘अब ज़िंदगी की धूप में आ कर ग़ज़ल कहो’।
~ लक्ष्मी शंकर बाजपेई, भारत
वातानुकूल कक्ष में इतरा के गाये गीत,
‘अब ज़िंदगी की धूप में आ कर ग़ज़ल कहो’।
~अनमोल प्रकाश शुक्ला, भारत
गर चाहते हो ख़ुशबू पसीने की शे'र में!
‘अब ज़िंदगी की धूप में आ कर ग़ज़ल कहो’।
~के पी सक्सेना, भारत
गाये हैं प्रेम-गीत सदा सुख की छाँव में
'अब ज़िन्दगी की धूप में आ कर ग़ज़ल कहो' l
~डाॅ. आदेश त्यागी, भारत
महफ़िल में गीत गाए हैं अब तक तो शौक से
‘अब ज़िंदगी की धूप में आ कर ग़ज़ल कहो’।
~प्रेम बिहारी मिश्रा, भारत
अब-तक कही गई है अंधेरों के बीच ही
‘अब ज़िंदगी की धूप में आ कर ग़ज़ल कहो’।
~ दिगंबर नासवा, मलेशिया
कर ही लिया है छाँह में आराम तुमने तो
‘अब ज़िंदगी की धूप में आ कर ग़ज़ल कहो’।
~रेनू हुसैन, भारत
निकलो झरोखों से भी तो हुस्न और इश्क़ के,
‘अब ज़िंदगी की धूप में आ कर ग़ज़ल कहो’।
~ कौसर भुट्टो, यूएई
गलियों में ख़ूब फिर लिए इश्क़-ए-मजाज़ी के,
‘अब ज़िंदगी की धूप में आ कर ग़ज़ल कहो’।
~ अशोक सिंह , न्यू यॉर्क
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संपादक
~ कौसर भुट्टो, दुबई