मंगलवार, 5 मई 2026

319 वाँ एक शे’र गिरह-नामा: 2 मई , 2026

319 वाँ एक शे’र गिरह-नामा: 2 मई , 2026

एक‌ शे'र‌ अर्ज़ किया है’ मंच के साप्ताहिक 2 तरही मिसरों पर आधारित #डिजिटल_वीडियो_गोष्ठी का  319 वाँ तरही मुशायरा कार्यक्रम।

 आज का मुशायरा इन दो मिसरों पर आधारित था:

 637 वाँ मिसरा: 'ये मत समझो कि वादा कर रहा हूँ'। 

~जुबैर अली ताबिश' । 


638 वाँ मिसरा:  'अब ज़िंदगी की धूप में आ कर ग़ज़ल कहो'। 

~ डॉ. कुँवर बेचैन। 

                                 *****^*****

 जायज़ा लीजिए अलग अलग ज़ावियों से इन मिसरों पर लगाई हुई गिरह का;

637 वें मिसरे:  'ये मत समझो कि वादा कर रहा हूँ'

पर 'एक शे'र अर्ज़ किया है' के शायरों की लगाई गईं गिरह:


भरोसा दें अगर अल्फ़ाज़ मेरे-
‘ये मत समझो कि वादा कर रहा हूँ’।
खुर्रम नूर, भारत


मेरी कोशिश रहेगी पूरी पूरी,
‘ये मत समझो कि वादा कर रहा हूँ’।
~अनमोल प्रकाश शुक्ला, भारत 


फ़क़त कोशिश करूँगा भूलने की 
'ये मत समझो कि वा'दा कर रहा हूँ' ।
~डाॅ. आदेश त्यागी, भारत


तुम्हारे ज़ह्न से और दिल से निकलूँ 
'ये मत समझो कि वा'दा कर रही हूँ'l
~रेनू हुसैन, भारत


सताऊँगी न तुमको अब मैं, लेक़िन
‘ये मत समझो कि वादा कर रहा हूँ’।
~ प्रज्ञा त्रिवेदी , भारत


रहूँगा साथ यूँ तो मुश्किलों में 
‘ये मत समझो कि वादा कर रहा हूँ’।
~मनोज 'अबोध', भारत


बहुत मुमकिन है वापस लौट आऊं
‘ये मत समझो कि वादा कर रहा हूँ’।
~सज्जाद अख्तर, भारत


करूँगा पूरी कोशिश आने की पर, 
‘ये मत समझो कि वादा कर रहा हूँ’।
~ अशोक सिंह, न्यूयॉर्क 


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 638 वें मिसरे:  'अब ज़िंदगी की धूप में आ कर ग़ज़ल कहो'

 पर 'एक शे'र अर्ज़ किया है' के शायरों की लगाई गईं गिरह:


कब तक करोगे शायरी कम्फर्ट ज़ोन में,
 ‘अब ज़िंदगी की धूप में आ कर ग़ज़ल कहो’।
~सज्जाद अख्तर, भारत


लिखते रहे हो ख़ूब ही जुल्फ़ों की छांव में 
‘अब ज़िंदगी की धूप में आ कर ग़ज़ल कहो’।
~ लक्ष्मी शंकर बाजपेई, भारत


वातानुकूल कक्ष में इतरा के गाये गीत,
‘अब ज़िंदगी की धूप में आ कर ग़ज़ल कहो’।
~अनमोल प्रकाश शुक्ला, भारत 


गर चाहते हो ख़ुशबू पसीने की शे'र में!
‘अब ज़िंदगी की धूप में आ कर ग़ज़ल कहो’।
~के पी सक्सेना, भारत 


गाये हैं प्रेम-गीत सदा सुख की छाँव में 
'अब ज़िन्दगी की धूप में आ कर ग़ज़ल कहो' l
~डाॅ. आदेश त्यागी, भारत


महफ़िल में गीत गाए हैं अब तक तो शौक से
‘अब ज़िंदगी की धूप में आ कर ग़ज़ल कहो’।
~प्रेम बिहारी मिश्रा, भारत


अब-तक कही गई है अंधेरों के बीच ही 
‘अब ज़िंदगी की धूप में आ कर ग़ज़ल कहो’।
~ दिगंबर नासवा, मलेशिया


कर ही लिया है छाँह में आराम तुमने तो 
‘अब ज़िंदगी की धूप में आ कर ग़ज़ल कहो’।
~रेनू हुसैन, भारत 


निकलो झरोखों से भी तो हुस्न और इश्क़ के,
‘अब ज़िंदगी की धूप में आ कर ग़ज़ल कहो’।
~ कौसर भुट्टो, यूएई


गलियों में ख़ूब फिर लिए इश्क़-ए-मजाज़ी के,
‘अब ज़िंदगी की धूप में आ कर ग़ज़ल कहो’।
~ अशोक सिंह , न्यू यॉर्क 


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©️सर्वाधिकार सुरक्षित। इस पोस्ट में साझा किए गए सभी गिरह के शे'र 'एक शे'र अर्ज़ किया है' पटल पर शामिल शायरों के हैं। इनमें से कोई भी शे'र शायर की लिखित पूर्व सहमति के बग़ैर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है।

संपादक

~ कौसर भुट्टो, दुबई


 


मंगलवार, 28 अप्रैल 2026

318 वाँ एक शे’र गिरह-नामा: 25 अप्रैल, 2026

318 वाँ एक शे’र गिरह-नामा: 25 अप्रैल, 2026

एक‌ शे'र‌ अर्ज़ किया है’ मंच के साप्ताहिक 2 तरही मिसरों पर आधारित #डिजिटल_वीडियो_गोष्ठी का 318 वाँ तरही मुशायरा कार्यक्रम।

 आज का मुशायरा इन दो मिसरों पर आधारित था:

 635 वाँ मिसरा: 'मय ख़ाना भी वीरों है कलीसा भी हरम भी'l  

~ जुहूर नज़र 


636 वाँ मिसरा: 'मिलती नहीं हर एक को सौगात ग़मों की' ।

~ केवल कृष्ण शर्मा 

                                 *****^*****

 जायज़ा लीजिए अलग अलग ज़ावियों से इन मिसरों पर लगाई हुई गिरह का;

635 वें मिसरे:  'मय ख़ाना भी वीरों है कलीसा भी हरम भी

पर 'एक शे'र अर्ज़ किया है' के शायरों की लगाई गईं गिरह:


दौलत की हवस खा गई है सबका भरम भी
‘मय-ख़ाना भी वीराँ है कलीसा भी हरम भी’। 1 l
~अकबर शाद उदयपुरी, भारत


क्या ढूँढ़ने निकले थे सभी दश्त-ए-जुनूँ में
‘मय-ख़ाना भी वीराँ है कलीसा भी हरम भी’। 2 l
~अकबर शाद उदयपुरी, भारत


कुछ दिल ही समझ पाते हैं इस दर्द की दौलत
मिलती नहीं हर एक को सौगात ग़मों की 
~डॉ० भावना कुँअर, ऑस्ट्रेलिया


चहकी न उछल-कूद गिलहरी ने मचाई 
‘मय-ख़ाना भी वीराँ है कलीसा भी हरम भी’।
~ दिगंबर नासवा, मलेशिया


क्या रूठ के वो जा चुका हर एक जगह से 
‘मय-ख़ाना भी वीराँ है कलीसा भी हरम भी’।
~ममता 'किरण', भारत


क्या कर ली यहाँ सबने ही हद पार जुनूं की
‘मय-ख़ाना भी वीराँ है कलीसा भी हरम भी’।
~प्रेम बिहारी मिश्रा, भारत


तेरी गली में , मौला मेरे , रंग है शायद 
‘मय-ख़ाना भी वीराँ है कलीसा भी हरम भी’।
~रेनू हुसैन, भारत


महँगाई ने रक्खी है कमर तोड़ सभी की
‘मय-ख़ाना भी वीराँ है कलीसा भी हरम भी’।
~ प्रज्ञा त्रिवेदी , भारत


अफ़वाह किसी ने तो उड़ाई है शहर में
‘मय-ख़ाना भी वीराँ है कलीसा भी हरम भी’।
~के पी सक्सेना, भारत 


किस खोज में दीवानें सभी आज लगे हैं,
‘मय-ख़ाना भी वीराँ है कलीसा भी हरम भी’।
~मनोज 'अबोध', भारत


सब जा के जमा हो गए क्या दश्ते जुनूँ में
‘मय-ख़ाना भी वीराँ है कलीसा भी हरम भी’।
~सज्जाद अख्तर, भारत


खुलवाओ किसी हाल भी ईरान की खाड़ी,
‘मय-ख़ाना भी वीराँ है कलीसा भी हरम भी’।
~ अशोक सिंह, न्यूयॉर्क 


*✨*☀️**✨**


 636 वें मिसरे: 'मिलती नहीं हर एक को सौगात ग़मों की'

 पर 'एक शे'र अर्ज़ किया है' के शायरों की लगाई गईं गिरह:


हर ग़म को यही सोच के सीने से लगाया
‘मिलती नहीं हर एक को सौगात ग़मों की’।
~सज्जाद अख्तर, भारत


सहते हैं जो हँस हँस के उन्हीं पे हो इनायत
‘मिलती नहीं हर एक को सौगात ग़मों की’।
~प्रज्ञा त्रिवेदी ,भारत


हाँ सबके मुकद्दर में ये होती नहीं दौलत, 
मिलती नहीं हर एक को सौगात ग़मों की।
~अनमोल प्रकाश शुक्ला, भारत 


दो आँखें गुहरबार हैं, दिल ग़म का ख़ज़ीना 
'मिलती नहीं हर एक को सौग़ात ग़मों की' l
~डाॅ. आदेश त्यागी, भारत


रब चुनता है कुछ लोगों को देने को ये नेमत 
‘मिलती नहीं हर एक को सौगात ग़मों की’।
~ममता किरण, भारत


दिल आपको सागर की तरह चाहिए गहरा 
‘मिलती नहीं हर एक को सौगात ग़मों की’।
~ दिगंबर नासवा, मलेशिया


मुझपर तो मेहरबान रहीं ग़म की लकीरें 
‘मिलती नहीं हर एक को सौगात ग़मों की’।
~रेनू हुसैन, भारत 


ग़मग़ीन हैं तो और कहें इससे भला क्या 
‘मिलती नहीं हर एक को सौगात ग़मों की’।
~मनोज 'अबोध', भारत 


चलते रहें जो साथ में ता-उम्र हमारे,
‘मिलती नहीं हर एक को सौगात ग़मों की’।
~ अशोक सिंह , न्यू यॉर्क 


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संपादक

~ कौसर भुट्टो, दुबई


 


सोमवार, 20 अप्रैल 2026

317 वाँ एक शे’र गिरह-नामा: 18 अप्रैल , 2026

317 वाँ एक शे’र गिरह-नामा: 18 अप्रैल , 2026

एक‌ शे'र‌ अर्ज़ किया है’ मंच के साप्ताहिक 2 तरही मिसरों पर आधारित #डिजिटल_वीडियो_गोष्ठी का 317 वाँ तरही मुशायरा कार्यक्रम।

 आज का मुशायरा इन दो मिसरों पर आधारित था:

633 वाँ मिसरा: 'कोई राह में आईना रख गया है'। 

~ खुमार बाराबंकवी


634 वाँ मिसरा: 'हम लोग तो दामन भी कुशादा नहीं रखते'।

~ नजीब अहमद
                                 *****^*****

 जायज़ा लीजिए अलग अलग ज़ावियों से इन मिसरों पर लगाई हुई गिरह का;

633वें मिसरे: ' 'कोई राह में आईना रख गया है'' 

पर 'एक शे'र अर्ज़ किया है' के शायरों की लगाई गईं गिरह:


वो जो भी है शैदाई है सिर्फ़ सच का,
‘कोई राह में आईना रख गया है’। 1 l
~अनमोल प्रकाश शुक्ला, भारत 


हमेशा चलो जेब में ले के कंघी,
‘कोई राह में आईना रख गया है’। 2 l
~अनमोल प्रकाश शुक्ला, भारत 


नक़ाबों की सारी तहें खुल गई हैं 
‘कोई राह में आईना रख गया है’।
~सज्जाद अख्तर, भारत


मिलाएगा कैसे वो ख़ुद से भी नज़रें
‘कोई राह में आईना रख गया है’। 1 l
~ प्रज्ञा त्रिवेदी , भारत


सम्हल के उछाला करो अब से पत्थर
‘कोई राह में आईना रख गया है’। 2 l
~ प्रज्ञा त्रिवेदी , भारत


नहीं अब है आता कोई संग मुझ तक
‘कोई राह में आईना रख गया है’। 3 l
~ प्रज्ञा त्रिवेदी , भारत


लगे मयक़दे लोग कतरा के जाने
‘कोई राह में आईना रख गया है’।
~के पी सक्सेना, भारत 


वो मंज़िल को था खेल समझे.. न सोचा
‘कोई राह में आईना रख गया है’।
~ लक्ष्मी शंकर बाजपेई, भारत


सँवरने का मौक़ा मिला है सभी को
‘कोई राह में आईना रख गया है’।
~प्रेम बिहारी मिश्रा, भारत


ख़ताएं छुपानी हुईं अब तो मुश्किल 
‘कोई राह में आईना रख गया है’।
~ममता 'किरण', भारत


न पूछो सँवर कर में आता हूँ अब क्यों 
‘कोई राह में आईना रख गया है’।
~ दिगंबर नासवा, मलेशिया


अचानक ही पत्थर उठाने लगे सब 
‘कोई राह में आईना रख गया है’।
~मनोज 'अबोध', भारत 


नहीं उस गली अब गुजरता है कोई
‘कोई राह में आईना रख गया है’।
~कौसर भुट्टो यूएई


ठिठक कुछ हँसे, कुछ ने नज़रें चुराईं,
‘कोई राह में आईना रख गया है’।
~ अशोक सिंह, न्यूयॉर्क 


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 634 वें मिसरे: 'हम लोग तो दामन भी कुशादा नहीं रखते'

 पर 'एक शे'र अर्ज़ किया है' के शायरों की लगाई गईं गिरह:


वो देने पे आए तो समेटेंगे कहां तक
‘हम लोग तो दामन भी कुशादा नहीं रखते’।
~सज्जाद अख्तर, भारत


है जानना मुश्किल ये बहुत किसके दिल में क्या,
‘हम लोग तो दामन भी कुशादा नहीं रखते’।
~अनमोल प्रकाश शुक्ला, भारत 


हर शय को समेटें भी तो किस दिल से समेटें,
'हम लोग तो दामन भी कुशादा नहीं रखते'।
~डॉ० भावना कुँअर, ऑस्ट्रेलिया


नेमत ये मुहब्बत की भला कैसे मिलेगी
‘हम लोग तो दामन भी कुशादा नहीं रखते’।
~प्रज्ञा त्रिवेदी ,भारत


रहमत यहाँ रब की तो मुसलसल ही बरसती 
‘हम लोग तो दामन भी कुशादा नहीं रखते’ l
~प्रेम बिहारी मिश्रा, भारत


दाता के ख़ज़ाना है ये कम हो नहीं सकता
 ‘हम लोग तो दामन भी कुशादा नहीं रखते’।
~रेनू हुसैन, भारत 


दावा कि खुले दिल के हैं, कहने के लिए है 
‘हम लोग तो दामन भी कुशादा नहीं रखते’।
~मनोज अबोध, भारत


खिड़की या दरीचे तो जरा दूर की शय हैं 
‘हम लोग तो दामन भी कुशादा नहीं रखते’।
~रूबी मोहंती, भारत 


इस दौर में चोरों का हुआ ख़ौफ़ है इतना 
‘हम लोग तो दामन भी कुशादा नहीं रखते’। 1 l
~ममता किरण, भारत


हम लोग सजग अपनी अना के लिए हैं ख़ूब 
‘हम लोग तो दामन भी कुशादा नहीं रखते’। 2 l
~ममता किरण, भारत


बिन माँगे ही भर देता है झोली वो सभी की,  
‘हम लोग तो दामन भी कुशादा नहीं रखते’।
~ अशोक सिंह ,न्यू यॉर्क 


****^*****


इस कार्यक्रम का यू-ट्यूब वीडियो देखने के लिए यहाँ क्लिक करिये:


©️सर्वाधिकार सुरक्षित। इस पोस्ट में साझा किए गए सभी गिरह के शे'र 'एक शे'र अर्ज़ किया है' पटल पर शामिल शायरों के हैं। इनमें से कोई भी शे'र शायर की लिखित पूर्व सहमति के बग़ैर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है।

संपादक

~ कौसर भुट्टो, दुबई


 


सोमवार, 13 अप्रैल 2026

316 वाँ एक शे’र गिरह-नामा: 11 अप्रैल, 2026

316 वाँ एक शे’र गिरह-नामा:  11 अप्रैल, 2026

एक‌ शे'र‌ अर्ज़ किया है’ मंच के साप्ताहिक 2 तरही मिसरों पर आधारित #डिजिटल_वीडियो_गोष्ठी का  316 वाँ तरही मुशायरा कार्यक्रम।

 आज का मुशायरा इन दो मिसरों पर आधारित था:

 631 वाँ मिसरा:  'जो भी करना है इसी नस्ल को करना होगा' । 

~ 'मेराज' फ़ैज़ाबादी


632 वाँ मिसरा: 'इससे बेहतर तो यही है कि भुला दो मुझको'।

~ देवीचरण कश्यप' । 


                                 *****^*****


 जायज़ा लीजिए अलग अलग ज़ावियों से इन मिसरों पर लगाई हुई गिरह का;

631 वें मिसरे:  ' जो भी करना है इसी नस्ल को करना होगा' 

पर 'एक शे'र अर्ज़ किया है' के शायरों की लगाई गईं गिरह:


जैसे हालात हैं उनसे तो यही लगता है 
‘जो भी करना है इसी नस्ल को करना होगा’।
~सज्जाद अख्तर, भारत


गैर को पाठ पढ़ाने से नही कुछ हासिल!
‘जो भी करना है इसी नस्ल को करना होगा’।
~के पी सक्सेना, भारत 


सबके मज़हब रहें महफ़ूज़ , मगर इसके लिए
‘जो भी करना है इसी नस्ल को करना होगा’।
~ प्रज्ञा त्रिवेदी , भारत


अपने खोते हुए आदाब बचाने के लिये 
'जो भी करना है इसी नस्ल को करना होगा' ।
`डा आदेश त्यागी, भारत


क्यों तको राह कोई आ के उजाला देगा
‘जो भी करना है इसी नस्ल को करना होगा’।
~ममता किरण, भारत


बात ये सदियों से हर नस्ल ही कहती आई,
‘जो भी करना है इसी नस्ल को करना होगा’।
~ अशोक सिंह, न्यूयॉर्क 


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 632 वें मिसरे: 'इससे बेहतर तो यही है कि भुला दो मुझको' 

 पर 'एक शे'र अर्ज़ किया है' के शायरों की लगाई गईं गिरह:


गुफ़्तगू से रहे महरूम अगर उल्फ़त ये
‘इससे बेहतर तो यही है कि भुला दो मुझको’।
~प्रज्ञा त्रिवेदी ,भारत


साथ देना नहीं मुमकिन है अगर उल्फ़त में
‘इससे बेहतर तो यही है कि भुला दो मुझको’।
~प्रज्ञा त्रिवेदी ,भारत


तुम को जीने ही न दें चैन से यादें मेरी 
‘इससे बेहतर तो यही है कि भुला दो मुझको’।
~लक्ष्मी शंकर बाजपेई, भारत


डर सताता है अगर इस क़दर ज़माने का
‘इससे बेहतर तो यही है कि भुला दो मुझको’।
~लक्ष्मी शंकर बाजपेई, भारत


बात नज़रों की तेरे दिल में उतर जाने लगे
‘इससे बेहतर तो यही है कि भुला दो मुझको’।
~रेनू हुसैन, भारत 


ग़म बहुत होगा तुम्हें आगे इसी माज़ी का
‘इससे बेहतर तो यही है कि भुला दो मुझको’।
~अनमोल प्रकाश शुक्ला, भारत 


शक न छूटेगा तो हर बात पे झगड़ा होगा 
‘इससे बेहतर तो यही है कि भुला दो मुझको’।
~ दिगंबर नासवा, मलेशिया


रास आने लगीं तनहाइयां यदि तुमको अब
‘इससे बेहतर तो यही है कि भुला दो मुझको’।
~प्रेम बिहारी मिश्रा, भारत


इश्क़ है तुमको मगर खौफ़ जमाने का है 
‘इससे बेहतर तो यही है कि भुला दो मुझको’।
~प्रेम बिहारी मिश्रा, भारत


नाम मेरा कहीं बदनाम न तुमको कर दे!
‘इससे बेहतर तो यही है कि भुला दो मुझको’।
~के पी सक्सेना, भारत 


अब उदासी नहीं छिप पाती है मुस्कानों में 
'इस से बेहतर तो यही है कि भुला दो मुझ को'। 1 ।
~डाॅ. आदेश त्यागी, भारत


सुनो, बरबाद न हो जाये कहीं मुस्तक़बिल 
'इस से बेहतर तो यही है कि भुला दो मुझ को'। 2 ।
~डाॅ. आदेश त्यागी, भारत


बारहा अश्क बहाने से मिलेगा क्या अब 
'इस से बेहतर तो यही है कि भुला दो मुझ को'। 3 ।
~डाॅ. आदेश त्यागी, भारत


मेरी हस्ती से फ़क़त रंज ही पहुँचेगा अब 
‘इससे बेहतर तो यही है कि भुला दो मुझको’।
~शिव मोहन, किर्गिस्तान


याद कर के मुझे क्यों ज़ख्म कुरेदो कल के
‘इससे बेहतर तो यही है कि भुला दो मुझको’।
~खुर्रम नूर, भारत


दो क़दम साथ अगर मेरे नहीं चल सकते
‘इससे बेहतर तो यही है कि भुला दो मुझको’।
~ममता किरण, भारत 


दाद-फ़रियाद करो जा-ब-जा दर -दर जा कर, 
‘इससे बेहतर तो यही है कि भुला दो मुझको’।
~ अशोक सिंह , न्यू यॉर्क 


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©️सर्वाधिकार सुरक्षित। इस पोस्ट में साझा किए गए सभी गिरह के शे'र 'एक शे'र अर्ज़ किया है' पटल पर शामिल शायरों के हैं। इनमें से कोई भी शे'र शायर की लिखित पूर्व सहमति के बग़ैर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है।

संपादक

~ कौसर भुट्टो, दुबई


 


सोमवार, 6 अप्रैल 2026

315 वाँ एक शे’र गिरह-नामा: 4 अप्रैल, 2026

315 वाँ एक शे’र गिरह-नामा: 4 अप्रैल, 2026

एक‌ शे'र‌ अर्ज़ किया है’ मंच के साप्ताहिक 2 तरही मिसरों पर आधारित #डिजिटल_वीडियो_गोष्ठी का  315 वाँ तरही मुशायरा कार्यक्रम।

 आज का मुशायरा इन दो मिसरों पर आधारित था:

 629 वाँ मिसरा: 'देखने वाले अगर बाज़ार से आगे बढ़ें'।

 ~ मधुवेश' । 


630 वाँ मिसरा:   'खुशबू तुम्हारी जुल्फ़ की फूलों से कम नहीं । 

~ अज्ञात' । 


                                 *****^*****

 जायज़ा लीजिए अलग अलग ज़ावियों से इन मिसरों पर लगाई हुई गिरह का;


629 वें मिसरे:  'देखने वाले अगर बाज़ार से आगे बढ़ें' 

पर 'एक शे'र अर्ज़ किया है' के शायरों की लगाई गईं गिरह:


दृश्य मेरे मुल्क में भी हैं ग़रीबी से इतर
 'देखने वाले अगर बाज़ार से आगे बढ़ें'।
~ प्रज्ञा त्रिवेदी , भारत


ऑन लाइन से बहुत सामान सस्ता मिल रहा,
 'देखने वाले अगर बाज़ार से आगे बढ़ें'।
~अनमोल प्रकाश शुक्ला, भारत 


हम भी दिख जाएँगे जिसको भूल पाएँगे नहीं 
 'देखने वाले अगर बाज़ार से आगे बढ़ें'।
~ दिगंबर नासवा, मलेशिया


सामने नुक्कड़ पे दिख जाएँगे ईमां बेचते 
 'देखने वाले अगर बाज़ार से आगे बढ़ें'।
~मनोज 'अबोध', भारत


पटरियों पर इस से बेहतर, इस से सस्ता माल है 
 'देखने वाले अगर बाज़ार से आगे बढ़ें'।
~डाॅ. आदेश त्यागी, भारत


हट के अब बाजार से भी हैं सुलभ चीजें बहुत!
 'देखने वाले अगर बाज़ार से आगे बढ़ें'।
~के पी सक्सेना, भारत 


ख़ूब गहरे रिश्ते भी ज़िंदा हैं बिन उपहार के 
 'देखने वाले अगर बाज़ार से आगे बढ़ें'।
~ लक्ष्मी शंकर बाजपेई, भारत


सिर्फ़ सौदे ही नहीं है ज़िंदगी की राह में
 'देखने वाले अगर बाज़ार से आगे बढ़ें'।
~डॉ० भावना कुँअर, ऑस्ट्रेलिया


फूल, तितली, पेड़, चिड़िया, चांद, तारे कितना कुछ 
 'देखने वाले अगर बाज़ार से आगे बढ़ें'।
~ममता 'किरण', भारत


क़ीमतें बाज़ारू आ जाएँ ठिकाने पर अभी,
‘देखने वाले अगर बाज़ार से आगे बढ़ें’।
~ अशोक सिंह, न्यूयॉर्क 


*✨*☀️**✨**


 630 वें मिसरे:    'ख़ुशबू तुम्हारी जुल्फ़ की फूलों से कम नहीं ।' 

 पर 'एक शे'र अर्ज़ किया है' के शायरों की लगाई गईं गिरह:


आलम हुआ है खुशनुमां गुज़रे इधर से तुम
'ख़ुशबू तुम्हारी जुल्फ़ की फूलों से कम नहीं । 1 l
~प्रेम बिहारी मिश्रा, भारत


तितली हर इक चमन से आई है दौड़ कर
'ख़ुशबू तुम्हारी जुल्फ़ की फूलों से कम नहीं । 2 l
~प्रेम बिहारी मिश्रा, भारत


मदहोश कर दिया हमें आए जो पास तुम
'ख़ुशबू तुम्हारी जुल्फ़ की फूलों से कम नहीं । 3 l
~प्रेम बिहारी मिश्रा, भारत


महका है रेशा-रेशा गुज़रे जिधर से तुम
'ख़ुशबू तुम्हारी जुल्फ़ की फूलों से कम नहीं । 4 l
~प्रेम बिहारी मिश्रा, भारत


ये विग हमें उतार के गर हो सके तो दें,
'ख़ुशबू तुम्हारी जुल्फ़ की फूलों से कम नहीं । 1 l
~अनमोल प्रकाश शुक्ला, भारत 


इस तेल का तो नाम बताओ मुझे डियर,
'ख़ुशबू तुम्हारी जुल्फ़ की फूलों से कम नहीं । 2 l
~अनमोल प्रकाश शुक्ला, भारत 


मधुमक्खियों का झुंड न ले घेर तुमको भी
'ख़ुशबू तुम्हारी जुल्फ़ की फूलों से कम नहीं । 3 l
~अनमोल प्रकाश शुक्ला, भारत 


तुम आये तो ये पूरी ही महफ़िल महक गयी 
'ख़ुशबू तुम्हारी जुल्फ़ की फूलों से कम नहीं । 1 l
~ममता किरण, भारत


तुम आये तो ये पूरी फ़ज़ा ही महक गयी 
'ख़ुशबू तुम्हारी जुल्फ़ की फूलों से कम नहीं । 2 l
~ममता किरण, भारत


कहीं ये न हो, तलाश में भँवरे निकल पड़ें 
'ख़ुशबू तुम्हारी जुल्फ़ की फूलों से कम नहीं । 
~डाॅ. आदेश त्यागी, भारत


माना कि फूल फूल है, है उसकी अहमियत
'ख़ुशबू तुम्हारी जुल्फ़ की फूलों से कम नहीं । 
~के पी सक्सेना, भारत 


खा जाएँ एकबारगी धोखा ही तितलियाँ
'ख़ुशबू तुम्हारी जुल्फ़ की फूलों से कम नहीं । 
~प्रज्ञा त्रिवेदी ,भारत


तुमको कहाँ है इत्र की दरकार जान-ए-जां
'ख़ुशबू तुम्हारी जुल्फ़ की फूलों से कम नहीं । 
~प्रज्ञा त्रिवेदी ,भारत


महके हैं रुख़ हवाओं के भी साथ में तभी
'ख़ुशबू तुम्हारी जुल्फ़ की फूलों से कम नहीं । 
~डॉ० भावना कुँअर


इक बार मुस्कुरा के इधर तुम जो देख लो,
'ख़ुशबू तुम्हारी जुल्फ़ की फूलों से कम नहीं । 
~अकबर शाद, भारत


इस बार की तो भँवरे भी तस्दीक़ कर रहे 
'ख़ुशबू तुम्हारी जुल्फ़ की फूलों से कम नहीं । 1 l
~दिगंबर नासवा, मलेशिया


जूड़े को तुमने किस से सजाया था कल सनम 
'ख़ुशबू तुम्हारी जुल्फ़ की फूलों से कम नहीं । 2 l
~दिगंबर नासवा, मलेशिया


बाँहों में भर के मुझको,कहा उसने प्यार से 
'ख़ुशबू तुम्हारी जुल्फ़ की फूलों से कम नहीं । 
~ रूबी मोहंती, भारत


मंडरा रहे हैं भंवरे शहद की तलाश में
'ख़ुशबू तुम्हारी जुल्फ़ की फूलों से कम नहीं । 
~सज्जाद अख्तर, भारत


बिस्मिल है ये फ़िज़ा भी तुम्हारे जमाल से
 ‘ख़ुशबू तुम्हारी ज़ुल्फ़ की फूलों से कम नहीं’। 1 l
~रेनू हुसैन, भारत 


क्या ही लगाओ फूल अपने गेसुओं में तुम 
 ‘ख़ुशबू तुम्हारी ज़ुल्फ़ की फूलों से कम नहीं’। 2 l
~रेनू हुसैन, भारत 


छाईं जो मेरे रुख़ पे तो महसूस यूँ हुआ-
'ख़ुशबू तुम्हारी जुल्फ़ की फूलों से कम नहीं । 
~खुर्रम नूर भारत


आँसुओं के फ़्रेम भी रक्खे दिखेंगे कुछ वहाँ 
'ख़ुशबू तुम्हारी जुल्फ़ की फूलों से कम नहीं । 
~मनोज 'अबोध', भारत 


रुखसार का ये रंग है कुदरत का मोज़िज़ा
‘ख़ुशबू तुम्हारी ज़ुल्फ़ की फूलों से कम नहीं’। 
~कौसर भुट्टो,  दुबई


गजरा चमेली बेला लगाओ भी किसलिए, 
‘ख़ुशबू तुम्हारी ज़ुल्फ़ की फूलों से कम नहीं’। 1 l
~ अशोक सिंह , न्यू यॉर्क 


होंठों पे जैसे कलियों की मुस्कान खिल रही,
‘ख़ुशबू तुम्हारी ज़ुल्फ़ की फूलों से कम नहीं’। 2 l
~ अशोक सिंह , न्यू यॉर्क 


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इस कार्यक्रम का यू-ट्यूब वीडियो देखने के लिए यहाँ क्लिक करिये:


©️सर्वाधिकार सुरक्षित। इस पोस्ट में साझा किए गए सभी गिरह के शे'र 'एक शे'र अर्ज़ किया है' पटल पर शामिल शायरों के हैं। इनमें से कोई भी शे'र शायर की लिखित पूर्व सहमति के बग़ैर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है।

संपादक

~ कौसर भुट्टो, दुबई


 


मंगलवार, 31 मार्च 2026

314 वाँ एक शे’र गिरह-नामा: 28 मार्च , 2026

314 वाँ एक शे’र गिरह-नामा: 28 मार्च , 2026

एक‌ शे'र‌ अर्ज़ किया है’ मंच के साप्ताहिक 2 तरही मिसरों पर आधारित #डिजिटल_वीडियो_गोष्ठी का  314 वाँ तरही मुशायरा कार्यक्रम।

 आज का मुशायरा इन दो मिसरों पर आधारित था:

 627 वाँ मिसरा: 'सारे जहाँ दर्द हमारे जिगर में है' । 

~अमीर' मीनाई


628 वाँ मिसरा: 'इंकार के पर्दे में इकरार नज़र आए'।

~ महेश चंद्र नक़्श' । 


                                 *****^*****


 जायज़ा लीजिए अलग अलग ज़ावियों से इन मिसरों पर लगाई हुई गिरह का;

627۔वें मिसरे:  'सारे जहाँ दर्द हमारे जिगर में है'

पर 'एक शे'र अर्ज़ किया है' के शायरों की लगाई गईं गिरह:


बम फोड़ते हैं दुनिया में और बोलते हैं ये, 
'सारे जहां का दर्द हमारे जिगर में है'।
~डॉ. आदेश त्यागी, भारत


हर इक सितम को हँस के ही सहते रहे हैं हम,
‘सारे जहाँ का दर्द हमारे जिगर में है’।
~अक़बर शाद उदयपुरी, भारत 


जज़्बात की हदों के तो क़ाइल नहीं हैं हम,
‘सारे जहाँ का दर्द हमारे जिगर में है’।
~प्रेम बिहारी मिश्रा, भारत


अपने ही ज़ख़्म का नहीं एहसास है कोई,
‘सारे जहाँ का दर्द हमारे जिगर में है’।
~ प्रज्ञा त्रिवेदी , भारत


आकर जरा करीब कभी देखिए यहां 
'सारे जहाँ का दर्द हमारे जिगर में है' ।
~नितीन उपाध्ये, दुबई


महसूस हो रहा है हमें हर किसी का ग़म,
‘सारे जहाँ का दर्द हमारे जिगर में है’।
~कौसर भुट्टो, दुबई


मअ'नी समझते दुनिया में यास-ओ-अलम के हम,
‘सारे जहाँ का दर्द हमारे जिगर में है’।
~ अशोक सिंह, न्यूयॉर्क 


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 628 वें मिसरे: ‘इंकार के पर्दे में इक़रार नज़र आए'

 पर 'एक शे'र अर्ज़ किया है' के शायरों की लगाई गईं गिरह:


ये साफ़ इशारे हैं वो जंग को रोकेंगे 
‘इंकार के पर्दे में इक़रार नज़र आए’। 1 l
~लक्ष्मी शंकर बाजपेई, भारत


मायूसियां थीं बेहद फिर वो कुछ ऐसे बोला
‘इंकार के पर्दे में इक़रार नज़र आए’। 2 l
~लक्ष्मी शंकर बाजपेई, भारत


पूछो न कोई हम से दीवानगी का आलम 
‘इंकार के पर्दे में इक़रार नज़र आए’।
~प्रेम बिहारी मिश्रा, भारत


उश्शाक़ दुआ गो हैं, माशूक़ करे कुछ यूँ 
'इंकार के पर्दे में इक़रार नज़र आये' ।
~डाॅ. आदेश त्यागी, भारत


ऐ मेरे ख़ुदा मुझको, इक ऐसी नज़र दे दे
‘इंकार के पर्दे में इक़रार नज़र आए’। 1 l
~सज्जाद अख्तर, भारत


ऐसा भी हुआ अक्सर, जब वक़्त ने करवट ली
‘इंकार के पर्दे में इक़रार नज़र आए’। 2 l
~सज्जाद अख्तर, भारत


इस दर्ज़ा भरोसा है उनपे हमे क्या कीजे
‘इंकार के पर्दे में इक़रार नज़र आए’।
~प्रज्ञा त्रिवेदी ,भारत


कुछ ऐसे तरीक़े से मुझको ये ख़बर देना 
‘इंकार के पर्दे में इक़रार नज़र आए’।
~ दिगंबर नासवा, मलेशिया


लब कुछ न कहें चाहे,आंखों की शरारत ही,
‘इंकार के पर्दे में इक़रार नज़र आए’।
~अनमोल प्रकाश शुक्ला, भारत 


उनको ही नवाज़ा है मौला ने हुनर ये भी!
‘इंकार के पर्दे में इक़रार नज़र आए’।
~के पी सक्सेना, भारत 


वो बात ही करते हैं कुछ ऐसे इशारों में 
‘इंकार के पर्दे में इक़रार नज़र आए’।
~मनोज 'अबोध', भारत 


इस दौर में भी “रूबी” हैं लोग बहुत जिनको 
‘इंकार के पर्दे में इक़रार नज़र आए’।
~रूबी मोहंती, भारत


ख़ुशफ़हमियों की हद है, इन प्यार में अंधों को,
‘इंकार के पर्दे में इक़रार नज़र आए’।
~खुर्रम नूर भारत


होंठों पे तबस्सुम है, रुख़सार पे है लाली
 ‘इंकार के पर्दे में इक़रार नज़र आए’।
~रेनू हुसैन, भारत 


ख़ुशफ़हमियों की हद है,हम प्यार में डूबों को- 
‘इंकार के पर्दे में इक़रार नज़र आए’।
~खुर्रम नूर, भारत 


देखो तो अदा उसकी देखे है हमें कैसे
‘इंकार के पर्दे में इक़रार नज़र आए’।
~आलोक अविरल, भारत


देख जो पलट कर वो हल्की सी हया करना,
‘इंकार के पर्दे में इक़रार नज़र आए’।
~कौसर भुट्टो, दुबई 


सच हो कि ग़लतफ़हमी ख़ुश हैं वो इसी में ही,
‘इंकार के पर्दे में इक़रार नज़र आए’।
~ अशोक सिंह , न्यू यॉर्क 


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इस कार्यक्रम का यू-ट्यूब वीडियो देखने के लिए यहाँ क्लिक करिये:


©️सर्वाधिकार सुरक्षित। इस पोस्ट में साझा किए गए सभी गिरह के शे'र 'एक शे'र अर्ज़ किया है' पटल पर शामिल शायरों के हैं। इनमें से कोई भी शे'र शायर की लिखित पूर्व सहमति के बग़ैर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है।

संपादक

~ कौसर भुट्टो, दुबई


 


रविवार, 22 मार्च 2026

313 वाँ एक शे’र गिरह-नामा: 21 मार्च , 2026

313 वाँ एक शे’र गिरह-नामा: 21 मार्च , 2026

एक‌ शे'र‌ अर्ज़ किया है’ मंच के साप्ताहिक 2 तरही मिसरों पर आधारित #डिजिटल_वीडियो_गोष्ठी का  313 वाँ तरही मुशायरा कार्यक्रम।

 आज का मुशायरा इन दो मिसरों पर आधारित था:

 625 वाँ मिसरा: 'मेरी आँखों में कई गुज़रे ज़माने आए' । 

~ गोविंद गुलशन' 


626 वाँ मिसरा: 'मैं भी अपने ज़ख़्म छुपाने वाला था'। 

~ परवीन कुमार अश्क़। 


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 जायज़ा लीजिए अलग अलग ज़ावियों से इन मिसरों पर लगाई हुई गिरह का;

625 वें मिसरे:  'मेरी आँखों में कई गुज़रे ज़माने आए ' 

पर 'एक शे'र अर्ज़ किया है' के शायरों की लगाई गईं गिरह:


फिल्म हो जैसे कोई.. तेरी पुरानी चिठ्ठी..!
‘मेरी आँखों में कई गुज़रे ज़माने आए’।
~ लक्ष्मी शंकर बाजपेई, भारत


उसने पूछा मुझे तुम कौन मेरे लगते हो
‘मेरी आँखों में कई गुज़रे ज़माने आए’।
~ प्रज्ञा त्रिवेदी , भारत


उस हवेली पे पड़े ज्यों ही क़दम थे मेरे
‘मेरी आँखों में कई गुज़रे ज़माने आए’।
~ममता 'किरण', भारत


पार्क से प्यार में डूबा हुआ जोङा निकला, 
‘मेरी आँखों में कई गुज़रे ज़माने आए’।
~अनमोल प्रकाश शुक्ला, भारत 


लौट परदेस से छूते ही वतन की सरहद।  
‘मेरी आँखों में कई गुज़रे ज़माने आए’।
~के पी सक्सेना, भारत 


जब भी आया है तेरा ज़िक्र किसी महफ़िल में 
‘मेरी आँखों में कई गुज़रे ज़माने आए’।
~सज्जाद अख्तर, भारत


एक यादों का बवण्डर मेरे दिल से गुज़रा 
'मेरी आँखों में कई गुज़रे ज़माने आये' ।
~डाॅ. आदेश त्यागी, भारत


तुझको देखा जो अचानक मैंने तस्वीरों में
‘मेरी आँखों में कई गुज़रे ज़माने आए’।
~रेनू हुसैन, भारत


तेरी यादों ने जो दिल पर कभी दस्तक दी तो
‘मेरी आँखों में कई गुज़रे ज़माने आए’।
~अकबर शाद, भारत


बादलों को उड़ा कर ले गई जब कोई हवा
मेरी आँखों में कई गुज़रे ज़माने आए’।
~प्रेम बिहारी मिश्रा, भारत


हूबहू तुझसी नज़र आई थी कल सड़कों पर
मेरी आँखों में कई गुज़रे ज़माने आए’।
~ दिगंबर नासवा, मलेशिया 


मुद्दतों बाद दिखा फ़ोन में उसका नम्बर 
मेरी आँखों में कई गुज़रे ज़माने आए’।
~मनोज 'अबोध', भारत


एक तूफ़ान उठा, धूल उड़ी चौतरफ़ा 
मेरी आँखों में कई गुज़रे ज़माने आए’।
~रूबी मोहंती, भारत


उसकी तस्वीर पुरानी मिली संदूक में तो,
मेरी आँखों में कई गुज़रे ज़माने आए’।
~ अशोक सिंह, न्यूयॉर्क 


*✨*☀️**✨**


 626 वें मिसरे: 'मैं भी अपने ज़ख़्म छुपाने वाला था'।  

 पर 'एक शे'र अर्ज़ किया है' के शायरों की लगाई गईं गिरह 


उससे मिलकर बांध ज़ब्त का टूट गया 
'मैं भी अपने ज़ख़्म छुपाने वाला था'। 
~लक्ष्मी शंकर बाजपेई, भारत


क्या करता दिखलाकर आखिर दुनिया को,
'मैं भी अपने ज़ख़्म छुपाने वाला था'। 
~अनमोल प्रकाश शुक्ला, भारत 


तुमने भी तो ज़ब्त किये थे अपने ग़म
'मैं भी अपने ज़ख़्म छुपाने वाला था'। 
~के पी सक्सेना, भारत 


उस ने भी ख़ुद दुख की पर्दादारी की 
'मैं भी अपने ज़ख़्म छुपाने वाला था' l
~डाॅ. आदेश त्यागी, भारत


वह अपना दर्द बताते झिझक रही थी 
'मैं भी अपने ज़ख़्म छुपाने वाला था'। 
~प्रेम बिहारी मिश्रा, भारत


उससे मिलने की चाहत में मुद्दत बाद 
'मैं भी अपने ज़ख़्म छुपाने वाला थी  '। 
~ममता किरण, भारत


पगली अपना प्रेम छुपाने वाली थी,.
'मैं भी अपने ज़ख़्म छुपाने वाला था'। 
~ दिगंबर नासवा, मलेशिया


वह अपना दर्द बताते झिझक रही थी
'मैं भी अपने ज़ख़्म छुपाने वाला था'। 
प्रेम बिहारी मिश्रा, भारत


वो ही क्या चिंतित था अपनी चोटों से 
'मैं भी अपने ज़ख़्म छुपाने वाला था'। 
~मनोज 'अबोध', भारत 


वो तो ख़ुशी छुपाए बैठा था अपनी,
‘मैं भी अपने ज़ख़्म छुपाने वाला था’।
~ अशोक सिंह , न्यू यॉर्क 


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इस कार्यक्रम का यू-ट्यूब वीडियो देखने के लिए यहाँ क्लिक करिये:


©️सर्वाधिकार सुरक्षित। इस पोस्ट में साझा किए गए सभी गिरह के शे'र 'एक शे'र अर्ज़ किया है' पटल पर शामिल शायरों के हैं। इनमें से कोई भी शे'र शायर की लिखित पूर्व सहमति के बग़ैर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है।

संपादक

~ कौसर भुट्टो, दुबई


 


319 वाँ एक शे’र गिरह-नामा: 2 मई , 2026

319 वाँ एक शे’र गिरह-नामा: 2 मई , 2026 एक‌ शे'र‌ अर्ज़ किया है’ मंच के साप्ताहिक 2 तरही मिसरों पर आधारित #डिजिटल_वीडियो_गोष्ठी का  319 वा...