मंगलवार, 5 मई 2026

319 वाँ एक शे’र गिरह-नामा: 2 मई , 2026

319 वाँ एक शे’र गिरह-नामा: 2 मई , 2026

एक‌ शे'र‌ अर्ज़ किया है’ मंच के साप्ताहिक 2 तरही मिसरों पर आधारित #डिजिटल_वीडियो_गोष्ठी का  319 वाँ तरही मुशायरा कार्यक्रम।

 आज का मुशायरा इन दो मिसरों पर आधारित था:

 637 वाँ मिसरा: 'ये मत समझो कि वादा कर रहा हूँ'। 

~जुबैर अली ताबिश' । 


638 वाँ मिसरा:  'अब ज़िंदगी की धूप में आ कर ग़ज़ल कहो'। 

~ डॉ. कुँवर बेचैन। 

                                 *****^*****

 जायज़ा लीजिए अलग अलग ज़ावियों से इन मिसरों पर लगाई हुई गिरह का;

637 वें मिसरे:  'ये मत समझो कि वादा कर रहा हूँ'

पर 'एक शे'र अर्ज़ किया है' के शायरों की लगाई गईं गिरह:


भरोसा दें अगर अल्फ़ाज़ मेरे-
‘ये मत समझो कि वादा कर रहा हूँ’।
खुर्रम नूर, भारत


मेरी कोशिश रहेगी पूरी पूरी,
‘ये मत समझो कि वादा कर रहा हूँ’।
~अनमोल प्रकाश शुक्ला, भारत 


फ़क़त कोशिश करूँगा भूलने की 
'ये मत समझो कि वा'दा कर रहा हूँ' ।
~डाॅ. आदेश त्यागी, भारत


तुम्हारे ज़ह्न से और दिल से निकलूँ 
'ये मत समझो कि वा'दा कर रही हूँ'l
~रेनू हुसैन, भारत


सताऊँगी न तुमको अब मैं, लेक़िन
‘ये मत समझो कि वादा कर रहा हूँ’।
~ प्रज्ञा त्रिवेदी , भारत


रहूँगा साथ यूँ तो मुश्किलों में 
‘ये मत समझो कि वादा कर रहा हूँ’।
~मनोज 'अबोध', भारत


बहुत मुमकिन है वापस लौट आऊं
‘ये मत समझो कि वादा कर रहा हूँ’।
~सज्जाद अख्तर, भारत


करूँगा पूरी कोशिश आने की पर, 
‘ये मत समझो कि वादा कर रहा हूँ’।
~ अशोक सिंह, न्यूयॉर्क 


*✨*☀️**✨**


 638 वें मिसरे:  'अब ज़िंदगी की धूप में आ कर ग़ज़ल कहो'

 पर 'एक शे'र अर्ज़ किया है' के शायरों की लगाई गईं गिरह:


कब तक करोगे शायरी कम्फर्ट ज़ोन में,
 ‘अब ज़िंदगी की धूप में आ कर ग़ज़ल कहो’।
~सज्जाद अख्तर, भारत


लिखते रहे हो ख़ूब ही जुल्फ़ों की छांव में 
‘अब ज़िंदगी की धूप में आ कर ग़ज़ल कहो’।
~ लक्ष्मी शंकर बाजपेई, भारत


वातानुकूल कक्ष में इतरा के गाये गीत,
‘अब ज़िंदगी की धूप में आ कर ग़ज़ल कहो’।
~अनमोल प्रकाश शुक्ला, भारत 


गर चाहते हो ख़ुशबू पसीने की शे'र में!
‘अब ज़िंदगी की धूप में आ कर ग़ज़ल कहो’।
~के पी सक्सेना, भारत 


गाये हैं प्रेम-गीत सदा सुख की छाँव में 
'अब ज़िन्दगी की धूप में आ कर ग़ज़ल कहो' l
~डाॅ. आदेश त्यागी, भारत


महफ़िल में गीत गाए हैं अब तक तो शौक से
‘अब ज़िंदगी की धूप में आ कर ग़ज़ल कहो’।
~प्रेम बिहारी मिश्रा, भारत


अब-तक कही गई है अंधेरों के बीच ही 
‘अब ज़िंदगी की धूप में आ कर ग़ज़ल कहो’।
~ दिगंबर नासवा, मलेशिया


कर ही लिया है छाँह में आराम तुमने तो 
‘अब ज़िंदगी की धूप में आ कर ग़ज़ल कहो’।
~रेनू हुसैन, भारत 


निकलो झरोखों से भी तो हुस्न और इश्क़ के,
‘अब ज़िंदगी की धूप में आ कर ग़ज़ल कहो’।
~ कौसर भुट्टो, यूएई


गलियों में ख़ूब फिर लिए इश्क़-ए-मजाज़ी के,
‘अब ज़िंदगी की धूप में आ कर ग़ज़ल कहो’।
~ अशोक सिंह , न्यू यॉर्क 


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इस कार्यक्रम का यू-ट्यूब वीडियो देखने के लिए यहाँ क्लिक करिये:


©️सर्वाधिकार सुरक्षित। इस पोस्ट में साझा किए गए सभी गिरह के शे'र 'एक शे'र अर्ज़ किया है' पटल पर शामिल शायरों के हैं। इनमें से कोई भी शे'र शायर की लिखित पूर्व सहमति के बग़ैर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है।

संपादक

~ कौसर भुट्टो, दुबई


 


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