गुरुवार, 30 जुलाई 2026

331 वाँ सप्ताह एक शे’र गिरह-नामा: 25 जुलाई , 2026

331 वाँ सप्ताह एक शे’र गिरह-नामा: 25 जुलाई , 2026

एक‌ शे'र‌ अर्ज़ किया है’ मंच के साप्ताहिक 2 तरही मिसरों पर आधारित 331 वाँ साप्ताहिक गिरह-नामा।

 आज का मुशायरा इन दो मिसरों पर आधारित था:

661 वाँ मिसरा: 'हम आज तक वो चोट हैं दिल पर लिए हुए'।

~ 'असगर' गोंडवी


 662 वाँ मिसरा: 'यूँ सताने की तो आदत मिरे घनश्याम की थी'। 

~ परवीन शाकिर
                                 *****^*****

 जायज़ा लीजिए अलग अलग ज़ावियों से इन मिसरों पर लगाई हुई गिरह का;

 661 वें मिसरे: 'हम आज तक वो चोट हैं दिल पर लिए हुए'

पर 'एक शे'र अर्ज़ किया है' के शायरों की लगाई गईं गिरह:


जिसका हुआ था उनको कभी इल्म तक नहीं
‘हम आज तक वो चोट हैं दिल पर लिए हुए’।
~ प्रज्ञा त्रिवेदी , भारत


कड़वे तुम्हारे बोलों ने दिल छलनी जो किया 
‘हम आज तक वो चोट हैं दिल पर लिए हुए’।
~लक्ष्मी शंकर बाजपेई, भारत


मारी जो तू ने तान के ता'नों के तीर से 
'हम आज तक वो चोट हैं दिल पर लिये हुए'।
~डाॅ. आदेश त्यागी, भारत


थामा था हाथ ग़ैर का जब मेरे सामने 
‘हम आज तक वो चोट हैं दिल पर लिए हुए’।
~मनोज 'अबोध', भारत


उल्फ़त से दूर तुम तो गए कारोबार में,
‘हम आज तक वो चोट हैं दिल पर लिए हुए’।
~ अशोक सिंह, न्यूयॉर्क 


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 662 वें मिसरे: 'यूँ सताने की तो आदत मिरे घनश्याम की थी'

 पर 'एक शे'र अर्ज़ किया है' के शायरों की लगाई गईं गिरह:


किसने माखन ये उड़ेला है मेरी मटकी से 
‘यूँ सताने की तो आदत मिरे घनश्याम की थी’।
~ दिगंबर नासवा, मलेशिया


छेड़ के मुरली मुझे किसने किया है बेसुध 
‘यूँ सताने की तो आदत मिरे घनश्याम की थी’।
~ दिगंबर नासवा, मलेशिया


कंकरी मार के छुप जाना कहाँ से सीखा!
‘यूँ सताने की तो आदत मिरे घनश्याम की थी’।
~प्रज्ञा त्रिवेदी ,भारत


ले उधारी हो गए हो जो रफू चक्कर तुम 
‘यूँ सताने की तो आदत मिरे घनश्याम की थी’।
~प्रज्ञा त्रिवेदी ,भारत


आज ये किसने खिजाया, कहा टी ली ली झर 
‘यूँ सताने की तो आदत मिरे घनश्याम की थी’।
~डाॅ. आदेश त्यागी, भारत


रू-ब-रू आना कभी हँसना कभी छिप जाना 
‘यूँ सताने की तो आदत मिरे घनश्याम की थी’।
~रेनू हुसैन, भारत


तुमने वादा था किया फिर भी नहीं आये तुम 
‘यूँ सताने की तो आदत मिरे घनश्याम की थी’।
~ममता किरण, भारत


तट से जमुना जी के ले कौन गया वस्त्र मेरे, 
‘यूँ सताने की तो आदत मिरे घनश्याम की थी’।
~ अशोक सिंह , न्यू यॉर्क 


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©️सर्वाधिकार सुरक्षित। इस पोस्ट में साझा किए गए सभी गिरह के शे'र 'एक शे'र अर्ज़ किया है' पटल पर शामिल शायरों के हैं। इनमें से कोई भी शे'र शायर की लिखित पूर्व सहमति के बग़ैर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है।

संपादक

~ कौसर भुट्टो, दुबई


 


330 वाँ सप्ताह एक शे’र गिरह-नामा: 18 जुलाई , 2026

330 वाँ सप्ताह एक शे’र गिरह-नामा: 18 जुलाई , 2026

एक‌ शे'र‌ अर्ज़ किया है’ मंच के साप्ताहिक 2 तरही मिसरों पर आधारित 330 वाँ सप्ताह गिरह-नामा।

 आज का मुशायरा इन दो मिसरों पर आधारित था:

659 वाँ मिसरा: 'कौन ऐसे में  मुझे शम्अ जलाने देगा'।

~ वसीम बरेलवी


 660 वाँ मिसरा: 'मैं ख़ाक हो के भी इसी चक्कर में क़ैद हूँ'।

 ~ ताहिर तिलहरी
                                 *****^*****

 जायज़ा लीजिए अलग अलग ज़ावियों से इन मिसरों पर लगाई हुई गिरह का;

 659 वें मिसरे:  'कौन ऐसे में मुझे शम्अ जलाने देगा'

पर 'एक शे'र अर्ज़ किया है' के शायरों की लगाई गईं गिरह:


सब ने मुट्ठी में हवाओं को छुपा रक्खा है
'कौन ऐसे में  मुझे शम्अ जलाने देगा'।
~सज्जाद अख्तर, भारत


सब लिए बैठे हैं हाथों में टमाटर अंडे,
'कौन ऐसे में  मुझे शम्अ जलाने देगा'।
~अनमोल प्रकाश शुक्ला, भारत 


चमचमाते हुए रंगीन उजाले हैं जब
'कौन ऐसे में  मुझे शम्अ जलाने देगा'।
~ममता 'किरण', भारत


पूरी बस्ती है अँधेरों की हिमायत वाली 
'कौन ऐसे में  मुझे शम्अ जलाने देगा'।
~मनोज 'अबोध', भारत


हर किसी में है यहाँ ख़ूब चमक सूरज सी
'कौन ऐसे में  मुझे शम्अ जलाने देगा'।
~ प्रज्ञा त्रिवेदी , भारत


रौशनी बाँटने वालों पे नज़र रहती है,
'कौन ऐसे में  मुझे शम्अ जलाने देगा'।
~अकबर शाद 'उदयपुरी' भारत


हो चुके हैं सभी तारीक शबों के आदी
'कौन ऐसे में मुझे शम्अ जलाने देगा' ।
~डाॅ. आदेश त्यागी, भारत


आग के नाम से अब दिल ही दहल जाते हैं..
‘कौन ऐसे में मुझे शम्अ जलाने देगा’।
~खुर्रम नूर, भारत


जुगनुओं का ये इलाक़ा है कई सालों से 
'कौन ऐसे में मुझे शम्अ जलाने देगा' ।
~ दिगंबर नासवा, मलेशिया


सब हैं तैयार मुहब्बत को बुझाने के लिए 
'कौन ऐसे में  मुझे शम्अ जलाने देगा'।
~रेनू हुसैन, भारत


हर तरफ आँधियाँ, अंधेरों का व्यापार यहाँ 
'कौन ऐसे में  मुझे शम्अ जलाने देगा'।
~डॉ नीलिमा पाण्डेय,भारत 


सब बग़ल-गीर किए बैठे हैं माशूक़ अपनी,
‘कौन ऐसे में मुझे शम्अ जलाने देगा’।
~ अशोक सिंह, न्यूयॉर्क 


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 660 वें मिसरे: 'मैं ख़ाक हो के भी इसी चक्कर में क़ैद हूँ'

 पर 'एक शे'र अर्ज़ किया है' के शायरों की लगाई गईं गिरह:


कितनी सदी से ढूँढ़ रहा हूँ मैं अपना घर,
'मैं ख़ाक हो के भी इसी चक्कर में क़ैद हूँ'।
~अकबर शाद 'उदयपुरी' भारत


हर बार इक नए से बदन में उतर गया,
'मैं ख़ाक हो के भी इसी चक्कर में क़ैद हूँ'।
~अकबर शाद 'उदयपुरी' भारत


अफ़वाह, दोष, झूठ वो इल्ज़ाम,आपके,
'मैं ख़ाक हो के भी इसी चक्कर में क़ैद हूँ'।
~खुर्रम नूर, भारत


नाम-ओ-नसब हैं आज भी कत्बे पॅ मेरे दर्ज 
'मैं ख़ाक हो के भी इसी चक्कर में क़ैद हूँ'।
(नाम-ओ-नसब = नाम और वंशावली 
कत्बा = क़ब्र पर लगा शिलालेख)
~डाॅ. आदेश त्यागी, भारत


सब नाम का मेरे है तख़ल्लुस लगाए हैं 
'मैं ख़ाक हो के भी इसी चक्कर में क़ैद हूँ'।
~ दिगंबर नासवा, मलेशिया


अलमस्त हैं वो तर्क- ए- त'अल्लुक के बाद भी
'मैं ख़ाक हो के भी इसी चक्कर में क़ैद हूँ'।
~प्रज्ञा त्रिवेदी ,भारत


इस इश्क़ में जो भी पड़ा वो ख़ाक हो गया 
'मैं ख़ाक हो के भी इसी चक्कर में क़ैद हूँ'।
~रेनू हुसैन, भारत


मुझसे बड़ा नहीं है कोई इस जहान में 
‘मैं ख़ाक हो के भी इसी चक्कर में क़ैद हूँ’।
~सज्जाद अख्त़र, भारत


परिवार, घर-गृहस्थी औ रिश्तों की परवरिश 
‘मैं ख़ाक हो के भी इसी चक्कर में क़ैद हूँ’।
~ममता किरण, भारत


पानी, जलद, अगन कभी मिट्टी, वितान बन,
 'मैं ख़ाक हो के भी इसी चक्कर में कैद हूँ।
~डॉ नीलिमा पाण्डेय,भारत 


था आग जैसा इब्तिदा-ए-इश्क़ में कभी,
‘मैं ख़ाक हो के भी इसी चक्कर में क़ैद हूँ’।
~ अशोक सिंह , न्यू यॉर्क 


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संपादक

~ कौसर भुट्टो, दुबई


 


मंगलवार, 28 जुलाई 2026

329 वाँ सप्ताह एक शे’र गिरह-नामा: 11 जुलाई, 2026

 329 वाँ सप्ताह एक शे’र गिरह-नामा: 11 जुलाई, 2026

एक‌ शे'र‌ अर्ज़ किया है’ मंच के साप्ताहिक 2 तरही मिसरों पर आधारित 329 वाँ साप्ताहिक गिरह-नामा।

 आज का मुशायरा इन दो मिसरों पर आधारित था:

 657 वाँ मिसरा: 'कहने का सलीका हो तो उन्वान बहुत हैं'l

~निहाल रिज़वी


 658 वाँ मिसरा:  'तन्हाइयों में हमको मिलता करार क्यों है'। 

~ अनिल कुमार जैन

                                 *****^*****

 जायज़ा लीजिए अलग अलग ज़ावियों से इन मिसरों पर लगाई हुई गिरह का;

 657 वें मिसरे: 'कहने का सलीका हो तो उन्वान बहुत हैं'

पर 'एक शे'र अर्ज़ किया है' के शायरों की लगाई गईं गिरह:


दुनिया को ज़रा ग़ौर से पढ़ना तो समझना
‘कहने का सलीक़ा हो तो उन्वान बहुत हैं’।
~अकबर शाद 'उदयपुरी' भारत


हर सिम्त तख़य्युल के हैं लाखों सर-ओ-सामां 
'कहने का सलीक़ा हो तो उन्वान बहुत हैं'।
~डाॅ. आदेश त्यागी, भारत


सोहबत में अदीबों की समझ पाये हैं अब-तक 
‘कहने का सलीक़ा हो तो उन्वान बहुत हैं’।
~ दिगंबर नासवा, मलेशिया


कहना न अगर आए तो उन्वान करे क्या,
‘कहने का सलीक़ा हो तो उन्वान बहुत हैं’।
~अनमोल प्रकाश शुक्ला, भारत 


मुझको नहीं आया कभी सच्चाई छिपाना
 ‘कहने का सलीक़ा हो तो उन्वान बहुत हैं’।
~रेनू हुसैन, भारत 


गुफ़्तार के उस्लूब से ही बात बने है,
‘कहने का सलीक़ा हो तो उन्वान बहुत हैं’।
~ अशोक सिंह, न्यूयॉर्क 


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  658 वें मिसरे: 'तन्हाइयों में हमको मिलता करार क्यों है'

 पर 'एक शे'र अर्ज़ किया है' के शायरों की लगाई गईं गिरह:


कुछ राज़ इसमें होगा , कुछ बात इसमें होगी 
'तन्हाइयों में हमको मिलता करार क्यों है'।
~ रविकांत अनमोल, भारत


उकता गये हैं क्या हम दुनिया की रौनक़ों से 
'तन्हाइयों में हम को मिलता क़रार क्यों है'।
~डाॅ. आदेश त्यागी, भारत


है शौक़ महफ़िलों का पर ये समझ न पाया,
'तन्हाइयों में हमको मिलता क़रार क्यों है'।
~अनमोल प्रकाश शुक्ला, भारत 


हर शोर से ये दिल तो कतराता है हमारा,
'तन्हाइयों में हमको मिलता क़रार क्यों है'।
~अकबर शाद 'उदयपुरी' भारत


दुनिया के शोर गुल से बेज़ार हो गए हम 
'तन्हाइयों में हमको मिलता क़रार क्यों है'। 1 ।
~रेनू हुसैन, भारत 


मैं पूछती हूँ ख़ुद से तन्हाइयों में अक्सर 
'तन्हाइयों में हमको मिलता क़रार क्यों है'। 2 ।
~रेनू हुसैन, भारत 


है ज़िंदगी के मेले इतने लुभावने फिर,
'तन्हाइयों में हमको मिलता क़रार क्यों है'।
~ अशोक सिंह , न्यू यॉर्क 


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©️सर्वाधिकार सुरक्षित। इस पोस्ट में साझा किए गए सभी गिरह के शे'र 'एक शे'र अर्ज़ किया है' पटल पर शामिल शायरों के हैं। इनमें से कोई भी शे'र शायर की लिखित पूर्व सहमति के बग़ैर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है।

संपादक

~ कौसर भुट्टो, दुबई


 


मंगलवार, 7 जुलाई 2026

328 वाँ सप्ताह एक शे’र गिरह-नामा: 04 जुलाई, 2026

 328 वाँ सप्ताह एक शे’र गिरह-नामा: 04 जुलाई, 2026

एक‌ शे'र‌ अर्ज़ किया है’ मंच के साप्ताहिक 2 तरही मिसरों पर आधारित 328 वाँ सप्ताह गिरह-नामा।

 आज का मुशायरा इन दो मिसरों पर आधारित था:

 655 वाँ मिसरा: ''हम ने हर उस शख्स से पूछा जिस के नैन नशीले' l

~ गुलाम मोहम्मद कासिर

 656 वाँ मिसरा: ''हम ने बार हा ढूँढा तुम ने बार हा पाया'।

 ~ मिर्ज़ा ग़ालिब
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 जायज़ा लीजिए अलग अलग ज़ावियों से इन मिसरों पर लगाई हुई गिरह का;

 655 वें मिसरे: 'हम ने हर उस शख्स से पूछा जिस के नैन नशीले'

पर 'एक शे'र अर्ज़ किया है' के शायरों की लगाई गईं गिरह:


उसकी आँखों में झाँका या मदिरा पी के आए हो 
'हम ने हर उस शख़्स से पूछा जिस के नैन नशीले थे'l
~ दिगंबर नासवा, मलेशिया


कैसा जादू, कैसा जलवा आँखों से तुम करते हो,
'हम ने हर उस शख़्स से पूछा जिस के नैन नशीले थे' l
~अकबर शाद 'उदयपुरी' भारत


राज़ तुम्हारी आँखों का हम जान न पाए आज तलक,
'हम ने हर उस शख़्स से पूछा जिस के नैन नशीले थे'।
~अकबर शाद 'उदयपुरी' भारत


ठेके बन्द कराने का ठेका ले कर निकले हो क्या?
'हम ने हर उस शख़्स से पूछा, जिस के नैन नशीले थे'l
~डाॅ. आदेश त्यागी, भारत


हमको सच सच बतलाओ क्या उसको देखकर आये हो
'हम ने हर उस शख़्स से पूछा जिस के नैन नशीले थे'l
~सज्जाद अख्तर, भारत


अपनी सुध बुध खोकर लौटे हो क्या उस मदिरालय से,
'हम ने हर उस शख़्स से पूछा जिसके नैन नशीले थे'।
~अनमोल प्रकाश शुक्ला, भारत 


इश्क़ का जादू मेरे सर चढ़ कर क्यूं बोल नहीं पाया 
'हम ने हर उस शख़्स से पूछा जिसके नैन नशीले थे'।
~ममता 'किरण', भारत


उस का नाम पता मिल जाए इतना ही तो शौक रहा 
'हम ने हर उस शख़्स से पूछा जिसके नैन नशीले थे'।
~रेनू हुसैन, भारत 


देख के तेरी आँखों में क्या कोई कभी मदहोश हुआ?
'हमने हर उस शख़्स से पूछा जिसके नैन नशीले थे'।
~मंजुल मिश्र 'मंज़र लखनवी, भारत


हर उस मोड पे रुक कर देखा जिस पर उसकी खुशबू थी 
'हम ने हर उस शख्स से पूछा जिस के नैन नशीले थे' l
~रविकांत, भारत


शाम ढले जब प्यास बढ़ी तो मयख़ाने के बारे में,
'हमने हर उस शख़्स से पूछा जिसके नैन नशीले थे'।
~खुर्रम नूर, भारत


बेक़ाबू हो किसका जल्वा सर पे हमारे बोल रहा,
‘हम ने हर उस शख़्स से पूछा जिस के नैन नशीले थे'।
~ अशोक सिंह, न्यूयॉर्क 


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  656 वें मिसरे: 'हम ने बार हा ढूँढा तुम ने बार हा पाया'

 पर 'एक शे'र अर्ज़ किया है' के शायरों की लगाई गईं गिरह:


दो दिलों के आँगन में, प्रेम के परिदों को 
'हम ने बार-हा ढूँडा, तुम ने बार-हा पाया' l
~ दिगंबर नासवा, मलेशिया


हम रहे सवालों में, तुम रहे जवाबों में,
'हम ने बार-हा ढूँढा, तुम ने बार-हा पाया'।
~अकबर शाद उदयपुरी, भारत


जो वफ़ा निभा पाये, साथ ऐसे साथी का
'हम ने बारहा ढूँढा, तुम ने बारहा पाया' l
~सज्जाद अख्तर, भारत


बुलहवस ज़माने में दिल से चाहने वाला 
'हम ने बारहा ढूँढा, तुम ने बारहा पाया'l
(बुलहवस = वासनायुक्त )
~डाॅ. आदेश त्यागी, भारत


खेल ये नसीबों ने इस तरह से खेला कुछ,
‘हम ने बार-हा ढूँढा तुम ने बार-हा पाया’।
~ अशोक सिंह , न्यू यॉर्क 


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©️सर्वाधिकार सुरक्षित। इस पोस्ट में साझा किए गए सभी गिरह के शे'र 'एक शे'र अर्ज़ किया है' पटल पर शामिल शायरों के हैं। इनमें से कोई भी शे'र शायर की लिखित पूर्व सहमति के बग़ैर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है।

संपादक

~ कौसर भुट्टो, दुबई


 


327 वाँ सप्ताह एक शे’र गिरह-नामा: 27 जून , 2026

 327 वाँ सप्ताह एक शे’र गिरह-नामा: 27 जून , 2026

एक‌ शे'र‌ अर्ज़ किया है’ मंच के साप्ताहिक 2 तरही मिसरों पर आधारित 327 वाँ साप्ताहिक गिरह-नामा।

 आज का मुशायरा इन दो मिसरों पर आधारित था:

 653 वाँ मिसरा: 'मैंनें दुनिया छोड़ दी तो मिल गई दुनिया मुझे' ।

~सीमाब अकबराबादी

 654 वाँ मिसरा: 'उन किताबों ही में यादों के खज़ाने निकले'।

~ रज़ा अमरोहवी
                                 *****^*****

 जायज़ा लीजिए अलग अलग ज़ावियों से इन मिसरों पर लगाई हुई गिरह का;

 653 वें मिसरे: 'मैंनें दुनिया छोड़ दी तो मिल गई दुनिया मुझे' 

पर 'एक शे'र अर्ज़ किया है' के शायरों की लगाई गईं गिरह:


जितना करती थी त'आक़ुब दूरियाँ उतनी बढ़ीं
'मैंनें दुनिया छोड़ दी तो मिल गई दुनिया मुझे'।
त'आक़ुब-पीछा करना, chase करना
~ प्रज्ञा त्रिवेदी , भारत


सारी दुनिया से मुहब्बत करके हासिल कुछ न था
'मैंनें दुनिया छोड़ दी तो मिल गई दुनिया मुझे'।
~सज्जाद अख्तर, भारत


जब तलक पीछा किया पूछा नहीं मुझको कभी,
 'मैंने दुनिया छोड़ दी तो मिल गई दुनिया मुझे' ।
~ आलोक अविरल, भारत 


दूसरी दुनिया से आया था मैं इस दुनिया की ओर,
' मैंने दुनिया छोड़ दी तो मिल गई दुनिया मुझे' ।
 ~प्रगीत कुँअर, ऑस्ट्रेलिया


मिट गई हर चाह, तब जीवन हुआ धनवान ये 
'मैंने दुनिया छोड़ दी तो मिल गई दुनिया मुझे' ।
~डॉ० भावना कुँअर, ऑस्ट्रेलिया


पुर-सकूँ हो कर कहूँ आवारगी से अपनी मैं,
‘मैंने दुनिया छोड़ दी तो मिल गई दुनिया मुझे’।
~ अशोक सिंह, न्यूयॉर्क 


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  654 वें मिसरे: 'उन किताबों ही में यादों के खज़ाने निकले'

 पर 'एक शे'र अर्ज़ किया है' के शायरों की लगाई गईं गिरह:


जिन किताबों को अहले वक़्त ने रद्दी समझा 
'उन किताबों में ही यादों के ख़ज़ाने निकले' ।
~महेश दुबे, भारत


मुद्दतों बंद रहीं दिल की जो अलमारी में 
'उन किताबों ही में यादों के ख़ज़ाने निकले' ।
~ दिगंबर नासवा, मलेशिया


रफ़्ता-रफ़्ता जिन्हें अलमारी निगलती गई थी,
'उन किताबों में ही यादों के ख़ज़ाने निकले' ।
~अकबर शाद 'उदयपुरी' भारत


उसने लिखे थे हसीं शेर एक पन्ने पे 
'उन किताबों ही में यादों के ख़ज़ाने निकले' ।
~रमनी थापर, कैलिफोर्निया


जिन के पन्नों में कभी अश्क छपे थे मेरे
'उन किताबों में ही यादों के ख़ज़ाने निकले' ।
~प्रेम बिहारी मिश्रा, भारत


जिन किताबों को पढ़ा पढ़ के सजा दीं घर में,
'उन किताबों में ही यादों के ख़ज़ाने निकले' ।
~अनमोल प्रकाश शुक्ला, भारत 


बिन पढ़े रख के कहीं भूल गये थे जिन को 
'उन किताबों ही में यादों के ख़ज़ाने निकले'।
~डाॅ. आदेश त्यागी, भारत


जिन किताबों को रखा दूर हमेशा ख़ुद से 
'उन किताबों ही में यादों के ख़ज़ाने निकले' ।
~रेनू हुसैन, भारत 


जिन किताबों को कभी खोल ही ना पाये हम
'उन किताबों में ही यादों के ख़ज़ाने निकले' ।
~डॉ० भावना कुँअर, ऑस्ट्रेलिया


निकले सूखे हुए कुछ फूल दबे पन्नों में 
‘उन किताबों ही में यादों के ख़ज़ाने निकले’। 1 ।
~ अशोक सिंह , न्यू यॉर्क 


जिन किताबों से निकल तितलियाँ ग़ज़लें कहतीं,
‘उन किताबों में ही यादों के ख़ज़ाने निकले’। 2 ।
~ अशोक सिंह , न्यू यॉर्क 


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संपादक

~ कौसर भुट्टो, दुबई


 


332 वाँ सप्ताह एक शे’र गिरह-नामा: 1 अगस्त, 2026

 332 वाँ सप्ताह एक शे’र गिरह-नामा: 1 अगस्त, 2026 एक‌ शे'र‌ अर्ज़ किया है’ मंच के साप्ताहिक 2 तरही मिसरों पर आधारित  332 वाँ सप्ताहिक गिरह...