रविवार, 2 अगस्त 2026

332 वाँ सप्ताह एक शे’र गिरह-नामा: 1 अगस्त, 2026

 332 वाँ सप्ताह एक शे’र गिरह-नामा: 1 अगस्त, 2026

एक‌ शे'र‌ अर्ज़ किया है’ मंच के साप्ताहिक 2 तरही मिसरों पर आधारित  332 वाँ सप्ताहिक गिरह-नामा।

 आज का मुशायरा इन दो मिसरों पर आधारित था:

 663 वाँ मिसरा: 'क़रीब आए तो चेहरे बदल गए कैसे' ।

~ आल ए अहमद सुरुर


 664 वाँ मिसरा: 'मेरे लबों पर तेरा फ़साना पहले भी था आज भी है'।

~ हस्तीमल हस्ती


                                 *****^*****

 जायज़ा लीजिए अलग अलग ज़ावियों से इन मिसरों पर लगाई हुई गिरह का;

 663 वें मिसरे: 'क़रीब आए तो चेहरे बदल गए कैसे' 

पर 'एक शे'र अर्ज़ किया है' के शायरों की लगाई गईं गिरह:


वो जो ख़ुलूस में सब देवता से लगते थे,
‘क़रीब आए तो चेहरे बदल गए कैसे’।
~अनमोल प्रकाश शुक्ला, भारत 


हम आफ़ताब समझते थे, निकले जुगनू वो 
'क़रीब आये तो चेहरे बदल गये कैसे'।
~डाॅ. आदेश त्यागी, भारत


न आओ पास भी इतना कभी ये कहना पड़े
‘क़रीब आए तो चेहरे बदल गए कैसे’। 1 ।
~ प्रज्ञा त्रिवेदी , भारत


रखो न राब्ता इतना कभी ये कहना पड़े
‘क़रीब आए तो चेहरे बदल गए कैसे’। 2 ।
~ प्रज्ञा त्रिवेदी , भारत


करो न कुछ भी तुम ऐसा की लोग कहने लगें 
‘क़रीब आए तो चेहरे बदल गए कैसे’।
~ दिगंबर नासवा, मलेशिया


मुझे लगा था कि वो लोग हैं मेरे अपने 
‘क़रीब आए तो चेहरे बदल गए कैसे’।
~रेनू हुसैन, भारत 


हमें तो चाँद सितारों से दिख रहे थे सब,
‘क़रीब आए तो चेहरे बदल गए कैसे’।
~रामप्रकाश यति, भारत


वो जब थे दूर तो समझी थी देवता उनको
‘क़रीब आए तो चेहरे बदल गए कैसे’।
~ममता 'किरण', भारत


सँभाले रक्खा था जिनको हसीं ख़यालों में
‘क़रीब आए तो चेहरे बदल गए कैसे’।
~कौसर भुट्टो, दुबई


सुहाने ढोल से जो दूर के लगे थे वो 
‘क़रीब आए तो चेहरे बदल गए कैसे’।
~ अशोक सिंह, न्यूयॉर्क 


*✨*☀️**✨**


  664 वें मिसरे: 'मेरे लबों पर तेरा फ़साना पहले भी था आज भी है'

 पर 'एक शे'र अर्ज़ किया है' के शायरों की लगाई गईं गिरह:


तुम भी वही हो मैं भी वही हूँ मौसम भी है पहले सा 
'मेरे लबों पर तेरा फ़साना पहले भी था आज भी है'।
~ दिगंबर नासवा, मलेशिया


मुद्दत गुज़री बदल गई दुनिया दोनों की ही लेकिन 
'मेरे लबों पर तेरा फ़साना पहले भी था आज भी है'।
~लक्ष्मी शंकर बाजपेई, भारत


चाहे तब था प्यार का क़िस्सा चाहे अब है रंजिश का
'मेरे लबों पर तेरा फ़साना पहले भी था आज भी है'।
~प्रज्ञा त्रिवेदी ,भारत


आज भी है शादाब मेरे दिल में पहली-पहली उल्फ़त
'मेरे लबों पर तेरा फ़साना पहले भी था, आज भी है'।
~डाॅ. आदेश त्यागी, भारत


इक अरसे से हम दोनों हैं ग़ैरों की जागीरें ,पर, 
'मेरे लबों पर तेरा फ़साना पहले भी था आज भी है'।
~खुर्रम नूर, भारत


तस्वीरें हैं सजी हुईं तेरी ही मन के मंदिर में 
'मेरे लबों पर तेरा फ़साना पहले भी था आज भी है'।
~ममता किरण, भारत


माना तूने तोड़ दिया दिल ,इससे फ़र्क नहीं कुछ भी,
'मेरे लबों पर तेरा फ़साना पहले भी था आज भी है'।
~अनमोल प्रकाश शुक्ला, भारत 


सबकी अपनी-अपनी ढपली सबका अपना-अपना राग,
'मेरे लबों पर तेरा फ़साना पहले भी था आज भी है'।
~कौसर भुट्टो, दुबई


बाद-ए-ख़िज़ाँ में भूला सब पर फ़स्ल-ए-गुल की याद नहीं,
'मेरे लबों पर तेरा फ़साना पहले भी था आज भी है'।
*बाद-ए-ख़िज़ाँ=पतझड़ की हवा; फ़स्ल-ए-गुल=बहार
~ अशोक सिंह , न्यू यॉर्क 


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इस कार्यक्रम का यू-ट्यूब वीडियो देखने के लिए यहाँ क्लिक करिये:


©️सर्वाधिकार सुरक्षित। इस पोस्ट में साझा किए गए सभी गिरह के शे'र 'एक शे'र अर्ज़ किया है' पटल पर शामिल शायरों के हैं। इनमें से कोई भी शे'र शायर की लिखित पूर्व सहमति के बग़ैर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है।

संपादक

~ कौसर भुट्टो, दुबई


 


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