एक शे'र अर्ज़ किया है’ मंच के साप्ताहिक 2 तरही मिसरों पर आधारित 329 वाँ साप्ताहिक गिरह-नामा।
आज का मुशायरा इन दो मिसरों पर आधारित था:
657 वाँ मिसरा: 'कहने का सलीका हो तो उन्वान बहुत हैं'l
~निहाल रिज़वी
658 वाँ मिसरा: 'तन्हाइयों में हमको मिलता करार क्यों है'।
~ अनिल कुमार जैन
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जायज़ा लीजिए अलग अलग ज़ावियों से इन मिसरों पर लगाई हुई गिरह का;
657 वें मिसरे: 'कहने का सलीका हो तो उन्वान बहुत हैं'
पर 'एक शे'र अर्ज़ किया है' के शायरों की लगाई गईं गिरह:
दुनिया को ज़रा ग़ौर से पढ़ना तो समझना
‘कहने का सलीक़ा हो तो उन्वान बहुत हैं’।
~अकबर शाद 'उदयपुरी' भारत
हर सिम्त तख़य्युल के हैं लाखों सर-ओ-सामां
'कहने का सलीक़ा हो तो उन्वान बहुत हैं'।
~डाॅ. आदेश त्यागी, भारत
सोहबत में अदीबों की समझ पाये हैं अब-तक
‘कहने का सलीक़ा हो तो उन्वान बहुत हैं’।
~ दिगंबर नासवा, मलेशिया
कहना न अगर आए तो उन्वान करे क्या,
‘कहने का सलीक़ा हो तो उन्वान बहुत हैं’।
~अनमोल प्रकाश शुक्ला, भारत
मुझको नहीं आया कभी सच्चाई छिपाना
‘कहने का सलीक़ा हो तो उन्वान बहुत हैं’।
~रेनू हुसैन, भारत
गुफ़्तार के उस्लूब से ही बात बने है,
‘कहने का सलीक़ा हो तो उन्वान बहुत हैं’।
~ अशोक सिंह, न्यूयॉर्क
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658 वें मिसरे: 'तन्हाइयों में हमको मिलता करार क्यों है'
पर 'एक शे'र अर्ज़ किया है' के शायरों की लगाई गईं गिरह:
कुछ राज़ इसमें होगा , कुछ बात इसमें होगी
'तन्हाइयों में हमको मिलता करार क्यों है'।
~ रविकांत अनमोल, भारत
उकता गये हैं क्या हम दुनिया की रौनक़ों से
'तन्हाइयों में हम को मिलता क़रार क्यों है'।
~डाॅ. आदेश त्यागी, भारत
है शौक़ महफ़िलों का पर ये समझ न पाया,
'तन्हाइयों में हमको मिलता क़रार क्यों है'।
~अनमोल प्रकाश शुक्ला, भारत
हर शोर से ये दिल तो कतराता है हमारा,
'तन्हाइयों में हमको मिलता क़रार क्यों है'।
~अकबर शाद 'उदयपुरी' भारत
दुनिया के शोर गुल से बेज़ार हो गए हम
'तन्हाइयों में हमको मिलता क़रार क्यों है'। 1 ।
~रेनू हुसैन, भारत
मैं पूछती हूँ ख़ुद से तन्हाइयों में अक्सर
'तन्हाइयों में हमको मिलता क़रार क्यों है'। 2 ।
~रेनू हुसैन, भारत
है ज़िंदगी के मेले इतने लुभावने फिर,
'तन्हाइयों में हमको मिलता क़रार क्यों है'।
~ अशोक सिंह , न्यू यॉर्क
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इस कार्यक्रम का यू-ट्यूब वीडियो देखने के लिए यहाँ क्लिक करिये:
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संपादक
~ कौसर भुट्टो, दुबई
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