एक शे'र अर्ज़ किया है’ मंच के साप्ताहिक 2 तरही मिसरों पर आधारित 330 वाँ सप्ताह गिरह-नामा।
आज का मुशायरा इन दो मिसरों पर आधारित था:
659 वाँ मिसरा: 'कौन ऐसे में मुझे शम्अ जलाने देगा'।
~ वसीम बरेलवी
660 वाँ मिसरा: 'मैं ख़ाक हो के भी इसी चक्कर में क़ैद हूँ'।
~ ताहिर तिलहरी
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जायज़ा लीजिए अलग अलग ज़ावियों से इन मिसरों पर लगाई हुई गिरह का;
659 वें मिसरे: 'कौन ऐसे में मुझे शम्अ जलाने देगा'
पर 'एक शे'र अर्ज़ किया है' के शायरों की लगाई गईं गिरह:
सब ने मुट्ठी में हवाओं को छुपा रक्खा है
'कौन ऐसे में मुझे शम्अ जलाने देगा'।
~सज्जाद अख्तर, भारत
सब लिए बैठे हैं हाथों में टमाटर अंडे,
'कौन ऐसे में मुझे शम्अ जलाने देगा'।
~अनमोल प्रकाश शुक्ला, भारत
चमचमाते हुए रंगीन उजाले हैं जब
'कौन ऐसे में मुझे शम्अ जलाने देगा'।
~ममता 'किरण', भारत
पूरी बस्ती है अँधेरों की हिमायत वाली
'कौन ऐसे में मुझे शम्अ जलाने देगा'।
~मनोज 'अबोध', भारत
हर किसी में है यहाँ ख़ूब चमक सूरज सी
'कौन ऐसे में मुझे शम्अ जलाने देगा'।
~ प्रज्ञा त्रिवेदी , भारत
रौशनी बाँटने वालों पे नज़र रहती है,
'कौन ऐसे में मुझे शम्अ जलाने देगा'।
~अकबर शाद 'उदयपुरी' भारत
हो चुके हैं सभी तारीक शबों के आदी
'कौन ऐसे में मुझे शम्अ जलाने देगा' ।
~डाॅ. आदेश त्यागी, भारत
आग के नाम से अब दिल ही दहल जाते हैं..
‘कौन ऐसे में मुझे शम्अ जलाने देगा’।
~खुर्रम नूर, भारत
जुगनुओं का ये इलाक़ा है कई सालों से
'कौन ऐसे में मुझे शम्अ जलाने देगा' ।
~ दिगंबर नासवा, मलेशिया
सब हैं तैयार मुहब्बत को बुझाने के लिए
'कौन ऐसे में मुझे शम्अ जलाने देगा'।
~रेनू हुसैन, भारत
हर तरफ आँधियाँ, अंधेरों का व्यापार यहाँ
'कौन ऐसे में मुझे शम्अ जलाने देगा'।
~डॉ नीलिमा पाण्डेय,भारत
सब बग़ल-गीर किए बैठे हैं माशूक़ अपनी,
‘कौन ऐसे में मुझे शम्अ जलाने देगा’।
~ अशोक सिंह, न्यूयॉर्क
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660 वें मिसरे: 'मैं ख़ाक हो के भी इसी चक्कर में क़ैद हूँ'
पर 'एक शे'र अर्ज़ किया है' के शायरों की लगाई गईं गिरह:
कितनी सदी से ढूँढ़ रहा हूँ मैं अपना घर,
'मैं ख़ाक हो के भी इसी चक्कर में क़ैद हूँ'।
~अकबर शाद 'उदयपुरी' भारत
हर बार इक नए से बदन में उतर गया,
'मैं ख़ाक हो के भी इसी चक्कर में क़ैद हूँ'।
~अकबर शाद 'उदयपुरी' भारत
अफ़वाह, दोष, झूठ वो इल्ज़ाम,आपके,
'मैं ख़ाक हो के भी इसी चक्कर में क़ैद हूँ'।
~खुर्रम नूर, भारत
नाम-ओ-नसब हैं आज भी कत्बे पॅ मेरे दर्ज
'मैं ख़ाक हो के भी इसी चक्कर में क़ैद हूँ'।
(नाम-ओ-नसब = नाम और वंशावली
कत्बा = क़ब्र पर लगा शिलालेख)
~डाॅ. आदेश त्यागी, भारत
सब नाम का मेरे है तख़ल्लुस लगाए हैं
'मैं ख़ाक हो के भी इसी चक्कर में क़ैद हूँ'।
~ दिगंबर नासवा, मलेशिया
अलमस्त हैं वो तर्क- ए- त'अल्लुक के बाद भी
'मैं ख़ाक हो के भी इसी चक्कर में क़ैद हूँ'।
~प्रज्ञा त्रिवेदी ,भारत
इस इश्क़ में जो भी पड़ा वो ख़ाक हो गया
'मैं ख़ाक हो के भी इसी चक्कर में क़ैद हूँ'।
~रेनू हुसैन, भारत
मुझसे बड़ा नहीं है कोई इस जहान में
‘मैं ख़ाक हो के भी इसी चक्कर में क़ैद हूँ’।
~सज्जाद अख्त़र, भारत
परिवार, घर-गृहस्थी औ रिश्तों की परवरिश
‘मैं ख़ाक हो के भी इसी चक्कर में क़ैद हूँ’।
~ममता किरण, भारत
पानी, जलद, अगन कभी मिट्टी, वितान बन,
'मैं ख़ाक हो के भी इसी चक्कर में कैद हूँ।
~डॉ नीलिमा पाण्डेय,भारत
था आग जैसा इब्तिदा-ए-इश्क़ में कभी,
‘मैं ख़ाक हो के भी इसी चक्कर में क़ैद हूँ’।
~ अशोक सिंह , न्यू यॉर्क
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संपादक
~ कौसर भुट्टो, दुबई
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