गुरुवार, 30 जुलाई 2026

330 वाँ सप्ताह एक शे’र गिरह-नामा: 18 जुलाई , 2026

330 वाँ सप्ताह एक शे’र गिरह-नामा: 18 जुलाई , 2026

एक‌ शे'र‌ अर्ज़ किया है’ मंच के साप्ताहिक 2 तरही मिसरों पर आधारित 330 वाँ सप्ताह गिरह-नामा।

 आज का मुशायरा इन दो मिसरों पर आधारित था:

659 वाँ मिसरा: 'कौन ऐसे में  मुझे शम्अ जलाने देगा'।

~ वसीम बरेलवी


 660 वाँ मिसरा: 'मैं ख़ाक हो के भी इसी चक्कर में क़ैद हूँ'।

 ~ ताहिर तिलहरी
                                 *****^*****

 जायज़ा लीजिए अलग अलग ज़ावियों से इन मिसरों पर लगाई हुई गिरह का;

 659 वें मिसरे:  'कौन ऐसे में मुझे शम्अ जलाने देगा'

पर 'एक शे'र अर्ज़ किया है' के शायरों की लगाई गईं गिरह:


सब ने मुट्ठी में हवाओं को छुपा रक्खा है
'कौन ऐसे में  मुझे शम्अ जलाने देगा'।
~सज्जाद अख्तर, भारत


सब लिए बैठे हैं हाथों में टमाटर अंडे,
'कौन ऐसे में  मुझे शम्अ जलाने देगा'।
~अनमोल प्रकाश शुक्ला, भारत 


चमचमाते हुए रंगीन उजाले हैं जब
'कौन ऐसे में  मुझे शम्अ जलाने देगा'।
~ममता 'किरण', भारत


पूरी बस्ती है अँधेरों की हिमायत वाली 
'कौन ऐसे में  मुझे शम्अ जलाने देगा'।
~मनोज 'अबोध', भारत


हर किसी में है यहाँ ख़ूब चमक सूरज सी
'कौन ऐसे में  मुझे शम्अ जलाने देगा'।
~ प्रज्ञा त्रिवेदी , भारत


रौशनी बाँटने वालों पे नज़र रहती है,
'कौन ऐसे में  मुझे शम्अ जलाने देगा'।
~अकबर शाद 'उदयपुरी' भारत


हो चुके हैं सभी तारीक शबों के आदी
'कौन ऐसे में मुझे शम्अ जलाने देगा' ।
~डाॅ. आदेश त्यागी, भारत


आग के नाम से अब दिल ही दहल जाते हैं..
‘कौन ऐसे में मुझे शम्अ जलाने देगा’।
~खुर्रम नूर, भारत


जुगनुओं का ये इलाक़ा है कई सालों से 
'कौन ऐसे में मुझे शम्अ जलाने देगा' ।
~ दिगंबर नासवा, मलेशिया


सब हैं तैयार मुहब्बत को बुझाने के लिए 
'कौन ऐसे में  मुझे शम्अ जलाने देगा'।
~रेनू हुसैन, भारत


हर तरफ आँधियाँ, अंधेरों का व्यापार यहाँ 
'कौन ऐसे में  मुझे शम्अ जलाने देगा'।
~डॉ नीलिमा पाण्डेय,भारत 


सब बग़ल-गीर किए बैठे हैं माशूक़ अपनी,
‘कौन ऐसे में मुझे शम्अ जलाने देगा’।
~ अशोक सिंह, न्यूयॉर्क 


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 660 वें मिसरे: 'मैं ख़ाक हो के भी इसी चक्कर में क़ैद हूँ'

 पर 'एक शे'र अर्ज़ किया है' के शायरों की लगाई गईं गिरह:


कितनी सदी से ढूँढ़ रहा हूँ मैं अपना घर,
'मैं ख़ाक हो के भी इसी चक्कर में क़ैद हूँ'।
~अकबर शाद 'उदयपुरी' भारत


हर बार इक नए से बदन में उतर गया,
'मैं ख़ाक हो के भी इसी चक्कर में क़ैद हूँ'।
~अकबर शाद 'उदयपुरी' भारत


अफ़वाह, दोष, झूठ वो इल्ज़ाम,आपके,
'मैं ख़ाक हो के भी इसी चक्कर में क़ैद हूँ'।
~खुर्रम नूर, भारत


नाम-ओ-नसब हैं आज भी कत्बे पॅ मेरे दर्ज 
'मैं ख़ाक हो के भी इसी चक्कर में क़ैद हूँ'।
(नाम-ओ-नसब = नाम और वंशावली 
कत्बा = क़ब्र पर लगा शिलालेख)
~डाॅ. आदेश त्यागी, भारत


सब नाम का मेरे है तख़ल्लुस लगाए हैं 
'मैं ख़ाक हो के भी इसी चक्कर में क़ैद हूँ'।
~ दिगंबर नासवा, मलेशिया


अलमस्त हैं वो तर्क- ए- त'अल्लुक के बाद भी
'मैं ख़ाक हो के भी इसी चक्कर में क़ैद हूँ'।
~प्रज्ञा त्रिवेदी ,भारत


इस इश्क़ में जो भी पड़ा वो ख़ाक हो गया 
'मैं ख़ाक हो के भी इसी चक्कर में क़ैद हूँ'।
~रेनू हुसैन, भारत


मुझसे बड़ा नहीं है कोई इस जहान में 
‘मैं ख़ाक हो के भी इसी चक्कर में क़ैद हूँ’।
~सज्जाद अख्त़र, भारत


परिवार, घर-गृहस्थी औ रिश्तों की परवरिश 
‘मैं ख़ाक हो के भी इसी चक्कर में क़ैद हूँ’।
~ममता किरण, भारत


पानी, जलद, अगन कभी मिट्टी, वितान बन,
 'मैं ख़ाक हो के भी इसी चक्कर में कैद हूँ।
~डॉ नीलिमा पाण्डेय,भारत 


था आग जैसा इब्तिदा-ए-इश्क़ में कभी,
‘मैं ख़ाक हो के भी इसी चक्कर में क़ैद हूँ’।
~ अशोक सिंह , न्यू यॉर्क 


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इस कार्यक्रम का यू-ट्यूब वीडियो देखने के लिए यहाँ क्लिक करिये:


©️सर्वाधिकार सुरक्षित। इस पोस्ट में साझा किए गए सभी गिरह के शे'र 'एक शे'र अर्ज़ किया है' पटल पर शामिल शायरों के हैं। इनमें से कोई भी शे'र शायर की लिखित पूर्व सहमति के बग़ैर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है।

संपादक

~ कौसर भुट्टो, दुबई


 


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