एक शे'र अर्ज़ किया है’ मंच के साप्ताहिक 2 तरही मिसरों पर आधारित 327 वाँ साप्ताहिक गिरह-नामा।
आज का मुशायरा इन दो मिसरों पर आधारित था:
653 वाँ मिसरा: 'मैंनें दुनिया छोड़ दी तो मिल गई दुनिया मुझे' ।
~सीमाब अकबराबादी
654 वाँ मिसरा: 'उन किताबों ही में यादों के खज़ाने निकले'।
~ रज़ा अमरोहवी
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जायज़ा लीजिए अलग अलग ज़ावियों से इन मिसरों पर लगाई हुई गिरह का;
653 वें मिसरे: 'मैंनें दुनिया छोड़ दी तो मिल गई दुनिया मुझे'
पर 'एक शे'र अर्ज़ किया है' के शायरों की लगाई गईं गिरह:
जितना करती थी त'आक़ुब दूरियाँ उतनी बढ़ीं
'मैंनें दुनिया छोड़ दी तो मिल गई दुनिया मुझे'।
त'आक़ुब-पीछा करना, chase करना
~ प्रज्ञा त्रिवेदी , भारत
सारी दुनिया से मुहब्बत करके हासिल कुछ न था
'मैंनें दुनिया छोड़ दी तो मिल गई दुनिया मुझे'।
~सज्जाद अख्तर, भारत
जब तलक पीछा किया पूछा नहीं मुझको कभी,
'मैंने दुनिया छोड़ दी तो मिल गई दुनिया मुझे' ।
~ आलोक अविरल, भारत
दूसरी दुनिया से आया था मैं इस दुनिया की ओर,
' मैंने दुनिया छोड़ दी तो मिल गई दुनिया मुझे' ।
~प्रगीत कुँअर, ऑस्ट्रेलिया
मिट गई हर चाह, तब जीवन हुआ धनवान ये
'मैंने दुनिया छोड़ दी तो मिल गई दुनिया मुझे' ।
~डॉ० भावना कुँअर, ऑस्ट्रेलिया
पुर-सकूँ हो कर कहूँ आवारगी से अपनी मैं,
‘मैंने दुनिया छोड़ दी तो मिल गई दुनिया मुझे’।
~ अशोक सिंह, न्यूयॉर्क
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654 वें मिसरे: 'उन किताबों ही में यादों के खज़ाने निकले'
पर 'एक शे'र अर्ज़ किया है' के शायरों की लगाई गईं गिरह:
जिन किताबों को अहले वक़्त ने रद्दी समझा
'उन किताबों में ही यादों के ख़ज़ाने निकले' ।
~महेश दुबे, भारत
मुद्दतों बंद रहीं दिल की जो अलमारी में
'उन किताबों ही में यादों के ख़ज़ाने निकले' ।
~ दिगंबर नासवा, मलेशिया
रफ़्ता-रफ़्ता जिन्हें अलमारी निगलती गई थी,
'उन किताबों में ही यादों के ख़ज़ाने निकले' ।
~अकबर शाद 'उदयपुरी' भारत
उसने लिखे थे हसीं शेर एक पन्ने पे
'उन किताबों ही में यादों के ख़ज़ाने निकले' ।
~रमनी थापर, कैलिफोर्निया
जिन के पन्नों में कभी अश्क छपे थे मेरे
'उन किताबों में ही यादों के ख़ज़ाने निकले' ।
~प्रेम बिहारी मिश्रा, भारत
जिन किताबों को पढ़ा पढ़ के सजा दीं घर में,
'उन किताबों में ही यादों के ख़ज़ाने निकले' ।
~अनमोल प्रकाश शुक्ला, भारत
बिन पढ़े रख के कहीं भूल गये थे जिन को
'उन किताबों ही में यादों के ख़ज़ाने निकले'।
~डाॅ. आदेश त्यागी, भारत
जिन किताबों को रखा दूर हमेशा ख़ुद से
'उन किताबों ही में यादों के ख़ज़ाने निकले' ।
~रेनू हुसैन, भारत
जिन किताबों को कभी खोल ही ना पाये हम
'उन किताबों में ही यादों के ख़ज़ाने निकले' ।
~डॉ० भावना कुँअर, ऑस्ट्रेलिया
निकले सूखे हुए कुछ फूल दबे पन्नों में
‘उन किताबों ही में यादों के ख़ज़ाने निकले’। 1 ।
~ अशोक सिंह , न्यू यॉर्क
जिन किताबों से निकल तितलियाँ ग़ज़लें कहतीं,
‘उन किताबों में ही यादों के ख़ज़ाने निकले’। 2 ।
~ अशोक सिंह , न्यू यॉर्क
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संपादक
~ कौसर भुट्टो, दुबई
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