मंगलवार, 7 जुलाई 2026

327 वाँ सप्ताह एक शे’र गिरह-नामा: 27 जून , 2026

 327 वाँ सप्ताह एक शे’र गिरह-नामा: 27 जून , 2026

एक‌ शे'र‌ अर्ज़ किया है’ मंच के साप्ताहिक 2 तरही मिसरों पर आधारित 327 वाँ साप्ताहिक गिरह-नामा।

 आज का मुशायरा इन दो मिसरों पर आधारित था:

 653 वाँ मिसरा: 'मैंनें दुनिया छोड़ दी तो मिल गई दुनिया मुझे' ।

~सीमाब अकबराबादी

 654 वाँ मिसरा: 'उन किताबों ही में यादों के खज़ाने निकले'।

~ रज़ा अमरोहवी
                                 *****^*****

 जायज़ा लीजिए अलग अलग ज़ावियों से इन मिसरों पर लगाई हुई गिरह का;

 653 वें मिसरे: 'मैंनें दुनिया छोड़ दी तो मिल गई दुनिया मुझे' 

पर 'एक शे'र अर्ज़ किया है' के शायरों की लगाई गईं गिरह:


जितना करती थी त'आक़ुब दूरियाँ उतनी बढ़ीं
'मैंनें दुनिया छोड़ दी तो मिल गई दुनिया मुझे'।
त'आक़ुब-पीछा करना, chase करना
~ प्रज्ञा त्रिवेदी , भारत


सारी दुनिया से मुहब्बत करके हासिल कुछ न था
'मैंनें दुनिया छोड़ दी तो मिल गई दुनिया मुझे'।
~सज्जाद अख्तर, भारत


जब तलक पीछा किया पूछा नहीं मुझको कभी,
 'मैंने दुनिया छोड़ दी तो मिल गई दुनिया मुझे' ।
~ आलोक अविरल, भारत 


दूसरी दुनिया से आया था मैं इस दुनिया की ओर,
' मैंने दुनिया छोड़ दी तो मिल गई दुनिया मुझे' ।
 ~प्रगीत कुँअर, ऑस्ट्रेलिया


मिट गई हर चाह, तब जीवन हुआ धनवान ये 
'मैंने दुनिया छोड़ दी तो मिल गई दुनिया मुझे' ।
~डॉ० भावना कुँअर, ऑस्ट्रेलिया


पुर-सकूँ हो कर कहूँ आवारगी से अपनी मैं,
‘मैंने दुनिया छोड़ दी तो मिल गई दुनिया मुझे’।
~ अशोक सिंह, न्यूयॉर्क 


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  654 वें मिसरे: 'उन किताबों ही में यादों के खज़ाने निकले'

 पर 'एक शे'र अर्ज़ किया है' के शायरों की लगाई गईं गिरह:


जिन किताबों को अहले वक़्त ने रद्दी समझा 
'उन किताबों में ही यादों के ख़ज़ाने निकले' ।
~महेश दुबे, भारत


मुद्दतों बंद रहीं दिल की जो अलमारी में 
'उन किताबों ही में यादों के ख़ज़ाने निकले' ।
~ दिगंबर नासवा, मलेशिया


रफ़्ता-रफ़्ता जिन्हें अलमारी निगलती गई थी,
'उन किताबों में ही यादों के ख़ज़ाने निकले' ।
~अकबर शाद 'उदयपुरी' भारत


उसने लिखे थे हसीं शेर एक पन्ने पे 
'उन किताबों ही में यादों के ख़ज़ाने निकले' ।
~रमनी थापर, कैलिफोर्निया


जिन के पन्नों में कभी अश्क छपे थे मेरे
'उन किताबों में ही यादों के ख़ज़ाने निकले' ।
~प्रेम बिहारी मिश्रा, भारत


जिन किताबों को पढ़ा पढ़ के सजा दीं घर में,
'उन किताबों में ही यादों के ख़ज़ाने निकले' ।
~अनमोल प्रकाश शुक्ला, भारत 


बिन पढ़े रख के कहीं भूल गये थे जिन को 
'उन किताबों ही में यादों के ख़ज़ाने निकले'।
~डाॅ. आदेश त्यागी, भारत


जिन किताबों को रखा दूर हमेशा ख़ुद से 
'उन किताबों ही में यादों के ख़ज़ाने निकले' ।
~रेनू हुसैन, भारत 


जिन किताबों को कभी खोल ही ना पाये हम
'उन किताबों में ही यादों के ख़ज़ाने निकले' ।
~डॉ० भावना कुँअर, ऑस्ट्रेलिया


निकले सूखे हुए कुछ फूल दबे पन्नों में 
‘उन किताबों ही में यादों के ख़ज़ाने निकले’। 1 ।
~ अशोक सिंह , न्यू यॉर्क 


जिन किताबों से निकल तितलियाँ ग़ज़लें कहतीं,
‘उन किताबों में ही यादों के ख़ज़ाने निकले’। 2 ।
~ अशोक सिंह , न्यू यॉर्क 


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इस कार्यक्रम का यू-ट्यूब वीडियो देखने के लिए यहाँ क्लिक करिये:


©️सर्वाधिकार सुरक्षित। इस पोस्ट में साझा किए गए सभी गिरह के शे'र 'एक शे'र अर्ज़ किया है' पटल पर शामिल शायरों के हैं। इनमें से कोई भी शे'र शायर की लिखित पूर्व सहमति के बग़ैर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है।

संपादक

~ कौसर भुट्टो, दुबई


 


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