295 वाँ एक शे’र गिरह-नामा: 15 नवंबर , 2025
एक शे'र अर्ज़ किया है’ मंच के साप्ताहिक 2 तरही मिसरों पर आधारित #डिजिटल_वीडियो_गोष्ठी का 295 वाँ तरही मुशायरा कार्यक्रम।
आज का मुशायरा इन दो मिसरों पर आधारित था:
589 वाँ मिसरा: 'रहने दो अभी सागरो मीना मेरे आगे' ।
~मिर्ज़ा ग़ालिब
590 वाँ मिसरा: 'गुर्बत नसीब तेरे इरादे कहाँ के हैं।
~ बिसमिल देहलवी
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जायज़ा लीजिए अलग अलग ज़ावियों से इन मिसरों पर लगाई हुई गिरह का;
589 वें मिसरे: ‘रहने दो अभी सागरो मीना मेरे आगे'
पर 'एक शे'र अर्ज़ किया है' के शायरों की लगाई गईं गिरह:
सूफी हूँ भले पर ये पिलानी है सभी को
'रहने दो अभी साग़रो मीना मेरे आगे' ।
~ दिगंबर नासवा, मलेशिया
है तिश्नगी सदियों की ये आहिस्ता बुझेगी
'रहने दो अभी साग़रो मीना मेरे आगे' ।
~ प्रज्ञा त्रिवेदी , भारत
मुझको पता है बात ये अच्छी नहीं है पर،
'रहने दो अभी सागर-ओ-मीना मेरे आगे' ।
-रेणु हुसैन, भारत
ये सच है कि मयख़्वार नहीं हूं मैं मगर तुम,
'रहने दो अभी साग़र-ओ-मीना मेरे आगे'। 1 ।
~ सज्जाद अख्तर ,भारत
इतनी भी नहीं पी कभी तौबा भी नहीं की
रहने दो अभी साग़र-ओ-मीना मेरे आगे'। 2 ।
~ सज्जाद अख्तर ,भारत
बाल लीलाएं लिखीं सूर ने उस कान्हा की,
‘जिसको देखा ही न जाए, उसे देखा कैसे’ l
~ लक्ष्मी शंकर बाजपेई, भारत
सदियों की मिरी प्यास ये ऐसे न बुझेगी
'रहने दो अभी साग़रो मीना मेरे आगे' ।
~ मनोज अबोध, भारत
शायद यूँ ही हो जाय किसी शे’र की आमद,
'रहने दो अभी साग़रो मीना मेरे आगे' ।
रूबी मोहंती, भारत
है प्यास भी इतनी कि ये बुझती ही नहीं है,
' रहने दो अभी सागरो मीना मेरे आगे' ।
आलोक अविरल,.भारत
तौबा में अभी वक़्त है दो एक पहर का,
‘रहने दो अभी साग़र-ओ-मीना मीना मेरे आगे’।
~ अशोक सिंह, न्यूयॉर्क
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590 वें मिसरे: 'गुर्बत नसीब तेरे इरादे कहाँ के हैं।
~ बिसमिल देहलवी
पर 'एक शे'र अर्ज़ किया है' के शायरों की लगाई गईं गिरह:
रिश्ते चढ़े हैं भेंट सियासत की आज सब,
‘ग़ुर्बत-नसीब तेरे इरादे कहाँ के हैं’।
~प्रेम बिहारी मिश्र, भारत
राहों में ख़ाक छानते क्या कुछ नहीं किया,
'ग़ुर्बत-नसीब तेरे इरादे कहाँ के हैं' l 1 ।
~ अकबर शाद 'उदयपुरी', भारत
दीवार बन के रह गए अपने ही हौसले,
'ग़ुर्बत-नसीब तेरे इरादे कहाँ के हैं'। 2 ।
~ अकबर शाद 'उदयपुरी', भारत
मस्जिद से कुछ ग़रज़ न शिवाले की आरज़ू,
'ग़ुर्बत नसीब तेरे इरादे कहां के हैं' l
~ सज्जाद अख्तर ,भारत
बाज़ार से क्यों लाया है रस्सी ख़रीद के
'ग़ुर्बत -नसीब तेरे इरादे कहां के हैं' ।
~ लक्ष्मी शंकर बाजपेई, भारत
लाया तू ब्याह एक पुलिसवाली क्यूँ भला
'ग़ुर्बत नसीब तेरे इरादे कहाँ के हैं' ।
~प्रज्ञा त्रिवेदी ,भारत
क्यूँ रुक गया है राह में तू लक्ष्य छोड़ के
'ग़ुर्बत-नसीब तेरे इरादे कहाँ के हैं' ।
~ दिगंबर नासवा, मलेशिया
तुम चल दिए हो छोड़ मुहब्बत की राह को,
'गुर्बत नसीब तेरे इरादे कहाँ के हैं।
-रेणु हुसैन, भारत
कब तक मुझे सफ़र में ही रहना है ये बता,
'गुर्बत नसीब तेरे इरादे कहाँ के हैं'।
~आलोक अविरल
जो पास था उसे भी सफ़र में लुटा दिया
'ग़ुरबत नसीब तेरे इरादे कहाँ के हैं' ।
मनोज अबोध, भारत
ठोकर पे रख के चल रहा तक़दीर का लिखा,
‘ग़ुर्बत-नसीब तेरे इरादे कहाँ के हैं’। 1 ।
~ अशोक सिंह , न्यू यॉर्क
फैलाए रायता पड़ा हर एक ठौर पर,
‘ग़ुर्बत-नसीब तेरे इरादे कहाँ के हैं’। 2 ।
~ अशोक सिंह , न्यू यॉर्क
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इस कार्यक्रम का यू-ट्यूब वीडियो देखने के लिए यहाँ क्लिक करिये:
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संपादक
~ कौसर भुट्टो, दुबई
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