290 वाँ एक शे’र गिरह-नामा: , 11 अक्टूबर,2025
एक शे'र अर्ज़ किया है’ मंच के साप्ताहिक 2 तरही मिसरों पर आधारित #डिजिटल_वीडियो_गोष्ठी का 290वाँ तरही मुशायरा कार्यक्रम।
आज का मुशायरा इन दो मिसरों पर आधारित था:
579 वाँ मिसरा: 'गिरने वालों को सँभलना चाहिए'
अहमद 'अमीर' पाशा
580 वाँ मिसरा: ‘क्यूँ आए हो, क्या सर पे क़ज़ा खेल रही है’।
~ अख़्तर शीरानी
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जायज़ा लीजिए अलग अलग ज़ावियों से इन मिसरों पर लगाई हुई गिरह का;
579 वें मिसरे: 'गिरने वालों को सँभलना चाहिए'
पर 'एक शे'र अर्ज़ किया है' के शायरों की लगाई गईं गिरह:
हार में ही जीत होती है छुपी
'गिरने वालों को सँभलना चाहिए' | 1|
~ लक्ष्मी शंकर बाजपेई, भारत
लाज़िमी हैं हर सफ़र में ठोकरें
'गिरने वालों को सँभलना चाहिए' | 2|
~ लक्ष्मी शंकर बाजपेई, भारत
क्रैश भी होता है शेयर मार्केट
'गिरने वालों को सँभलना चाहिए' | 3|
~ लक्ष्मी शंकर बाजपेई, भारत
इश्क़ की राहें तो हैं फिसलन भरी
'गिरने वालों को सँभलना चाहिए' |
~ प्रज्ञा त्रिवेदी , भारत
उनको मंज़िल तक पहुंचना है अगर
'गिरने वालों को सँभलना चाहिए' |
~ सज्जाद अख़्तर, भारत
गिर न जाएँ वो कहीं नज़रों से भी
'गिरने वालों को सँभलना चाहिए' |
~आलोक अविरल, भारत
क्या पता अगला क़दम मंज़िल पे हो
गिरने वालों को सँभलना चाहिए
राम प्रकाश यति , भारत
हादिसा तो कब का होकर जा चुका,
‘गिरने वालों को सँभलना चाहिए’।
~ अशोक सिंह, न्यूयॉर्क
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580 वें मिसरे: ‘क्यूँ आए हो, क्या सर पे क़ज़ा खेल रही है’
पर 'एक शे'र अर्ज़ किया है' के शायरों की लगाई गईं गिरह:
आ बैल मुझे मार के उल्फ़त ने डसा था
‘क्यूँ आए हो, क्या सर पे क़ज़ा खेल रही है’। 1|
~दिगंबर नासवा, मलेशिया
क्या प्रेम ने काटी थी किसी रोज़ चिकोटी
‘क्यूँ आए हो, क्या सर पे क़ज़ा खेल रही है’। 2|
~दिगंबर नासवा, मलेशिया
जाकर के पहाड़ों पे वो ख़ुद से ही ये बोला
‘क्यूँ आए हो, क्या सर पे क़ज़ा खेल रही है’। 1 |
~ प्रज्ञा त्रिवेदी, भारत
माँ ने ये कहा, देख के पर्चों के नतीजे
‘क्यूँ आए हो, क्या सर पे क़ज़ा खेल रही है’। 2 |
~ प्रज्ञा त्रिवेदी, भारत
पहुँचा था जो घर देर से बीवी ने ये कहा
‘क्यूँ आए हो, क्या सर पे क़ज़ा खेल रही है’। 3 |
~ प्रज्ञा त्रिवेदी, भारत
जज़्बात पे उसे नहीं काबू है ज़रा भी
‘क्यूँ आए हो, क्या सर पे क़ज़ा खेल रही है’।
~ रेणु हुसैन, भारत
पहले तो बुलाना अगर आ जाएं तो कहना
‘क्यूँ आए हो, क्या सर पे क़ज़ा खेल रही है’। 1 |
~ सज्जाद अख़्तर, भारत
हम दश्ते जुनूं में गए तो क़ैस ये बोला
‘क्यूँ आए हो, क्या सर पे क़ज़ा खेल रही है’। 2 |
~ सज्जाद अख़्तर, भारत
घर की गली में देख कर आशिक़ को ये कहा ये
क्यों आये हो क्या सर पे क़ज़ा खेल रही है
रमणी थापर, कैलिफ़ोर्निया
देखा ज़ो पुलिस ने जुलूस ज़ोर से चीखी
क्यूं आए हो क्या सर पे कज़ा खेल रही है
~ लक्ष्मी शंकर बाजपेई, भारत
गाँधी का वतन छोड़ के धर्मांध धरा पर
क्यूँ आए हो क्या तेरी क़ज़ा खेल रही है
राम प्रकाश यति , भारत
माज़ी में पलटता हूँ तो कहती है मुहब्बत
‘क्यूँ आए हो, क्या सर पे क़ज़ा खेल रही है’।
आलोक 'अविरल', भारत
नफ़रत से लगी आग,मोहब्बत से बुझाने?
क्यों आए हो? क्या सर पे क़ज़ा खेल रही है?
खुर्रम 'नूर', भारत
ले आए हो मासूमी से मक़्तल में कहो फिर,
‘क्यूँ आए हो, क्या सर पे क़ज़ा खेल रही है’।
~ अशोक सिंह , न्यूयॉर्क
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संपादक
~ कौसर भुट्टो, दुबई
सुंदर गिरह संग्रह
जवाब देंहटाएंशुक्रिया कौसर जी, good job --pragya
जवाब देंहटाएंआपके श्रम को नमन.. कौसर जी
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