मंगलवार, 21 अक्टूबर 2025

291 वाँ एक शे’र गिरह-नामा: , 18 अक्टूबर,2025

  

291 वाँ एक शे’र गिरह-नामा: , 18 अक्टूबर,2025
एक‌ शे'र‌ अर्ज़ किया है’ मंच के साप्ताहिक 2 तरही मिसरों पर आधारित #डिजिटल_वीडियो_गोष्ठी का 291वाँ तरही मुशायरा कार्यक्रम।


आज का मुशायरा इन दो मिसरों पर आधारित था:

581 वाँ मिसरा: ‘हमेशा घर से वो बाहर मिला घर पर नहीं आया’।
~ हसीर नूरी 

582 वाँ मिसरा:  ‘बदन पे देखिए कब तक लिबास रहता है’।
~ एजाज़ रहमानी 


                            *****^*****


जायज़ा लीजिए अलग अलग ज़ावियों से इन मिसरों पर लगाई हुई गिरह का;

581 वें मिसरे:  'गिरने वालों को सँभलना चाहिए'

पर 'एक शे'र अर्ज़ किया है' के शायरों की लगाई गईं गिरह:


मुझे कमतर समझने की रही हो भावना शायद,
‘हमेशा घर से वो बाहर मिला घर पर नहीं आया’।
~ लक्ष्मी शंकर बाजपेई, भारत


मेरे मॉ बाप से डरता था वो शायद, इसी कारण,
‘हमेशा घर से वो बाहर मिला घर पर नहीं आया’।
~ममता किरण ,  भारत


नहीं अटका जो कोई मामला तो सादगी होगी,
‘हमेशा घर से वो बाहर मिला घर पर नहीं आया’।
~ दिगंबर नासवा, मलेशिया


कभी वादे किए लेकिन निभाने से वो कतराया,
‘हमेशा घर से वो बाहर मिला घर पर नहीं आया’।
~ अकबर शाद 'उदयपुरी', भारत


बहुत हड़काया था  उसको मेरे भैया ने तब  ही से,
‘हमेशा घर से वो बाहर मिला घर पर नहीं आया’। 1।
~ प्रज्ञा त्रिवेदी , भारत


है उसको कुछ तो मेरी गर्दिशों का इल्म भी शायद,
‘हमेशा घर से वो बाहर मिला घर पर नहीं आया’। 2।
 ~ प्रज्ञा त्रिवेदी , भारत


ये आना कोई आना है कि वो आकर नहीं आया,
‘हमेशा घर से वो बाहर मिला घर पर नहीं आया’। 1।
~ सज्जाद अख़्तर, भारत 


न जाने क्या है मजबूरी उसे जो रोक लेती है,
‘हमेशा घर से वो बाहर मिला घर पर नहीं आया’। 2।
~ सज्जाद अख़्तर, भारत 


उजागर हो न जाए असली चेहरा उसका घर आकर,
'हमेशा घर से वो बाहर मिला घर पर नहीं आया' ।
~राम प्रकाश यति, भारत 


मिले फुर्सत कभी उसको दुआ हर रोज़ करती हूँ, 
'हमेशा घर से ही बाहर मिला पर घर नहीं आया'।
~कौसर भुट्टो, दुबई 


नहीं दिलचस्पी थी शायद उसे रिश्ते बनाने में,
‘हमेशा घर से वो बाहर मिला घर पर नहीं आया’। 1|
~ अशोक सिंह, न्यूयॉर्क


पिता जी से वो डरता था यही इक वज़्ह है शायद,
‘हमेशा घर से वो बाहर मिला घर पर नहीं आया’। 2 |
~ अशोक सिंह, न्यूयॉर्क


*✨*☀️**✨**


582 वें मिसरे:  ‘बदन पे देखिए कब तक लिबास रहता है’

पर 'एक शे'र अर्ज़ किया है' के शायरों की लगाई गईं गिरह:


बरस रही है कड़ी धूप आज बादल से 
‘बदन पे देखिए कब तक लिबास रहता है’ |
~दिगंबर नासवा, मलेशिया


 सिगार सा ही सुलग जी रहा हूँ मैं अब तो
‘बदन पे देखिए कब तक लिबास रहता है’ |
~ अकबर शाद 'उदयपुरी', भारत


सुना है उसको लगी लत है जुए सट्टे की,
‘बदन पे देखिए कब तक लिबास रहता है’ |
~ प्रज्ञा त्रिवेदी, भारत


सवाल रोज़ ही करती है रूह ये मुझसे,
‘बदन पे देखिए कब तक लिबास रहता है’ |
~ रेणु हुसैन, भारत 


हूं एक आलमे दीवानगी में सरगरदां,
'बदन पे देखिए कब तक लिबास रहता है' ।
~ सज्जाद अख़्तर, भारत


लगी है होड़ जहां जिस्म के नुमाइश की,
‘बदन पे देखिए कब तक लिबास रहता है’ |
~ लक्ष्मी शंकर बाजपेई, भारत


लगे है लोभियों के घर में ब्याह दी बिटिया,
‘बदन पे देखिए कब तक लिबास रहता है’ |
~ममता किरण ,  भारत


है इस तरह से हुई काँट- छाँट कपड़ों में,
‘बदन पे देखिए कब तक लिबास रहता है’| 1 |
खुर्रम  'नूर', भारत 


ये इस तरह से बढ़ाते गए अगर कर तो,
‘बदन पे देखिए कब तक लिबास रहता है’| 2 |
खुर्रम  'नूर', भारत 


कभी की जा चुकी शर्म ओ हया तो आँखों से,
‘बदन पे देखिए कब तक लिबास रहता है’| 3 |
खुर्रम  'नूर', भारत 

ज़मीर बेचने वालों के बीच बैठा हूँ, 
'बदन पे देखिए कब तक लिबास रहता है'।
~ अशोक सिंह , न्यूयॉर्क

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इस कार्यक्रम का यू-ट्यूब वीडियो देखने के लिए यहाँ क्लिक कीजिए 

youtube link 291



©️सर्वाधिकार सुरक्षित। इस पोस्ट में साझा किए गए सभी गिरह के शे'र 'एक शे'र अर्ज़ किया है' पटल पर शामिल शायरों के हैं। इनमें से कोई भी शे'र शायर की लिखित पूर्व सहमति के बग़ैर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है।


संपादक

~ कौसर भुट्टो, दुबई


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