शनिवार, 25 अक्टूबर 2025

292 वाँ एक शे’र गिरह-नामा: 25 अक्टूबर , 2025

 

292 वाँ एक शेर गिरह-नामा: 25 अक्टूबर , 2025

एक‌ शे'र‌ अर्ज़ किया है’ मंच के साप्ताहिक 2 तरही मिसरों पर आधारित #डिजिटल_वीडियो_गोष्ठी का 292 वाँ तरही मुशायरा कार्यक्रम।

 आज का मुशायरा इन दो मिसरों पर आधारित था:


 583 वाँ मिसरा: 'अब भी तुम मेरी ज़िंदगी हो क्या' |

~जॉन एलिया


584 वाँ मिसरा: 'अपने ही इरादों पे अमल क्यूँ नहीं होता’।

~ हस्तीमल हस्ती

                                 *****^*****

 जायज़ा लीजिए अलग अलग ज़ावियों से इन मिसरों पर लगाई हुई गिरह का;


 583 वें मिसरे

'अब भी तुम मेरी ज़िंदगी हो क्या'

पर 'एक शे'र अर्ज़ किया हैके शायरों की लगाई गईं गिरह:

 

मिट रहा हूँ में मिटते मिटते ही,

'अब भी तुम मेरी ज़िंदगी हो क्या' |

~ दिगंबर नासवामलेशिया

 

तुम मिरे ख़्वाब सब जला आये,

'अब भी तुम मेरी ज़िंदगी हो क्या' |

~ अकबर शाद 'उदयपुरी',  भारत

 

सौ जनम ले के भी ये पूछूँगी,

'अब भी तुम मेरी ज़िंदगी हो क्या' |

~ प्रज्ञा त्रिवेदी भारत

 

बारहा मुझको याद आते हो,

'अब भी तुम मेरी ज़िंदगी हो क्या' |

-रेणु हुसैनभारत

 

बारहा क्यों सवाल उट्ठे दिल में,

'अब भी तुम मेरी ज़िंदगी हो क्या' |

~ के पी सक्सेनाभारत।


अब तलक सांस चल रही है मेरी,

'अब भी तुम मेरी ज़िंदगी हो क्या' |

~ सज्जाद अख्तर ,भारत 


अब तो सांसें बचीं हैं गिनती की,

'अब भी तुम मेरी ज़िंदगी हो क्या' |

ममता किरण भारत


ग़ैर की हो चुकी हो अब तो तुम,

'अब भी तुम मेरी ज़िंदगी हो क्या' |

~ लक्ष्मी शंकर बाजपेईभारत


जी नहीं पा रहा  हूँ  मैं  तुम बिन,

'अब भी तुम मेरी ज़िंदगी हो क्या' |

राम प्रकाश यतिभारत


इस क़दर मुझको लाज़मी हो क्या,

'अब भी तुम मेरी ज़िंदगी हो क्या' |

~ मनोज अबोधभारत


ज़िंदा बाक़ी न ज़िंदगी में जब,

'अब भी तुम मेरी ज़िंदगी हो क्या' |

~ अशोक सिंहन्यूयॉर्क 


**☀️****


 584 वें मिसरे:

'अपने ही इरादों पे अमल क्यूँ नहीं होता’

पर 'एक शे'र अर्ज़ किया हैके शायरों की लगाई गईं गिरह:

 

मैंने तो कई बार किया पुख्ता इरादा,

'अपने ही इरादों पे अमल क्यूँ नहीं होता’ |

-रेणु हुसैनभारत


हर बार किया बंद ग़ज़ल, फिर भी लिखे हम,

'अपने ही इरादों पे अमल क्यूँ नहीं होता’ | 1 |

~ अकबर शाद 'उदयपुरी', भारत

 

हर बार उसे भूलने निकले तो मिले हम,

'अपने ही इरादों पे अमल क्यूँ नहीं होता’ | 2 |

~ अकबर शाद 'उदयपुरी', भारत


 सौ बार ये सोचा है कि हम छोड़ दें चीनी,

'अपने ही इरादों पे अमल क्यूँ नहीं होता’ |

~ लक्ष्मी शंकर बाजपेईभारत

 

कितनी ही दफ़ा सोचा कि खाऊँ न मिठाई,

'अपने ही इरादों पे अमल क्यूँ नहीं होता’ | 1 |

-प्रज्ञा त्रिवेदी ,भारत


 उनसे तो करूँ रूठे ही रहने के जतन पर,

'अपने ही इरादों पे अमल क्यूँ नहीं होता’ | 2 |

-प्रज्ञा त्रिवेदी ,भारत


ज्यूँ इश्क़ तजा तज दूँ ये सिगरेट भी अभी पर,

'अपने ही इरादों पे अमल क्यूँ नहीं होता’ |

दिगंबर नासवामलेशिया

 

क्या अपने इरादों पे कोई बस नहीं अपना,

'अपने ही इरादों पे अमल क्यूँ नहीं होता’ |

~ सज्जाद अख्तर ,भारत 


ख़ुद से ही गुमानात का रिश्ता भी अजब है,

'अपने ही इरादों पे अमल क्यूँ नहीं होता’ |

~ कौसर भुट्टो, यूएई

 

दोहराएँ वही ग़लती करें ख़ुद ये गिला फिर,

'अपने ही इरादों पे अमल क्यूँ नहीं होता’ |

~ अशोक सिंह न्यूयॉर्क


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इस कार्यक्रम का यू-ट्यूब वीडियो देखने के लिए यहाँ क्लिक करिये:

 youtube link

©️सर्वाधिकार सुरक्षित। इस पोस्ट में साझा किए गए सभी गिरह के शे'र 'एक शे'र अर्ज़ किया हैपटल पर शामिल शायरों के हैं। इनमें से कोई भी शे'र शायर की लिखित पूर्व सहमति के बग़ैर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है।

संपादक

~ कौसर भुट्टो, दुबई


 


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