283वाँ एक शे’र गिरह-नामा: 23 अगस्त, 2025
एक शे'र
अर्ज़ किया है’
मंच के साप्ताहिक 2 तरही मिसरों पर आधारित #डिजिटल_वीडियो_गोष्ठी का
283वाँ तरही मुशायरा कार्यक्रम।
~शकील
बदायूनी
566वाँ मिसरा: उस जंगल से रोज़ गुज़रना ठीक नहीं
~ मदन मोहन दानिश
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‘ये तिरी नवाज़िश-ए-मुख़्तसर मिरा दर्द और बढ़ा न दे’
पर 'एक शे'र अर्ज़ किया
है' के
शायरों की लगाई गईं गिरह:
जो नहीं है सच तो बता अभी में बुनूँ न ख़्वाब नए कहीं ,
‘ये तिरी नवाज़िश-ए-मुख़्तसर मिरा दर्द और बढ़ा न दे‘ ।
~ दिगंबर नासवा, मलेशिया
तू जो साथ है तो मुझे यक़ीं है कि दर्द मिटता ही जाएगा,
‘ये तिरी नवाज़िश-ए-मुख़्तसर मिरा दर्द और बढ़ा न दे‘ ।
~ अकबर शाद 'उदयपुरी', भारत
मुझे इल्म है ग़म-ए-इश्क़ का ये रिवायतें न मुझे सिखा,
‘ये तिरी नवाज़िश-ए- मुख़्तसर मिरा दर्द और बढ़ा न दे‘ ।
~ प्रज्ञा त्रिवेदी , भारत
जो मिटा चुके मेरे नाम को ,तो ये हाथ दिल
पे रखा है क्यों
‘ये तिरी नवाज़िश -ए- मुख़्तसर मिरा दर्द और बढ़ा न दे‘ ।
-रेणु हुसैन, भारत
मेरे हौसले पे न भौं चढ़ा मेरी उम्र का तो लिहाज कर,
‘ये तिरी नवाज़िश-ए-मुख़्तसर मिरा दर्द और बढ़ा न दे‘ ।
~ के पी सक्सेना, भारत।
मैं हूँ ख़ुश-फ़ह्म मेरे हाल पे, न मुरव्वतों का
दे जाम अब,
‘ये तिरी नवाज़िश-ए-मुख़्तसर मिरा दर्द और बढ़ा न दे‘।
~ अशोक सिंह, न्यूयॉर्क
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‘उस जंगल से रोज़ गुज़रना ठीक नहीं’
पर 'एक शे'र अर्ज़ किया
है' के
शायरों की लगाई गईं गिरह:
हर आहट पे दिल का धड़कना ठीक नहीं
‘उस जंगल से रोज़ ग़ुज़रना ठीक नहीं’ । 1 |
~ अकबर शाद 'उदयपुरी',
भारत
फिर से तू मिल जायेगा इस ग़फ़लत में
‘उस जंगल से रोज़ ग़ुज़रना ठीक नहीं’ । 2 |
~ अकबर शाद 'उदयपुरी',
भारत
रुख मौसम का बदल रहा है आए दिन,
‘उस जंगल से रोज़ ग़ुज़रना ठीक नहीं’ ।
~ के पी सक्सेना, भारत
जिसके काँटों से भी महक निकलती हो,
‘उस जंगल से रोज़ ग़ुज़रना ठीक नहीं’ ।
~जगदीश पंकज
एक परी काला जादू कर देती है
उस जंगल से रोज गुजरना ठीक नहीं । 1 |
~ लक्ष्मी शंकर बाजपेई, भारत
भूले भटके महानगर में घूम आओ
उस जंगल से रोज़ गुज़रना ठीक नहीं । 2 |
~ लक्ष्मी शंकर बाजपेई, भारत
जानवरों में इक डर सा छा जाता है
उस जंगल से रोज गुजरना ठीक नहीं । 3 |
~ लक्ष्मी शंकर बाजपेई, भारत
क्या जाने कब कौन लुटेरा आ जाए
उस जंगल से रोज़ गुज़रना ठीक नहीं।
~ ममता किरण, भारत
भूल भुलैया जैसी हैं चिंताएँ भी,
‘उस जंगल से रोज़ गुज़रना ठीक नहीं’ । 1 |
चिंताओं का
चक्रव्यूह खा जाएगा
‘उस जंगल से रोज़ गुज़रना ठीक नहीं’ । 2 |
-प्रज्ञा त्रिवेदी ,भारत
आवारा भँवरों की बस्ती आती है
‘उस जंगल से रोज़ गुज़रना ठीक नहीं’ ।
~ दिगंबर नासवा, मलेशिया
यादों के उस जंगल में वीरानी है’
‘उस जंगल से रोज़ गुज़रना ठीक नहीं’ ।
~ सज्जाद अख्तर ,भारत
यादों की किरचें वेधेंगी पाँवों को
‘उस जंगल से रोज़ गुज़रना ठीक नहीं’ ।
~ मनोज अबोध, भारत
जिसके काँटे पाँवों को जख़्मी कर दें,
‘उस जंगल से रोज़ गुज़रना ठीक नहीं’ ।
~ अनमोल प्रकाश शुक्ला
कड़वी यादों के पौधे उग आएँगे,
‘उस जंगल से रोज गुज़रना ठीक नहीं’।
~ कौसर भुट्टो, यूएई
बे-अंदाज़ा इच्छाओं का ठौर है वो,
‘उस
जंगल से रोज़ गुज़रना ठीक नहीं’।
~ अशोक सिंह , न्यूयॉर्क
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इस
कार्यक्रम का यू-ट्यूब वीडियो देखने के लिए यहाँ क्लिक करिये:
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संपादक
~ कौसर भुट्टो, दुबई
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