शनिवार, 25 अक्टूबर 2025

292 वाँ एक शे’र गिरह-नामा: 25 अक्टूबर , 2025

 

292 वाँ एक शेर गिरह-नामा: 25 अक्टूबर , 2025

एक‌ शे'र‌ अर्ज़ किया है’ मंच के साप्ताहिक 2 तरही मिसरों पर आधारित #डिजिटल_वीडियो_गोष्ठी का 292 वाँ तरही मुशायरा कार्यक्रम।

 आज का मुशायरा इन दो मिसरों पर आधारित था:


 583 वाँ मिसरा: 'अब भी तुम मेरी ज़िंदगी हो क्या' |

~जॉन एलिया


584 वाँ मिसरा: 'अपने ही इरादों पे अमल क्यूँ नहीं होता’।

~ हस्तीमल हस्ती

                                 *****^*****

 जायज़ा लीजिए अलग अलग ज़ावियों से इन मिसरों पर लगाई हुई गिरह का;


 583 वें मिसरे

'अब भी तुम मेरी ज़िंदगी हो क्या'

पर 'एक शे'र अर्ज़ किया हैके शायरों की लगाई गईं गिरह:

 

मिट रहा हूँ में मिटते मिटते ही,

'अब भी तुम मेरी ज़िंदगी हो क्या' |

~ दिगंबर नासवामलेशिया

 

तुम मिरे ख़्वाब सब जला आये,

'अब भी तुम मेरी ज़िंदगी हो क्या' |

~ अकबर शाद 'उदयपुरी',  भारत

 

सौ जनम ले के भी ये पूछूँगी,

'अब भी तुम मेरी ज़िंदगी हो क्या' |

~ प्रज्ञा त्रिवेदी भारत

 

बारहा मुझको याद आते हो,

'अब भी तुम मेरी ज़िंदगी हो क्या' |

-रेणु हुसैनभारत

 

बारहा क्यों सवाल उट्ठे दिल में,

'अब भी तुम मेरी ज़िंदगी हो क्या' |

~ के पी सक्सेनाभारत।


अब तलक सांस चल रही है मेरी,

'अब भी तुम मेरी ज़िंदगी हो क्या' |

~ सज्जाद अख्तर ,भारत 


अब तो सांसें बचीं हैं गिनती की,

'अब भी तुम मेरी ज़िंदगी हो क्या' |

ममता किरण भारत


ग़ैर की हो चुकी हो अब तो तुम,

'अब भी तुम मेरी ज़िंदगी हो क्या' |

~ लक्ष्मी शंकर बाजपेईभारत


जी नहीं पा रहा  हूँ  मैं  तुम बिन,

'अब भी तुम मेरी ज़िंदगी हो क्या' |

राम प्रकाश यतिभारत


इस क़दर मुझको लाज़मी हो क्या,

'अब भी तुम मेरी ज़िंदगी हो क्या' |

~ मनोज अबोधभारत


ज़िंदा बाक़ी न ज़िंदगी में जब,

'अब भी तुम मेरी ज़िंदगी हो क्या' |

~ अशोक सिंहन्यूयॉर्क 


**☀️****


 584 वें मिसरे:

'अपने ही इरादों पे अमल क्यूँ नहीं होता’

पर 'एक शे'र अर्ज़ किया हैके शायरों की लगाई गईं गिरह:

 

मैंने तो कई बार किया पुख्ता इरादा,

'अपने ही इरादों पे अमल क्यूँ नहीं होता’ |

-रेणु हुसैनभारत


हर बार किया बंद ग़ज़ल, फिर भी लिखे हम,

'अपने ही इरादों पे अमल क्यूँ नहीं होता’ | 1 |

~ अकबर शाद 'उदयपुरी', भारत

 

हर बार उसे भूलने निकले तो मिले हम,

'अपने ही इरादों पे अमल क्यूँ नहीं होता’ | 2 |

~ अकबर शाद 'उदयपुरी', भारत


 सौ बार ये सोचा है कि हम छोड़ दें चीनी,

'अपने ही इरादों पे अमल क्यूँ नहीं होता’ |

~ लक्ष्मी शंकर बाजपेईभारत

 

कितनी ही दफ़ा सोचा कि खाऊँ न मिठाई,

'अपने ही इरादों पे अमल क्यूँ नहीं होता’ | 1 |

-प्रज्ञा त्रिवेदी ,भारत


 उनसे तो करूँ रूठे ही रहने के जतन पर,

'अपने ही इरादों पे अमल क्यूँ नहीं होता’ | 2 |

-प्रज्ञा त्रिवेदी ,भारत


ज्यूँ इश्क़ तजा तज दूँ ये सिगरेट भी अभी पर,

'अपने ही इरादों पे अमल क्यूँ नहीं होता’ |

दिगंबर नासवामलेशिया

 

क्या अपने इरादों पे कोई बस नहीं अपना,

'अपने ही इरादों पे अमल क्यूँ नहीं होता’ |

~ सज्जाद अख्तर ,भारत 


ख़ुद से ही गुमानात का रिश्ता भी अजब है,

'अपने ही इरादों पे अमल क्यूँ नहीं होता’ |

~ कौसर भुट्टो, यूएई

 

दोहराएँ वही ग़लती करें ख़ुद ये गिला फिर,

'अपने ही इरादों पे अमल क्यूँ नहीं होता’ |

~ अशोक सिंह न्यूयॉर्क


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 youtube link

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संपादक

~ कौसर भुट्टो, दुबई


 


मंगलवार, 21 अक्टूबर 2025

291 वाँ एक शे’र गिरह-नामा: , 18 अक्टूबर,2025

  

291 वाँ एक शे’र गिरह-नामा: , 18 अक्टूबर,2025
एक‌ शे'र‌ अर्ज़ किया है’ मंच के साप्ताहिक 2 तरही मिसरों पर आधारित #डिजिटल_वीडियो_गोष्ठी का 291वाँ तरही मुशायरा कार्यक्रम।


आज का मुशायरा इन दो मिसरों पर आधारित था:

581 वाँ मिसरा: ‘हमेशा घर से वो बाहर मिला घर पर नहीं आया’।
~ हसीर नूरी 

582 वाँ मिसरा:  ‘बदन पे देखिए कब तक लिबास रहता है’।
~ एजाज़ रहमानी 


                            *****^*****


जायज़ा लीजिए अलग अलग ज़ावियों से इन मिसरों पर लगाई हुई गिरह का;

581 वें मिसरे:  'गिरने वालों को सँभलना चाहिए'

पर 'एक शे'र अर्ज़ किया है' के शायरों की लगाई गईं गिरह:


मुझे कमतर समझने की रही हो भावना शायद,
‘हमेशा घर से वो बाहर मिला घर पर नहीं आया’।
~ लक्ष्मी शंकर बाजपेई, भारत


मेरे मॉ बाप से डरता था वो शायद, इसी कारण,
‘हमेशा घर से वो बाहर मिला घर पर नहीं आया’।
~ममता किरण ,  भारत


नहीं अटका जो कोई मामला तो सादगी होगी,
‘हमेशा घर से वो बाहर मिला घर पर नहीं आया’।
~ दिगंबर नासवा, मलेशिया


कभी वादे किए लेकिन निभाने से वो कतराया,
‘हमेशा घर से वो बाहर मिला घर पर नहीं आया’।
~ अकबर शाद 'उदयपुरी', भारत


बहुत हड़काया था  उसको मेरे भैया ने तब  ही से,
‘हमेशा घर से वो बाहर मिला घर पर नहीं आया’। 1।
~ प्रज्ञा त्रिवेदी , भारत


है उसको कुछ तो मेरी गर्दिशों का इल्म भी शायद,
‘हमेशा घर से वो बाहर मिला घर पर नहीं आया’। 2।
 ~ प्रज्ञा त्रिवेदी , भारत


ये आना कोई आना है कि वो आकर नहीं आया,
‘हमेशा घर से वो बाहर मिला घर पर नहीं आया’। 1।
~ सज्जाद अख़्तर, भारत 


न जाने क्या है मजबूरी उसे जो रोक लेती है,
‘हमेशा घर से वो बाहर मिला घर पर नहीं आया’। 2।
~ सज्जाद अख़्तर, भारत 


उजागर हो न जाए असली चेहरा उसका घर आकर,
'हमेशा घर से वो बाहर मिला घर पर नहीं आया' ।
~राम प्रकाश यति, भारत 


मिले फुर्सत कभी उसको दुआ हर रोज़ करती हूँ, 
'हमेशा घर से ही बाहर मिला पर घर नहीं आया'।
~कौसर भुट्टो, दुबई 


नहीं दिलचस्पी थी शायद उसे रिश्ते बनाने में,
‘हमेशा घर से वो बाहर मिला घर पर नहीं आया’। 1|
~ अशोक सिंह, न्यूयॉर्क


पिता जी से वो डरता था यही इक वज़्ह है शायद,
‘हमेशा घर से वो बाहर मिला घर पर नहीं आया’। 2 |
~ अशोक सिंह, न्यूयॉर्क


*✨*☀️**✨**


582 वें मिसरे:  ‘बदन पे देखिए कब तक लिबास रहता है’

पर 'एक शे'र अर्ज़ किया है' के शायरों की लगाई गईं गिरह:


बरस रही है कड़ी धूप आज बादल से 
‘बदन पे देखिए कब तक लिबास रहता है’ |
~दिगंबर नासवा, मलेशिया


 सिगार सा ही सुलग जी रहा हूँ मैं अब तो
‘बदन पे देखिए कब तक लिबास रहता है’ |
~ अकबर शाद 'उदयपुरी', भारत


सुना है उसको लगी लत है जुए सट्टे की,
‘बदन पे देखिए कब तक लिबास रहता है’ |
~ प्रज्ञा त्रिवेदी, भारत


सवाल रोज़ ही करती है रूह ये मुझसे,
‘बदन पे देखिए कब तक लिबास रहता है’ |
~ रेणु हुसैन, भारत 


हूं एक आलमे दीवानगी में सरगरदां,
'बदन पे देखिए कब तक लिबास रहता है' ।
~ सज्जाद अख़्तर, भारत


लगी है होड़ जहां जिस्म के नुमाइश की,
‘बदन पे देखिए कब तक लिबास रहता है’ |
~ लक्ष्मी शंकर बाजपेई, भारत


लगे है लोभियों के घर में ब्याह दी बिटिया,
‘बदन पे देखिए कब तक लिबास रहता है’ |
~ममता किरण ,  भारत


है इस तरह से हुई काँट- छाँट कपड़ों में,
‘बदन पे देखिए कब तक लिबास रहता है’| 1 |
खुर्रम  'नूर', भारत 


ये इस तरह से बढ़ाते गए अगर कर तो,
‘बदन पे देखिए कब तक लिबास रहता है’| 2 |
खुर्रम  'नूर', भारत 


कभी की जा चुकी शर्म ओ हया तो आँखों से,
‘बदन पे देखिए कब तक लिबास रहता है’| 3 |
खुर्रम  'नूर', भारत 

ज़मीर बेचने वालों के बीच बैठा हूँ, 
'बदन पे देखिए कब तक लिबास रहता है'।
~ अशोक सिंह , न्यूयॉर्क

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संपादक

~ कौसर भुट्टो, दुबई


मंगलवार, 7 अक्टूबर 2025

290 वाँ एक शे’र गिरह-नामा: , 11 अक्टूबर,2025

 

290 वाँ एक शे’र गिरह-नामा: , 11 अक्टूबर,2025
एक‌ शे'र‌ अर्ज़ किया है’ मंच के साप्ताहिक 2 तरही मिसरों पर आधारित #डिजिटल_वीडियो_गोष्ठी का 290वाँ तरही मुशायरा कार्यक्रम।


आज का मुशायरा इन दो मिसरों पर आधारित था:

579 वाँ मिसरा: 'गिरने वालों को सँभलना चाहिए'
अहमद 'अमीर' पाशा

580 वाँ मिसरा: ‘क्यूँ आए हो, क्या सर पे क़ज़ा खेल रही है’।
~ अख़्तर शीरानी 


                            *****^*****


जायज़ा लीजिए अलग अलग ज़ावियों से इन मिसरों पर लगाई हुई गिरह का;

579 वें मिसरे:  'गिरने वालों को सँभलना चाहिए'


पर 'एक शे'र अर्ज़ किया है' के शायरों की लगाई गईं गिरह:


हार में ही जीत होती है छुपी
 'गिरने वालों को सँभलना चाहिए' | 1|
~ लक्ष्मी शंकर बाजपेई, भारत


लाज़िमी हैं हर सफ़र में ठोकरें 
 'गिरने वालों को सँभलना चाहिए' | 2|
~ लक्ष्मी शंकर बाजपेई, भारत


क्रैश भी होता है शेयर मार्केट 
 'गिरने वालों को सँभलना चाहिए' | 3|
~ लक्ष्मी शंकर बाजपेई, भारत


इश्क़ की राहें तो हैं फिसलन भरी
 'गिरने वालों को सँभलना चाहिए' |
~ प्रज्ञा त्रिवेदी , भारत

 
उनको मंज़िल तक पहुंचना है अगर
 'गिरने वालों को सँभलना चाहिए' |
~ सज्जाद अख़्तर, भारत 


गिर न जाएँ वो कहीं नज़रों से भी 
 'गिरने वालों को सँभलना चाहिए' |
~आलोक अविरल, भारत 


क्या पता अगला क़दम मंज़िल पे हो
गिरने वालों को सँभलना चाहिए
राम प्रकाश यति , भारत 


हादिसा तो कब का होकर जा चुका,
‘गिरने वालों को सँभलना चाहिए’।
~ अशोक सिंह, न्यूयॉर्क


*✨*☀️**✨**


580 वें मिसरे:   ‘क्यूँ आए हो, क्या सर पे क़ज़ा खेल रही है’

पर 'एक शे'र अर्ज़ किया है' के शायरों की लगाई गईं गिरह:



आ बैल मुझे मार के उल्फ़त ने डसा था 
‘क्यूँ आए हो, क्या सर पे क़ज़ा खेल रही है’। 1|
~दिगंबर नासवा, मलेशिया


क्या प्रेम ने काटी थी किसी रोज़ चिकोटी 
‘क्यूँ आए हो, क्या सर पे क़ज़ा खेल रही है’। 2|
~दिगंबर नासवा, मलेशिया


जाकर  के पहाड़ों पे  वो ख़ुद  से ही ये बोला
‘क्यूँ आए हो, क्या सर पे क़ज़ा खेल रही है’। 1 |
~ प्रज्ञा त्रिवेदी, भारत


माँ ने ये कहा, देख के पर्चों के नतीजे
‘क्यूँ आए हो, क्या सर पे क़ज़ा खेल रही है’। 2 |
~ प्रज्ञा त्रिवेदी, भारत


पहुँचा  था जो घर  देर से बीवी ने ये कहा
‘क्यूँ आए हो, क्या सर पे क़ज़ा खेल रही है’। 3 |
~ प्रज्ञा त्रिवेदी, भारत


जज़्बात पे उसे नहीं काबू है ज़रा भी 
‘क्यूँ आए हो, क्या सर पे क़ज़ा खेल रही है’।
~ रेणु हुसैन, भारत 


पहले तो बुलाना अगर आ जाएं तो कहना
‘क्यूँ आए हो, क्या सर पे क़ज़ा खेल रही है’। 1 |
~ सज्जाद अख़्तर, भारत


हम दश्ते जुनूं में गए तो क़ैस ये बोला
‘क्यूँ आए हो, क्या सर पे क़ज़ा खेल रही है’। 2 |
~ सज्जाद अख़्तर, भारत


घर की गली में देख कर आशिक़ को ये कहा ये 
क्यों आये हो क्या सर पे क़ज़ा खेल रही है
रमणी थापर, कैलिफ़ोर्निया 


देखा ज़ो पुलिस ने जुलूस ज़ोर से चीखी
क्यूं आए हो क्या सर पे कज़ा खेल रही है
~ लक्ष्मी शंकर बाजपेई, भारत


गाँधी का वतन  छोड़  के धर्मांध धरा पर
क्यूँ आए हो क्या तेरी क़ज़ा खेल रही है
राम प्रकाश यति , भारत 

माज़ी में पलटता हूँ तो कहती है मुहब्बत 
‘क्यूँ आए हो, क्या सर पे क़ज़ा खेल रही है’।
आलोक 'अविरल', भारत

नफ़रत से लगी आग,मोहब्बत से बुझाने?
क्यों आए हो? क्या सर पे क़ज़ा खेल रही है?
खुर्रम  'नूर', भारत 


ले आए हो मासूमी से मक़्तल में कहो फिर,
‘क्यूँ आए हो, क्या सर पे क़ज़ा खेल रही है’।
~ अशोक सिंह , न्यूयॉर्क

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©️सर्वाधिकार सुरक्षित। इस पोस्ट में साझा किए गए सभी गिरह के शे'र 'एक शे'र अर्ज़ किया है' पटल पर शामिल शायरों के हैं। इनमें से कोई भी शे'र शायर की लिखित पूर्व सहमति के बग़ैर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है।


संपादक

~ कौसर भुट्टो, दुबई


शनिवार, 4 अक्टूबर 2025

289 वाँ एक शे’र गिरह-नामा: 4 अक्टूबर, 2025

289 वाँ एक शे’र गिरह-नामा: , 4 अक्टूबर,2025
एक‌ शे'र‌ अर्ज़ किया है’ मंच के साप्ताहिक 2 तरही मिसरों पर आधारित #डिजिटल_वीडियो_गोष्ठी का 289वाँ तरही मुशायरा कार्यक्रम।


आज का मुशायरा इन दो मिसरों पर आधारित था:

577 वाँ मिसरा: 'वगरना उनके दिल में इतनी गहराई नहीं होती'। 
~ डॉ कैलाश गुरू स्वामी

578 वाँ मिसरा: ‘ऐ दिल बता तू इतने समय तक कहाँ रहा’।
~ अनिल गहलौत 


                            *****^*****


जायज़ा लीजिए अलग अलग ज़ावियों से इन मिसरों पर लगाई हुई गिरह का;

577 वें मिसरे: 'वगरना उनके दिल में इतनी गहराई नहीं होती'

पर 'एक शे'र अर्ज़ किया है' के शायरों की लगाई गईं गिरह:


 गनीमत है उन्हें याद आ गये शायद पुराने दिन ,
'वगरना उनके दिल में इतनी गहराई नहीं होती' । 1।
~ लक्ष्मी शंकर बाजपेई, भारत


 चुनावों के है दिन उनको सभी से वोट लेने हैं ,
'वगरना उनके दिल में इतनी गहराई नहीं होती' । 2।
~ लक्ष्मी शंकर बाजपेई, भारत


 उन्हें मालूम है उनको पड़ेगा काम कुछ दिन में,
'वगरना उनके दिल में इतनी गहराई नहीं होती' । 3।
~ लक्ष्मी शंकर बाजपेई, भारत


कहा था कार्डियोलॉजिस्ट ने लेकिन नहीं माने
'वगरना उनके दिल में इतनी गहराई नहीं होती'
~ लक्ष्मी शंकर बाजपेई, भारत


सफ़र की धूप में शायद तपे हैं ज़ियादा वो भी,
'वगरना उनके दिल में इतनी गहराई नहीं होती' ।
~ममता किरण ,  भारत


कोई तो ज़ख़्म है नासूर बन कर जो सुलगता है 
'वगरना उनके दिल में इतनी गहराई नहीं होती' ।
~ दिगंबर नासवा, मलेशिया


न जाने कम-सिनी में कितनी ही चोटें मिली होंगी ,
'वगरना उनके दिल में इतनी गहराई नहीं होती' । 1।
~ प्रज्ञा त्रिवेदी , भारत


उन्होंने ख़ूब साधु संतों का सान्न्ध्यि है पाया
'वगरना उनके दिल मे इतनी गहराई नहीं होती' ।
~ प्रज्ञा त्रिवेदी , भारत


ये तो हम हैं, तबज्जो जो दे रहे हैं उन्हें हरदम 
'वगरना उनके दिल में इतनी गहराई नहीं होती’ ।
~के पी सक्सेना, भारत 


मुझे लगता है वो भी प्यार में दिल हार बैठे हैं,
'वगरना उनके दिल में इतनी गहराई नहीं होती' ।
~ अनमोल प्रकाश शुक्ला, भारत 


कहानी में उतरता है वो रोता है बिलखता है
 ‘वगरना उसके दिल में इतनी गहराई नहीं होती’।
~ रेणु हुसैन, भारत 


कोई तो ज़ख़्म जा उतरा रग-ए-जाँ में बहुत गहरे,
‘वगरना उनके दिल में इतनी गहराई नहीं होती’। 1।
~ अशोक सिंह, न्यूयॉर्क


गुरु कैलाश के चक्कर का है कोई असर उन पर,
‘वगरना उनके दिल में इतनी गहराई नहीं होती’। 2 ।
~ अशोक सिंह, न्यूयॉर्क


*✨*☀️**✨**


578 वें मिसरे:  ‘‘ऐ दिल बता तू इतने समय तक कहाँ रहा’

पर 'एक शे'र अर्ज़ किया है' के शायरों की लगाई गईं गिरह:


इन तितलियों के बीच ही था बाँटना मुझे 
'ऐ दिल बता तू इतने समय तक कहाँ रहा' । 1।
~दिगंबर नासवा, मलेशिया


चिश्मिश सी एक लड़की को देना था प्यार से 
'ऐ दिल बता तू इतने समय तक कहाँ रहा' । 2।
~दिगंबर नासवा, मलेशिया


माना कि,कुछ दिनों से बढ़ी है अवारगी!
'ऐ दिल बता तू इतने समय तक कहाँ रहा’।
~के पी सक्सेना, भारत 


 हर मोड़ शाद ढूँढा तुझे मैंने रात-दिन,
'ऐ दिल बता तू इतने समय तक कहाँ रहा' । 1 ।
~ अकबर शाद 'उदयपुरी', भारत


हर एक लम्हा तेरी कमी ने सताया है,
'ऐ दिल बता तू इतने समय तक कहाँ रहा' । 2।
~ अकबर शाद 'उदयपुरी', भारत


धड़का है तब, कि खेल ये तेरे लगें फ़िज़ूल
'ऐ दिल बता तू इतने समय तक कहाँ रहा' ।
~ प्रज्ञा त्रिवेदी, भारत


मैं चौंक चौंक जाता था  अनजाने ख़ौफ़ से 
'ऐ दिल बता तू इतने समय तक कहां रहा' ।
~ सज्जाद अख़्तर, भारत


तेरी तलाश थी मुझे हर सिम्त हर तरफ़,
'ऐ दिल बता तू इतने समय तक कहां रहा' ।
~ रेनू हुसैन, भारत


इन धड़कनों से हो रहा आवारगी का शक,
'अय दिल बता तू इतने समय तक कहाँ रहा '।
ख़ुर्रम 'नूर' भारत


धड़कन भी लड़खड़ाई नहीं ऐसे जतन से,
‘ऐ दिल बता तू इतने समय तक कहाँ रहा’।
~ अशोक सिंह , न्यूयॉर्क

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इस कार्यक्रम का यू-ट्यूब वीडियो देखने के लिए यहाँ क्लिक कीजिए 

https://youtu.be/gCTco5XyfTk



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संपादक

~ कौसर भुट्टो, दुबई


रविवार, 28 सितंबर 2025

288 वाँ एक शे’र गिरह-नामा: 27 सितंबर, 2025

 

288 वाँ एक शे’र गिरह-नामा: 27 सितंबर, 2025
एक‌ शे'र‌ अर्ज़ किया है’ मंच के साप्ताहिक 2 तरही मिसरों पर आधारित #डिजिटल_वीडियो_गोष्ठी का 288 वाँ तरही मुशायरा कार्यक्रम।


आज का मुशायरा इन दो मिसरों पर आधारित था:

575 वाँ मिसरा: 'थोड़ा बहुत ख़राब तो होना भी चाहिए' |
~ जव्वाद  शेख


576 वाँ मिसरा: ‘गुफ़्तुगू कर के कोई हल तो निकाला होता’।
~ मधु मधुमन



                            *****^*****


जायज़ा लीजिए अलग अलग ज़ावियों से इन मिसरों पर लगाई हुई गिरह का;

573 वें मिसरे: 'थोड़ा बहुत ख़राब तो होना भी चाहिए' 

पर 'एक शे'र अर्ज़ किया है' के शायरों की लगाई गईं गिरह:


अच्छे बहुत रहे तो न जी पाएंगे यहाँ,
'थोड़ा बहुत ख़राब तो होना भी चाहिए' ।
~मनोज 'अबोध' , भारत


हां है खराबी देता हूं चोरों को गालियां,
'थोड़ा बहुत ख़राब तो होना भी चाहिए' |
~ लक्ष्मी शंकर बाजपेई, भारत


मुश्किल है दौर-ए-आज में अच्छा बनें रहें,
'थोड़ा बहुत ख़राब तो होना भी चाहिए' |
~ममता किरण ,  भारत


दो चार ऐब और है एकाध नुक़्स ही,
'थोड़ा बहुत ख़राब तो होना भी चाहिए' |
~ दिगंबर नासवा, मलेशिया


एकाध ही तो मुझमें बुराई है आज कल
'थोड़ा बहुत ख़राब तो होना भी चाहिए' |
~ दिगंबर नासवा, मलेशिया


दुनिया के सिलसिले में तमाशा भी चाहिए,
'थोड़ा बहुत ख़राब तो होना भी चाहिए' ।
~ अकबर शाद 'उदयपुरी', भारत


कर दी हैं माफ़ उनकी जफाएँ ये सोचकर
'थोड़ा बहुत ख़राब तो होना भी चाहिए' |
~ प्रज्ञा त्रिवेदी , भारत

 
इंसान हूं मैं कोई फ़रिश्ता नहीं.... मुझे
'थोड़ा बहुत ख़राब तो होना भी चाहिए' | 1|
~ सज्जाद अख़्तर, भारत 


जो बाप की कमाई पे करता हो ऐश उसे
'थोड़ा बहुत ख़राब तो होना भी चाहिए' | 2|
~ सज्जाद अख़्तर, भारत 


आती नहीं है काम शराफ़त सभी जगह
'थोड़ा बहुत ख़राब तो होना भी चाहिए' |
के पी सक्सेना, भारत 


ख़ाना ख़राब इश्क़ को चढ़ते शबाब को 
थोड़ा बहुत  ख़राब तो  होना भी चाहिए
~ अनिमेष शर्मा, भारत 


अच्छे को अच्छा जान के सब लेंगे फ़ायदा,
'थोड़ा बहुत ख़राब तो होना भी चाहिए' |
~ अशोक सिंह, न्यूयॉर्क


*✨*☀️**✨**


576 वें मिसरे:  ‘गुफ़्तुगू कर के कोई हल तो निकाला होता’

पर 'एक शे'र अर्ज़ किया है' के शायरों की लगाई गईं गिरह:


बेरुख़ी ठीक है आँखों की लबों से लेकिन 
‘गुफ़्तुगू कर के कोई हल तो निकाला होता’ ।
~दिगंबर नासवा, मलेशिया


कहने-सुनने से सुलझ जाते हैं कितने मुद्दे!
‘गुफ़्तुगू कर के कोई हल तो निकाला होता’ ।
~के पी सक्सेना, भारत 


सच की आवाज़ को क्यों मौन बना डाला है
‘गुफ़्तुगू कर के कोई हल तो निकाला होता’ |
~ अकबर शाद 'उदयपुरी', भारत


वो ही  होगा जो रचा 'उसने' तो फिर क्यों सोचें!
‘गुफ़्तुगू कर के कोई हल तो निकाला होता’ |
~ प्रज्ञा त्रिवेदी, भारत


दूर जाने की भला  जल्दी  थी क्यों  दोनों को
‘गुफ़्तुगू कर के कोई हल तो निकाला होता’ | 2 ।
~ प्रज्ञा त्रिवेदी, भारत


आप भी ऐंठ गए अपनी अकड़ में इतने,
‘गुफ़्तुगू कर के कोई हल तो निकाला होता’ |
~ मनोज अबोध, भारत


खोल तो लेते बँधीं अपने दिलों की गांठें,
'गुफ्तगू करके कोई हल तो निकाला होता' | 
~ अनमोल प्रकाश शुक्ला, भारत 


बेवजह बात बढ़ा कर न हुआ कुछ हासिल 
'गुफ्तगू करके कोई हल तो निकाला होता' | 
~ रेणु हुसैन, भारत 


पेश क़दमी से ये माहौल बदल सकता था 
'गुफ्तगू करके कोई हल तो निकाला होता' ।
~ सज्जाद अख़्तर, भारत


क्यों पुलिस वाले से भिड़ कर ये मुसीबत ले ली 
'गुफ्तगू करके कोई हल तो निकाला होता' | 1 |
~ लक्ष्मी शंकर बाजपेई, भारत


अपनी इक ज़िद से ही माहौल बिगाड़ा तुमने
'गुफ्तगू करके कोई हल तो निकाला होता' | 2 |
~ लक्ष्मी शंकर बाजपेई, भारत


दर्द बच्चों का बिना सोचे अलग हो बैठे 
'गुफ्तगू करके कोई हल तो निकाला होता' | 3 |
~ लक्ष्मी शंकर बाजपेई, भारत


पांच सौ रुपयों पे बस छोड़ा है कवि सम्मेलन 
'गुफ्तगू करके कोई हल तो निकाला होता' | 4 |
~ लक्ष्मी शंकर बाजपेई, भारत


ये अहंकार तुम्हारा न कहीं ले डूबे,
'गुफ़्तगू करके कोई हल तो निकाला होता'।
~ममता किरण ,  भारत


ढाक के तीन वही पात थे हरदम जो कहें,
‘गुफ़्तुगू कर के कोई हल तो निकाला होता’। 1 |
~ अशोक सिंह , न्यूयॉर्क


कोई मफ़रूज़ा बना रक्खा था मन ही मन में, 
‘गुफ़्तुगू कर के कोई हल तो निकाला होता’। 2 |
*मफ़रूज़ा=काल्पनिक बात, भ्रम
~ अशोक सिंह , न्यूयॉर्क

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इस कार्यक्रम का यू-ट्यूब वीडियो देखने के लिए यहाँ क्लिक कीजिए 

https://youtu.be/3pfbLsPio8Uyoutube link



©️सर्वाधिकार सुरक्षित। इस पोस्ट में साझा किए गए सभी गिरह के शे'र 'एक शे'र अर्ज़ किया है' पटल पर शामिल शायरों के हैं। इनमें से कोई भी शे'र शायर की लिखित पूर्व सहमति के बग़ैर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है।


संपादक

~ कौसर भुट्टो, दुबई


रविवार, 14 सितंबर 2025

287 वाँ एक शे’र गिरह-नामा: 20 सितंबर, 2025

 

287 वाँ एक शे’र गिरह-नामा: 20 सितंबर, 2025
एक‌ शे'र‌ अर्ज़ किया है’ मंच के साप्ताहिक 2 तरही मिसरों पर आधारित #डिजिटल_वीडियो_गोष्ठी का 287 वाँ तरही मुशायरा कार्यक्रम।


आज का मुशायरा इन दो मिसरों पर आधारित था:

573 वाँ मिसरा: 'और प्यार में थोड़ी सी कमी कम नहीं होती'। 
~ अकील नोमानी

574 वाँ मिसरा: ‘अकेला रह गया है रास्ता अब’।
~ प्रदीप चौबे


                            *****^*****


जायज़ा लीजिए अलग अलग ज़ावियों से इन मिसरों पर लगाई हुई गिरह का;

573 वें मिसरे: 'और प्यार में थोड़ी सी कमी कम नहीं होती'

पर 'एक शे'र अर्ज़ किया है' के शायरों की लगाई गईं गिरह:



ये बीच की दीवानगी थोड़ी सी हुई कम
*और प्यार में थोड़ी सी कमी कम नहीं होती*
~मनोज 'अबोध' , भारत


जीवन में कहीं हो कमी स्वीकार है मुझको 
'और प्यार में थोड़ी सी कमी कम नहीं होती' ।
~ममता किरण ,  भारत


जीवन की उलझनों में कहीं प्यार भी उलझा
'और प्यार में थोड़ी सी कमी कम नहीं होती' ।
~ लक्ष्मी शंकर बाजपेई, भारत


यह प्यार खुले-आम न जतलाना कमी है 
'और प्यार में थोड़ी सी कमी कम नहीं होती' |
~ दिगंबर नासवा, मलेशिया


कुछ ख़्वाब तेरी आँखों में पूरे नहीं होते
'और प्यार में थोड़ी सी कमी कम नहीं होती' |
~ अकबर शाद 'उदयपुरी', भारत


कुछ तो है वजह बातें मुलाक़ातें हुईं कम
'और प्यार में थोड़ी सी कमी कम नहीं होती' | 1|
~ प्रज्ञा त्रिवेदी , भारत


जो आँच शरर जैसी थी अब होने लगी कम
'और प्यार में थोड़ी सी कमी कम नहीं होती' | 2|
~ प्रज्ञा त्रिवेदी , भारत


 है प्यार मगर प्यार की शिद्दत में कमी है, 
'और प्यार में थोड़ी सी कमी कम नहीं होती' ।
~ सज्जाद अख़्तर, भारत 


बढ़ जाए अगर हद से ज़ियादा तो भी कम है, 
'और प्यार में थोड़ी सी कमी कम नहीं होती'।
~ अशोक सिंह, न्यूयॉर्क




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574 वें मिसरे:  ‘अकेला रह गया है रास्ता अब’

पर 'एक शे'र अर्ज़ किया है' के शायरों की लगाई गईं गिरह:


न सिगरेट, चाय, भँवरे, तुम, न तितली 
'अकेला रह गया है रास्ता अब' |
~दिगंबर नासवा, मलेशिया


सितम तूफ़ान ने ढाया है ऐसा
‘अकेला रह गया है रास्ता अब’।
~प्रेम बिहारी मिश्र, भारत


सभी पहुँचे हैं मंज़िल उस पे चल के,
‘अकेला रह गया है रास्ता अब’।
खुर्रम नूर , भारत 


चले थे साथ जो सब खो गए हैं
'अकेला रह गया है रास्ता अब' |
~ अकबर शाद 'उदयपुरी', भारत


जिन्हें जाना था वे सब जा चुके हैं
'अकेला रह गया है रास्ता अब' |
~ प्रज्ञा त्रिवेदी, भारत


लगे जब लोग उड़ने, हैं हवा में 
'अकेला रह गया है रास्ता अब' ।
के पी सक्सेना, भारत 


छुटा है साथ कुछ यूँ रहनुमा का
'अकेला रह गया है रास्ता अब' |
~ मनोज अबोध, भारत


किनारे  के  कटे  हैं  पेड़   सारे 
'अकेला रह गया है रास्ता अब' |
 ~रूबी  मोहंती , भारत 


किनारों पर उग आयीं नागफनियाँ 
'अकेला रह गया है रास्ता अब' |
~ अनमोल प्रकाश शुक्ला, भारत 


मुसाफ़िर तक नहीं मेरा है कोई 
'अकेला रह गया है रास्ता अब' |
~ रेणु हुसैन, भारत 


न मंज़िल है न मंज़िल के निशाँ हैं 
'अकेला रह गया है रास्ता अब' | 1|
~ सज्जाद अख़्तर, भारत


मुझे मंज़िल पे जाकर याद आया
'अकेला रह गया है रास्ता अब' | 2|
~ सज्जाद अख़्तर, भारत


हमारे दम से थी रौनक़ वहां पर
'अकेला रह गया है रास्ता अब' | 3|
~ सज्जाद अख़्तर, भारत


मुझे तो मिल गई है अपनी मंज़िल 
'अकेला रह गया है रास्ता अब' |
~ लक्ष्मी शंकर बाजपेई, भारत


 बिछुड़ते ही गये जो हमसफ़र थे
'अकेला रह गया है रास्ता अब' |
~ लक्ष्मी शंकर बाजपेई, भारत


 शजर थोड़े से हैं कहने को साथी
'अकेला रह गया है रास्ता अब' |
~ लक्ष्मी शंकर बाजपेई, भारत


बदल ली राह मैंने अपनी इक दिन 
'अकेला रह गया है रास्ता अब' |
~ममता किरण ,  भारत


न  तितली है  न  भँवरे हैं  न  पंछी
'अकेला रह गया है रास्ता अब' |
~ अनिमेष शर्मा, भारत 


चले थे साथ फिर लौटे न उस पर 
'अकेला रह गया है रास्ता अब' |
~रमणी थापर ,कैलिफ़ोर्निया 


चला बच कर ज़माने से जो कल तक,
‘अकेला रह गया है रास्ता अब’।
~ अशोक सिंह , न्यूयॉर्क


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इस कार्यक्रम का यू-ट्यूब वीडियो देखने के लिए यहाँ क्लिक कीजिए 

youtube link for 287th mushaira

©️सर्वाधिकार सुरक्षित। इस पोस्ट में साझा किए गए सभी गिरह के शे'र 'एक शे'र अर्ज़ किया है' पटल पर शामिल शायरों के हैं। इनमें से कोई भी शे'र शायर की लिखित पूर्व सहमति के बग़ैर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है।


संपादक

~ कौसर भुट्टो, दुबई


286वाँ एक शे’र गिरह-नामा: 13 सितंबर, 2025

 

286वाँ एक शेर गिरह-नामा: 13 सितंबर, 2025

एक‌ शे'र‌ अर्ज़ किया है’ मंच के साप्ताहिक 2 तरही मिसरों पर आधारित #डिजिटल_वीडियो_गोष्ठी का 286 वाँ तरही मुशायरा कार्यक्रम।

आज का मुशायरा इन दो मिसरों पर आधारित था:

571 वाँ मिसरा: ‘ख़ुद को तबाह कर लिया और कुछ मलाल भी नहीं'

~ जॉन एलिया

572 वाँ मिसरा: 'हर कहानी मिरी कहानी है'

~ फ़िराक़ गोरखपुरी

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जायज़ा लीजिए अलग अलग ज़ावियों से इन मिसरों पर लगाई हुई गिरह का;

571 वें मिसरे:  'ख़ुद को तबाह कर लिया और कुछ मलाल भी नहीं'

पर 'एक शे'र अर्ज़ किया हैके शायरों की लगाई गईं गिरह:


सच की लड़ाई मैं लड़ा तो साथ कोई भी न था

'ख़ुद को तबाह कर लिया और कुछ मलाल भी नहीं' l

मनोज 'अबोध' , भारत


ये हौसला है इश्क़ से ताक़त है इश्क़ की ग़ज़ब 

'ख़ुद को तबाह कर लिया और कुछ मलाल भी नहीं' l

प्रेम बिहारी मिश्र, भारत


मेरी ही ख़्वाहिशें थीं औ मेरा जुनूं था इसलिए 

'ख़ुद को तबाह कर लिया और कुछ मलाल भी नहीं’ |

लक्ष्मी शंकर बाजपेईभारत


हर चोट सह ली ज़िस्म पे शायद उन्हें भी दर्द हो 

'ख़ुद को तबाह कर लिया और कुछ मलाल भी नहीं' l

~ दिगंबर नासवामलेशिया


हमने वफ़ा की राह में सब कुछ लुटा दिया था जो

'ख़ुद को तबाह कर लिया और कुछ मलाल भी नहीं।’ |

~ अकबर शाद 'उदयपुरी', भारत


जलने से  इश्क़ में कभी परवाना वो नहीं डरा

'ख़ुद को तबाह कर लिया और कुछ मलाल भी नहीं' l

~ प्रज्ञा त्रिवेदी भारत

 

था इश्क़ का सुरूर मेरे सिर पे ऐसे चढ़ गया 

‘ख़ुद को तबाह कर लिया और कुछ मलाल भी नहीं’। 1 l

~ रेणु हुसैन, भारत


सर पर कफ़न को बाँध कर जब चल दिए थे नौजवाँ 

'ख़ुद को तबाह कर लिया और कुछ मलाल भी नहीं’ l 2 l

रेणु हुसैनभारत


बेसुध पड़े हुए हैं वो दुनिया जहां से बेख़बर

'ख़ुद को तबाह कर लिया और कुछ मलाल भी नहीं' |

~ सज्जाद अख़्तर, भारत 


छोड़ी किसी के वास्ते इस ज़िंदगी की हर ख़ुशी 

'ख़ुद को तबाह कर लिया और कुछ मलाल भी नहीं' l

~रूबी मोहंती, भारत


समझा न बात की कोई संजीदगी ये दिल कभी, 

‘ख़ुद को तबाह कर लिया और कुछ मलाल भी नहीं’ l

~ अशोक सिंह, न्यूयॉर्क


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572 वें मिसरे: 'हर कहानी मिरी कहानी है'

पर 'एक शे'र अर्ज़ किया हैके शायरों की लगाई गईं गिरह:


रो रहा कर के इश्क़ हर कोई,

 'हर कहानी मिरी कहानी है' ।

~दिगंबर नासवा, मलेशिया


दर्द ही ज़िंदगी रवानी है,

हर कहानी मिरी कहानी है।

अकबर शाद 'उदयपुरी', भारत


हर कहानी में ख़ूब रोती हूँ

'हर कहानी मेरी कहानी है' ।

प्रज्ञा त्रिवेदीभारत


क्या सुनाऊं मैं दास्तॉं तुमको

 हर कहानी मिरी कहानी है।

के पी सक्सेना, भारत 


सारे क़िरदार मेरे अपने हैं

'हर कहानी मेरी कहानी है' ।

~ मनोज अबोधभारत

 

प्यार में जिसका भी है दिल टूटा,

'हर कहानी मेरी कहानी है' ।

~ अनमोल प्रकाश शुक्ला,  भारत 


ज़ख़्म,आँसू कि दर्द कह लो तुम 

हर कहानी मिरी कहानी है

रेणु हुसैन, भारत


हर फ़साना मेरा फ़साना था,

 'हर कहानी मेरी कहानी है' ।

सज्जाद अख़्तर, भारत


रंग-आमेज़ जो मोहब्बत से, 

'हर कहानी मिरी कहानी है।

~ अशोक सिंह न्यूयॉर्क


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https://youtu.be/X1px6vRa51g?si=gh6EootIwH4DwmMP

©️सर्वाधिकार सुरक्षित। इस पोस्ट में साझा किए गए सभी गिरह के शे'र 'एक शे'र अर्ज़ किया हैपटल पर शामिल शायरों के हैं। इनमें से कोई भी शे'र शायर की लिखित पूर्व सहमति के बग़ैर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है।

संपादक

~ कौसर भुट्टो, दुबई


332 वाँ सप्ताह एक शे’र गिरह-नामा: 1 अगस्त, 2026

 332 वाँ सप्ताह एक शे’र गिरह-नामा: 1 अगस्त, 2026 एक‌ शे'र‌ अर्ज़ किया है’ मंच के साप्ताहिक 2 तरही मिसरों पर आधारित  332 वाँ सप्ताहिक गिरह...