मंगलवार, 26 मई 2026

322 वाँ सप्ताह एक शे’र गिरह-नामा: 23 मई, 2026

322 वाँ सप्ताह एक शे’र गिरह-नामा: 23 मई, 2026

एक‌ शे'र‌ अर्ज़ किया है’ मंच के साप्ताहिक 2 तरही मिसरों पर आधारित 322 वाँ सप्ताह गिरह-नामा।

 आज का मुशायरा इन दो मिसरों पर आधारित था:

643 वाँ मिसरा: 'दिलों के खेल में ख़ुद्दारियां नहीं चलती' । 

~ कैफ़ भोपाली 


644 वाँ मिसरा: 'प्यार की मदहोश खुशबू का खजाना चाहिए' ।

~ रवींद्र प्रकाश हंस' । 

                                 *****^*****

 जायज़ा लीजिए अलग अलग ज़ावियों से इन मिसरों पर लगाई हुई गिरह का;

643 वें मिसरे: 'दिलों के खेल में ख़ुद्दारियां नहीं चलती'

पर 'एक शे'र अर्ज़ किया है' के शायरों की लगाई गईं गिरह:


निभा सको तो निभाओ ज़रा सा झुक करके
 'दिलों के खेल में ख़ुद्दारियां नहीं चलती' ।
~ प्रज्ञा त्रिवेदी , भारत


ग़ुरूर-ओ-ज़ात नहीं पूछती मोहब्बत भी,
 'दिलों के खेल में ख़ुद्दारियां नहीं चलती' । 1 ।
~अकबर शाद 'उदयपुरी' भारत


कभी जो टूट के चाहो तो खुद समझ जाओ,
  'दिलों के खेल में ख़ुद्दारियां नहीं चलती' । 2 l
~अकबर शाद 'उदयपुरी' भारत


बुरा नही है ये चिसमिश अगर लड़े भी अब
 'दिलों के खेल में ख़ुद्दारियां नहीं चलती' । 3 l
~अकबर शाद 'उदयपुरी' भारत


यहां तो हार में भी जश्न जीत का होगा
 'दिलों के खेल में ख़ुद्दारियां नहीं चलती' ।
~सज्जाद अख्तर, भारत


ख़ुदी के सख़्त उसूलों का इश्क़ में क्या काम 
'दिलों के खेल में ख़ुद्दारियाँ नहीं चलतीं' ।
~डाॅ. आदेश त्यागी, भारत


सरों के बल भी मुहब्बत में चलना पड़ता है 
 'दिलों के खेल में ख़ुद्दारियां नहीं चलती' ।
~ दिगंबर नासवा, मलेशिया


कि बाज़ वक्त अना को भुलाना पड़ता है 
 'दिलों के खेल में ख़ुद्दारियां नहीं चलती'।
~ममता 'किरण', भारत


मुझे ख़बर ही नहीं ख़ुद की भी सिवा उसके
 ‘दिलों के खेल में ख़ुद्दारियां नहीं चलतीं’।
~रेनू हुसैन, भारत 


अना का काम कोई हैं नहीं मोहब्बत में,
‘दिलों के खेल में ख़ुद्दारियां नहीं चलतीं’।
~ अशोक सिंह, न्यूयॉर्क 


*✨*☀️**✨**


 644 वें मिसरे: 'प्यार की मदहोश खुशबू का खजाना चाहिए'

 पर 'एक शे'र अर्ज़ किया है' के शायरों की लगाई गईं गिरह:



नाम लिख्खे जाएँगे, वे सामने आएँ, जिन्हें 
'प्यार की मदहोश खुशबू का खजाना चाहिए'।
~मनोज 'अबोध', भारत 


नाम तुम लिक्खो न लिक्खो आशिकों में पर हमें
'प्यार की मदहोश खुशबू का खजाना चाहिए'।
~अनिमेष शर्मा, भारत


चाँदनी रातों को सर पहलू में रखकर आपका,
'प्यार की मदहोश खुशबू का खजाना चाहिए'।
~अनमोल प्रकाश शुक्ला, भारत 


वो चला सरहद प तो उसने कहा ये, कब मुझे
'प्यार की मदहोश खुशबू का खजाना चाहिए'। 1 l
~रेनू हुसैन, भारत 


और कुछ ज़्यादा नहीं पर एक ख़्वाहिश है मेरी 
'प्यार की मदहोश खुशबू का खजाना चाहिए'। 2 l
~रेनू हुसैन, भारत


दूर से ही कर सकूँ महसूस जिसको बा-रहा
'प्यार की मदहोश खुशबू का खजाना चाहिए'।
~प्रज्ञा त्रिवेदी ,भारत


यूँ न केवल सन्दली साँसों की बख़्शिश से नवाज़ 
'प्यार की मदहोश ख़ुशबू का ख़ज़ाना चाहिये' ।
~डाॅ. आदेश त्यागी, भारत


आप दो या आप दो या आप दो हमको तो बस 
'प्यार की मदहोश खुशबू का खजाना चाहिए'।
~ दिगंबर नासवा, मलेशिया


सोने चॉंदी के ख़ज़ाने की नहीं हमको तलब
'प्यार की मदहोश खुशबू का खजाना चाहिए'।
~ममता किरण, भारत


चाहतों की दिल को अब भीनी महक काफ़ी नहीं, 
'प्यार की मदहोश खुशबू का ख़ज़ाना चाहिए' ।
~खुर्रम नूर, भारत


इस दिल-ए-ख़ुश-फ़ह्‌म को बस है यही ज़िद आजकल,
‘प्यार की मदहोश ख़ुशबू का ख़जाना चाहिए’।
~ अशोक सिंह , न्यू यॉर्क 


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संपादक

~ कौसर भुट्टो, दुबई


 


मंगलवार, 19 मई 2026

321 वाँ सप्ताह एक शे’र गिरह-नामा: 16 मई, 2026

321 वाँ सप्ताह एक शे’र गिरह-नामा:  16 मई, 2026

एक‌ शे'र‌ अर्ज़ किया है’ मंच के साप्ताहिक 2 तरही मिसरों पर आधारित  321 वाँ सप्ताह एक शे’र गिरह-नामा।

 आज का  गिरह-नामा इन दो मिसरों पर आधारित है:

 641 वाँ मिसरा: 'आधी बात का उल्टा मतलब होता है'।

~ इनाम आज़मी' 


642 वाँ मिसरा: 'कोई रंग भरने को जी चाहता है'। 

~ शकील बदायूनी' 

                                 *****^*****


 जायज़ा लीजिए अलग अलग ज़ावियों से इन मिसरों पर लगाई हुई गिरह का;

641वें मिसरे:  'आधी बात का उल्टा मतलब होता है' 

पर 'एक शे'र अर्ज़ किया है' के शायरों की लगाई गईं गिरह:


बेग़म बोलें 'क्या बोले' तो यूँ समझो,
‘आधी बात का उल्टा मतलब होता है’। 1 ।
~अनमोल प्रकाश शुक्ला, भारत 


किसने क्या समझा तुमने जो कुछ भी कहा,
‘आधी बात का उल्टा मतलब होता है’। 2 ।
~अनमोल प्रकाश शुक्ला, भारत 


कुछ तो खुलकर मेरे आगे बोलो तुम
‘आधी बात का उल्टा मतलब होता है’।
~ अकबर शाद उदयपुरी, भारत


सीधे सीधे पूरी बातें कह दो तुम
‘आधी बात का उल्टा मतलब होता है’।
~ अकबर शाद उदयपुरी, भारत


देखो, तुम यूँ काम न लो कम-लफ़्ज़ी से
'आधी बात का उल्टा मतलब होता है'।
~डाॅ. आदेश त्यागी, भारत


इसीलिए तो बोली है आधी मैंने 
‘आधी बात का उल्टा मतलब होता है’।
~ दिगंबर नासवा, मलेशिया


 क्या जाता गर बात जो पूरी कह जाते!
'आधी बात का उल्टा मतलब होता है’।
~के पी सक्सेना, भारत 


पूरी बात बता देते तो अच्छा था
‘आधी बात का उल्टा मतलब होता है’।
~अनिमेष शर्मा, भारत


काश वो करने दे देता बातें पूरी
‘आधी बात का उल्टा मतलब होता है’।
~ प्रज्ञा त्रिवेदी , भारत


आप क्यों ही करते हैं बातें आधी 
‘आधी बात का उल्टा मतलब होता है’।
~रेनू हुसैन, भारत


जो सूनी पड़ी ज़ीस्त की है ये चादर,
‘आधी बात का उल्टा मतलब होता है’। 
~ममता 'किरण', भारत


उल्टी बात करो तो आधी ही करना, 
‘आधी बात का उल्टा मतलब होता है’। 1 ।
~ अशोक सिंह, न्यूयॉर्क 


आधी बात समझनी होती है मुश्किल,
‘आधी बात का उल्टा मतलब होता है’। 2 ।
~ अशोक सिंह, न्यूयॉर्क 


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 642 वें मिसरे: 'कोई रंग भरने को जी चाहता है'।

 ~ शकील बदायूनी 

 पर 'एक शे'र अर्ज़ किया है' के शायरों की लगाई गईं गिरह:


बुझी जा रही है मोहब्बत की लौ भी,
‘कोई रंग भरने को जी चाहता है’।
अकबर शाद उदयपुरी, भारत


सफ़ेद ओ सियह उनकी तस्वीर में अब
‘कोई रंग भरने को जी चाहता है’।
~प्रज्ञा त्रिवेदी ,भारत


वरक़ ज़िन्दगी का है बे-रंग कब से 
‘कोई रंग भरने को जी चाहता है’।
~ दिगंबर नासवा, मलेशिया


नहीं देखी जाती है वीरानी दिल की
‘कोई रंग भरने को जी चाहता है’।
~लक्ष्मी शंकर बाजपेई, भारत


मुझे दिल के कोरे से काग़ज़ में अब तो 
‘कोई रंग भरने को जी चाहता है’।
~रेनू हुसैन, भारत 


हैं बरसों से बे-रंग जीवन का ख़ाका  
'कोई रंग भरने को जी चाहता है'। 
~डाॅ. आदेश त्यागी, भारत


अभी तक है कोरा मेरे दिल का काग़ज़
'कोई रंग भरने को जी चाहता है'।
~अनिमेष शर्मा 'आतिश'


नहीं देखी जाती बहुत सादगी भी
'कोई रंग भरने को जी चाहता है’।
~के पी सक्सेना, भारत 


जो फीकी हुई है ये रिश्तों की रंगत 
‘कोई रंग भरने को जी चाहता है’।
~ममता किरण, भारत


वो ग़मगीन सूनी सी आँखों में उसकी,
‘कोई रंग भरने को जी चाहता है’।
~अनमोल प्रकाश शुक्ला, भारत 


तेरी श्वेत साड़ी कचोटे है दिल को, 
‘कोई रंग भरने को जी चाहता है’।
~खुर्रम नूर भारत


जो गुलबुन को भी गुल की ख़ुशबू से भर दे,
‘कोई रंग भरने को जी चाहता है’। 1 l
~ अशोक सिंह , न्यू यॉर्क 


सफ़ेद उनकी ज़ुल्फ़ें हुई इस क़दर हैं, 
‘कोई रंग भरने को जी चाहता है’। 2 l
~ अशोक सिंह , न्यू यॉर्क 


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संपादक

~ कौसर भुट्टो, दुबई


 


गुरुवार, 14 मई 2026

320 वाँ सप्ताह - एक शे’र गिरह-नामा: 9 मई, 2026

320 वाँ सप्ताह - एक शे’र गिरह-नामा:  9 मई, 2026

एक‌ शे'र‌ अर्ज़ किया है’ मंच के साप्ताहिक 2 तरही मिसरों पर आधारित  320 वें सप्ताह का गिरह-नामा ।

 आज का  गिरह-नामा इन दो मिसरों पर आधारित है:

 639 वाँ मिसरा: ''अपनी तनख्वाह कई बार गिनी है मैंने " । 

~ नुसरत सिद्दीकी


640 वाँ मिसरा: ''किसी सूरत मेरी चाहत की उस तक भी ख़बर जाए" । 

~ डॉ० तृप्ति मिश्रा 

                                 *****^*****

 जायज़ा लीजिए अलग अलग ज़ावियों से इन मिसरों पर लगाई हुई गिरह का;

639 वें मिसरे:  'अपनी तनख्वाह कई बार गिनी है मैंने' 

पर 'एक शे'र अर्ज़ किया है' के शायरों की लगाई गईं गिरह:


नोट दो सौ का है ग़ायब तो कहूँ किससे मैं,
‘अपनी तनख़्वाह कई बार गिनी है मैंने’। 1 ।
~अनमोल प्रकाश शुक्ला, भारत 


उसको इतना ,उसे इतना ,उसे इतना देना,
‘अपनी तनख़्वाह कई बार गिनी है मैंने’। 2 ।
~अनमोल प्रकाश शुक्ला, भारत 


यार इस बार उधारी न चुका पाऊंगा,
‘अपनी तनख़्वाह कई बार गिनी है मैंने’।
~के पी सक्सेना, भारत 


दस्तख़त जिस पे किए उतनी लिफ़ाफ़े में मिली 
‘अपनी तनख़्वाह कई बार गिनी है मैंने’।
~ दिगंबर नासवा, मलेशिया


हर खुशी सोच के लेनी पड़ी किस्तों में मुझे,
‘अपनी तनख़्वाह कई बार गिनी है मैंने’। 1 ।
~अकबर शाद उदयपुरी, भारत


दोस्त ही देंगे सहारा तो गुज़ारा होगा,
‘अपनी तनख़्वाह कई बार गिनी है मैंने’। 2 ।
~अकबर शाद उदयपुरी, भारत


ख़्वाहिशो! और किसी दिल में बसो अब जाकर
‘अपनी तनख़्वाह कई बार गिनी है मैंने’। 1 ।
~सज्जाद अख्तर, भारत


इस महीने भी मुझे क़र्ज़ की पीनी होगी
‘अपनी तनख़्वाह कई बार गिनी है मैंने’। 2 ।
~सज्जाद अख्तर, भारत


तू बिरहमन है मेरे बच्चे कोई शौक़ न रख
'अपनी तनख़्वाह कई बार गिनी है मैं ने'।
~डाॅ. आदेश त्यागी, भारत


कर तो रक्खा है डिनर देने का वादा लेकिन 
‘अपनी तनख़्वाह कई बार गिनी है मैंने’।
~ लक्ष्मी शंकर बाजपेई, भारत


फ़ासला जेब औ ज़रूरत का है बढ़ता जाता
‘अपनी तनख़्वाह कई बार गिनी है मैंने’।
~ प्रज्ञा त्रिवेदी , भारत


मेरे खर्चों से सदा रहती है थोड़ी सी कम,
‘अपनी तनख़्वाह कई बार गिनी है मैंने’।
~खुर्रम नूर भारत


खर्च इस बार भी मुश्किल से ही चल पाएगा 
‘अपनी तनख़्वाह कई बार गिनी है मैंने’।
~रेनू हुसैन, भारत 


तुमको इस बार भी शॉपिंग न करा पाऊँगा 
‘अपनी तनख़्वाह कई बार गिनी है मैंने’।
~मनोज 'अबोध', भारत


हैसियत है नहीं खर्चे करूं पूरे घर के 
‘अपनी तनख़्वाह कई बार गिनी है मैंने’। 1 ।
~ममता 'किरण', भारत


पैसा छुट्टी का लगे काट लिया है उसने,
 ‘अपनी तनख़्वाह कई बार गिनी है मैंने’। 2 ।
~ममता 'किरण', भारत


शौक़ पर खर्च करूँ कैसे ये मुमकिन ही नहीं
‘अपनी तनख़्वाह कई बार गिनी है मैंने’।
~अनिमेष शर्मा 'आतिश', भारत


कम पड़ी है ये हमेशा ही सभी खर्चों से
‘अपनी तनख़्वाह कई बार गिनी है मैंने’।
आलोक अविरल, भारत


एक भी नोट इधर से न उधर कर देना,
‘अपनी तनख़्वाह कई बार गिनी है मैंने’।
~ अशोक सिंह, न्यूयॉर्क 


*✨*☀️**✨**


 640 वें मिसरे:  'किसी सूरत मेरी चाहत की उस तक भी ख़बर जाए ' 

 पर 'एक शे'र अर्ज़ किया है' के शायरों की लगाई गईं गिरह:


नहीं कुछ और सूझे है सिवा इसके कि ऐ ऑका,
'किसी सूरत मेरी चाहत की उस तक भी ख़बर जाए’।
~के पी सक्सेना, भारत 


उसे ही प्यार करता हूँ उसी पर जाँ छिड़कता हूँ 
'किसी सूरत मेरी चाहत की उस तक भी ख़बर जाए'।
~ दिगंबर नासवा, मलेशिया


उठा ले काश मेरा ख़त जो फेंका राह में उसकी,
'किसी सूरत मेरी चाहत की उस तक भी ख़बर जाए '।
~अनमोल प्रकाश शुक्ला, भारत 


मेरी दीवानगी का उसको शायद ही पता होगा 
'किसी सूरत मेरी चाहत की उस तक भी ख़बर जाए '।
~लक्ष्मी शंकर बाजपेई, भारत


कबूतर, नामाबर, ईमेल, मोबाइल हो या कुछ हो 
'किसी सूरत मेरी चाहत की उस तक भी ख़बर जाये'।
~डाॅ. आदेश त्यागी, भारत


वो डरता है मुहब्बत से मुझे ये इल्म है फिर भी
'किसी सूरत मेरी चाहत की उस तक भी ख़बर जाए'।
~प्रज्ञा त्रिवेदी ,भारत


मैं देखूँ उसको जी भरके मेरे हो सामने दिलबर 
'किसी सूरत मेरी चाहत की उस तक भी ख़बर जाए’।
~रेनू हुसैन, भारत


उसी की याद रखता हूं मैं अपनी हर दुआओं में,
'किसी सूरत मेरी चाहत की उस तक भी ख़बर जाए’।
~अकबर शाद उदयपुरी, भारत


बुलाओ प्रेस को तुम,मैं इधर ‘टंकी’ पे चढ़ता हूँ 
‘किसी सूरत मेरी चाहत की उस तक भी ख़बर जाए’।
~मनोज 'अबोध', भारत 


मैं हर पल रब से अब ये ही दुआ बस करती रहती हूं 
'किसी सूरत मेरी चाहत की उस तक भी ख़बर जाए'।
~ममता किरण, भारत


सरे महफ़िल जो उसने दफ़अतन मुङ मुड़ के देखा है
'किसी सूरत मेरी चाहत की उस तक भी ख़बर जाए'।
~अनिमेष शर्मा 'आतिश', भारत 


 हमें कहना नहीं आता वो आंखें पढ़ नहीं सकता,
'किसी सूरत मेरी चाहत की उस तक भी ख़बर जाए' । 1 ।
~कौसर भुट्टो, दुबई


 मेरी बेचैनियों का कुछ असर उस दिल पे भी तो हो,
'किसी सूरत मेरी चाहत की उस तक भी ख़बर जाए'। 2 ।
~कौसर भुट्टो, दुबई


हवाओं में घटाओं में धनक की इन शुआओं में, 
‘किसी सूरत मेरी चाहत की उस तक भी ख़बर जाए’।
~ अशोक सिंह , न्यू यॉर्क 


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इस कार्यक्रम का यू-ट्यूब वीडियो देखने के लिए यहाँ क्लिक करिये:



©️सर्वाधिकार सुरक्षित। इस पोस्ट में साझा किए गए सभी गिरह के शे'र 'एक शे'र अर्ज़ किया है' पटल पर शामिल शायरों के हैं। इनमें से कोई भी शे'र शायर की लिखित पूर्व सहमति के बग़ैर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है।

संपादक

~ कौसर भुट्टो, दुबई


 


मंगलवार, 5 मई 2026

319 वाँ एक शे’र गिरह-नामा: 2 मई , 2026

319 वाँ एक शे’र गिरह-नामा: 2 मई , 2026

एक‌ शे'र‌ अर्ज़ किया है’ मंच के साप्ताहिक 2 तरही मिसरों पर आधारित #डिजिटल_वीडियो_गोष्ठी का  319 वाँ तरही मुशायरा कार्यक्रम।

 आज का मुशायरा इन दो मिसरों पर आधारित था:

 637 वाँ मिसरा: 'ये मत समझो कि वादा कर रहा हूँ'। 

~जुबैर अली ताबिश' । 


638 वाँ मिसरा:  'अब ज़िंदगी की धूप में आ कर ग़ज़ल कहो'। 

~ डॉ. कुँवर बेचैन। 

                                 *****^*****

 जायज़ा लीजिए अलग अलग ज़ावियों से इन मिसरों पर लगाई हुई गिरह का;

637 वें मिसरे:  'ये मत समझो कि वादा कर रहा हूँ'

पर 'एक शे'र अर्ज़ किया है' के शायरों की लगाई गईं गिरह:


भरोसा दें अगर अल्फ़ाज़ मेरे-
‘ये मत समझो कि वादा कर रहा हूँ’।
खुर्रम नूर, भारत


मेरी कोशिश रहेगी पूरी पूरी,
‘ये मत समझो कि वादा कर रहा हूँ’।
~अनमोल प्रकाश शुक्ला, भारत 


फ़क़त कोशिश करूँगा भूलने की 
'ये मत समझो कि वा'दा कर रहा हूँ' ।
~डाॅ. आदेश त्यागी, भारत


तुम्हारे ज़ह्न से और दिल से निकलूँ 
'ये मत समझो कि वा'दा कर रही हूँ'l
~रेनू हुसैन, भारत


सताऊँगी न तुमको अब मैं, लेक़िन
‘ये मत समझो कि वादा कर रहा हूँ’।
~ प्रज्ञा त्रिवेदी , भारत


रहूँगा साथ यूँ तो मुश्किलों में 
‘ये मत समझो कि वादा कर रहा हूँ’।
~मनोज 'अबोध', भारत


बहुत मुमकिन है वापस लौट आऊं
‘ये मत समझो कि वादा कर रहा हूँ’।
~सज्जाद अख्तर, भारत


चलो मैं भूल ही जाती हूँ तुमको 
'ये मत समझो कि वा'दा कर रहा हूँ'।
~रेनू हुसैन, भारत


करूँगा पूरी कोशिश आने की पर, 
‘ये मत समझो कि वादा कर रहा हूँ’।
~ अशोक सिंह, न्यूयॉर्क 


*✨*☀️**✨**


 638 वें मिसरे:  'अब ज़िंदगी की धूप में आ कर ग़ज़ल कहो'

 पर 'एक शे'र अर्ज़ किया है' के शायरों की लगाई गईं गिरह:


कब तक करोगे शायरी कम्फर्ट ज़ोन में,
 ‘अब ज़िंदगी की धूप में आ कर ग़ज़ल कहो’।
~सज्जाद अख्तर, भारत


लिखते रहे हो ख़ूब ही जुल्फ़ों की छांव में 
‘अब ज़िंदगी की धूप में आ कर ग़ज़ल कहो’।
~ लक्ष्मी शंकर बाजपेई, भारत


वातानुकूल कक्ष में इतरा के गाये गीत,
‘अब ज़िंदगी की धूप में आ कर ग़ज़ल कहो’।
~अनमोल प्रकाश शुक्ला, भारत 


गर चाहते हो ख़ुशबू पसीने की शे'र में!
‘अब ज़िंदगी की धूप में आ कर ग़ज़ल कहो’।
~के पी सक्सेना, भारत 


गाये हैं प्रेम-गीत सदा सुख की छाँव में 
'अब ज़िन्दगी की धूप में आ कर ग़ज़ल कहो' l
~डाॅ. आदेश त्यागी, भारत


महफ़िल में गीत गाए हैं अब तक तो शौक से
‘अब ज़िंदगी की धूप में आ कर ग़ज़ल कहो’।
~प्रेम बिहारी मिश्रा, भारत


अब-तक कही गई है अंधेरों के बीच ही 
‘अब ज़िंदगी की धूप में आ कर ग़ज़ल कहो’।
~ दिगंबर नासवा, मलेशिया


कर ही लिया है छाँह में आराम तुमने तो 
‘अब ज़िंदगी की धूप में आ कर ग़ज़ल कहो’।
~रेनू हुसैन, भारत 


निकलो झरोखों से भी तो हुस्न और इश्क़ के,
‘अब ज़िंदगी की धूप में आ कर ग़ज़ल कहो’।
~ कौसर भुट्टो, यूएई


गलियों में ख़ूब फिर लिए इश्क़-ए-मजाज़ी के,
‘अब ज़िंदगी की धूप में आ कर ग़ज़ल कहो’।
~ अशोक सिंह , न्यू यॉर्क 


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©️सर्वाधिकार सुरक्षित। इस पोस्ट में साझा किए गए सभी गिरह के शे'र 'एक शे'र अर्ज़ किया है' पटल पर शामिल शायरों के हैं। इनमें से कोई भी शे'र शायर की लिखित पूर्व सहमति के बग़ैर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है।

संपादक

~ कौसर भुट्टो, दुबई


 


मंगलवार, 28 अप्रैल 2026

318 वाँ एक शे’र गिरह-नामा: 25 अप्रैल, 2026

318 वाँ एक शे’र गिरह-नामा: 25 अप्रैल, 2026

एक‌ शे'र‌ अर्ज़ किया है’ मंच के साप्ताहिक 2 तरही मिसरों पर आधारित #डिजिटल_वीडियो_गोष्ठी का 318 वाँ तरही मुशायरा कार्यक्रम।

 आज का मुशायरा इन दो मिसरों पर आधारित था:

 635 वाँ मिसरा: 'मय ख़ाना भी वीरों है कलीसा भी हरम भी'l  

~ जुहूर नज़र 


636 वाँ मिसरा: 'मिलती नहीं हर एक को सौगात ग़मों की' ।

~ केवल कृष्ण शर्मा 

                                 *****^*****

 जायज़ा लीजिए अलग अलग ज़ावियों से इन मिसरों पर लगाई हुई गिरह का;

635 वें मिसरे:  'मय ख़ाना भी वीरों है कलीसा भी हरम भी

पर 'एक शे'र अर्ज़ किया है' के शायरों की लगाई गईं गिरह:


दौलत की हवस खा गई है सबका भरम भी
‘मय-ख़ाना भी वीराँ है कलीसा भी हरम भी’। 1 l
~अकबर शाद उदयपुरी, भारत


क्या ढूँढ़ने निकले थे सभी दश्त-ए-जुनूँ में
‘मय-ख़ाना भी वीराँ है कलीसा भी हरम भी’। 2 l
~अकबर शाद उदयपुरी, भारत


कुछ दिल ही समझ पाते हैं इस दर्द की दौलत
मिलती नहीं हर एक को सौगात ग़मों की 
~डॉ० भावना कुँअर, ऑस्ट्रेलिया


चहकी न उछल-कूद गिलहरी ने मचाई 
‘मय-ख़ाना भी वीराँ है कलीसा भी हरम भी’।
~ दिगंबर नासवा, मलेशिया


क्या रूठ के वो जा चुका हर एक जगह से 
‘मय-ख़ाना भी वीराँ है कलीसा भी हरम भी’।
~ममता 'किरण', भारत


क्या कर ली यहाँ सबने ही हद पार जुनूं की
‘मय-ख़ाना भी वीराँ है कलीसा भी हरम भी’।
~प्रेम बिहारी मिश्रा, भारत


तेरी गली में , मौला मेरे , रंग है शायद 
‘मय-ख़ाना भी वीराँ है कलीसा भी हरम भी’।
~रेनू हुसैन, भारत


महँगाई ने रक्खी है कमर तोड़ सभी की
‘मय-ख़ाना भी वीराँ है कलीसा भी हरम भी’।
~ प्रज्ञा त्रिवेदी , भारत


अफ़वाह किसी ने तो उड़ाई है शहर में
‘मय-ख़ाना भी वीराँ है कलीसा भी हरम भी’।
~के पी सक्सेना, भारत 


किस खोज में दीवानें सभी आज लगे हैं,
‘मय-ख़ाना भी वीराँ है कलीसा भी हरम भी’।
~मनोज 'अबोध', भारत


सब जा के जमा हो गए क्या दश्ते जुनूँ में
‘मय-ख़ाना भी वीराँ है कलीसा भी हरम भी’।
~सज्जाद अख्तर, भारत


खुलवाओ किसी हाल भी ईरान की खाड़ी,
‘मय-ख़ाना भी वीराँ है कलीसा भी हरम भी’।
~ अशोक सिंह, न्यूयॉर्क 


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 636 वें मिसरे: 'मिलती नहीं हर एक को सौगात ग़मों की'

 पर 'एक शे'र अर्ज़ किया है' के शायरों की लगाई गईं गिरह:


हर ग़म को यही सोच के सीने से लगाया
‘मिलती नहीं हर एक को सौगात ग़मों की’।
~सज्जाद अख्तर, भारत


सहते हैं जो हँस हँस के उन्हीं पे हो इनायत
‘मिलती नहीं हर एक को सौगात ग़मों की’।
~प्रज्ञा त्रिवेदी ,भारत


हाँ सबके मुकद्दर में ये होती नहीं दौलत, 
मिलती नहीं हर एक को सौगात ग़मों की।
~अनमोल प्रकाश शुक्ला, भारत 


दो आँखें गुहरबार हैं, दिल ग़म का ख़ज़ीना 
'मिलती नहीं हर एक को सौग़ात ग़मों की' l
~डाॅ. आदेश त्यागी, भारत


रब चुनता है कुछ लोगों को देने को ये नेमत 
‘मिलती नहीं हर एक को सौगात ग़मों की’।
~ममता किरण, भारत


दिल आपको सागर की तरह चाहिए गहरा 
‘मिलती नहीं हर एक को सौगात ग़मों की’।
~ दिगंबर नासवा, मलेशिया


मुझपर तो मेहरबान रहीं ग़म की लकीरें 
‘मिलती नहीं हर एक को सौगात ग़मों की’।
~रेनू हुसैन, भारत 


ग़मग़ीन हैं तो और कहें इससे भला क्या 
‘मिलती नहीं हर एक को सौगात ग़मों की’।
~मनोज 'अबोध', भारत 


चलते रहें जो साथ में ता-उम्र हमारे,
‘मिलती नहीं हर एक को सौगात ग़मों की’।
~ अशोक सिंह , न्यू यॉर्क 


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इस कार्यक्रम का यू-ट्यूब वीडियो देखने के लिए यहाँ क्लिक करिये:


©️सर्वाधिकार सुरक्षित। इस पोस्ट में साझा किए गए सभी गिरह के शे'र 'एक शे'र अर्ज़ किया है' पटल पर शामिल शायरों के हैं। इनमें से कोई भी शे'र शायर की लिखित पूर्व सहमति के बग़ैर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है।

संपादक

~ कौसर भुट्टो, दुबई


 


सोमवार, 20 अप्रैल 2026

317 वाँ एक शे’र गिरह-नामा: 18 अप्रैल , 2026

317 वाँ एक शे’र गिरह-नामा: 18 अप्रैल , 2026

एक‌ शे'र‌ अर्ज़ किया है’ मंच के साप्ताहिक 2 तरही मिसरों पर आधारित #डिजिटल_वीडियो_गोष्ठी का 317 वाँ तरही मुशायरा कार्यक्रम।

 आज का मुशायरा इन दो मिसरों पर आधारित था:

633 वाँ मिसरा: 'कोई राह में आईना रख गया है'। 

~ खुमार बाराबंकवी


634 वाँ मिसरा: 'हम लोग तो दामन भी कुशादा नहीं रखते'।

~ नजीब अहमद
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 जायज़ा लीजिए अलग अलग ज़ावियों से इन मिसरों पर लगाई हुई गिरह का;

633वें मिसरे: ' 'कोई राह में आईना रख गया है'' 

पर 'एक शे'र अर्ज़ किया है' के शायरों की लगाई गईं गिरह:


वो जो भी है शैदाई है सिर्फ़ सच का,
‘कोई राह में आईना रख गया है’। 1 l
~अनमोल प्रकाश शुक्ला, भारत 


हमेशा चलो जेब में ले के कंघी,
‘कोई राह में आईना रख गया है’। 2 l
~अनमोल प्रकाश शुक्ला, भारत 


नक़ाबों की सारी तहें खुल गई हैं 
‘कोई राह में आईना रख गया है’।
~सज्जाद अख्तर, भारत


मिलाएगा कैसे वो ख़ुद से भी नज़रें
‘कोई राह में आईना रख गया है’। 1 l
~ प्रज्ञा त्रिवेदी , भारत


सम्हल के उछाला करो अब से पत्थर
‘कोई राह में आईना रख गया है’। 2 l
~ प्रज्ञा त्रिवेदी , भारत


नहीं अब है आता कोई संग मुझ तक
‘कोई राह में आईना रख गया है’। 3 l
~ प्रज्ञा त्रिवेदी , भारत


लगे मयक़दे लोग कतरा के जाने
‘कोई राह में आईना रख गया है’।
~के पी सक्सेना, भारत 


वो मंज़िल को था खेल समझे.. न सोचा
‘कोई राह में आईना रख गया है’।
~ लक्ष्मी शंकर बाजपेई, भारत


सँवरने का मौक़ा मिला है सभी को
‘कोई राह में आईना रख गया है’।
~प्रेम बिहारी मिश्रा, भारत


ख़ताएं छुपानी हुईं अब तो मुश्किल 
‘कोई राह में आईना रख गया है’।
~ममता 'किरण', भारत


न पूछो सँवर कर में आता हूँ अब क्यों 
‘कोई राह में आईना रख गया है’।
~ दिगंबर नासवा, मलेशिया


अचानक ही पत्थर उठाने लगे सब 
‘कोई राह में आईना रख गया है’।
~मनोज 'अबोध', भारत 


नहीं उस गली अब गुजरता है कोई
‘कोई राह में आईना रख गया है’।
~कौसर भुट्टो यूएई


ठिठक कुछ हँसे, कुछ ने नज़रें चुराईं,
‘कोई राह में आईना रख गया है’।
~ अशोक सिंह, न्यूयॉर्क 


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 634 वें मिसरे: 'हम लोग तो दामन भी कुशादा नहीं रखते'

 पर 'एक शे'र अर्ज़ किया है' के शायरों की लगाई गईं गिरह:


वो देने पे आए तो समेटेंगे कहां तक
‘हम लोग तो दामन भी कुशादा नहीं रखते’।
~सज्जाद अख्तर, भारत


है जानना मुश्किल ये बहुत किसके दिल में क्या,
‘हम लोग तो दामन भी कुशादा नहीं रखते’।
~अनमोल प्रकाश शुक्ला, भारत 


हर शय को समेटें भी तो किस दिल से समेटें,
'हम लोग तो दामन भी कुशादा नहीं रखते'।
~डॉ० भावना कुँअर, ऑस्ट्रेलिया


नेमत ये मुहब्बत की भला कैसे मिलेगी
‘हम लोग तो दामन भी कुशादा नहीं रखते’।
~प्रज्ञा त्रिवेदी ,भारत


रहमत यहाँ रब की तो मुसलसल ही बरसती 
‘हम लोग तो दामन भी कुशादा नहीं रखते’ l
~प्रेम बिहारी मिश्रा, भारत


दाता के ख़ज़ाना है ये कम हो नहीं सकता
 ‘हम लोग तो दामन भी कुशादा नहीं रखते’।
~रेनू हुसैन, भारत 


दावा कि खुले दिल के हैं, कहने के लिए है 
‘हम लोग तो दामन भी कुशादा नहीं रखते’।
~मनोज अबोध, भारत


खिड़की या दरीचे तो जरा दूर की शय हैं 
‘हम लोग तो दामन भी कुशादा नहीं रखते’।
~रूबी मोहंती, भारत 


इस दौर में चोरों का हुआ ख़ौफ़ है इतना 
‘हम लोग तो दामन भी कुशादा नहीं रखते’। 1 l
~ममता किरण, भारत


हम लोग सजग अपनी अना के लिए हैं ख़ूब 
‘हम लोग तो दामन भी कुशादा नहीं रखते’। 2 l
~ममता किरण, भारत


बिन माँगे ही भर देता है झोली वो सभी की,  
‘हम लोग तो दामन भी कुशादा नहीं रखते’।
~ अशोक सिंह ,न्यू यॉर्क 


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इस कार्यक्रम का यू-ट्यूब वीडियो देखने के लिए यहाँ क्लिक करिये:


©️सर्वाधिकार सुरक्षित। इस पोस्ट में साझा किए गए सभी गिरह के शे'र 'एक शे'र अर्ज़ किया है' पटल पर शामिल शायरों के हैं। इनमें से कोई भी शे'र शायर की लिखित पूर्व सहमति के बग़ैर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है।

संपादक

~ कौसर भुट्टो, दुबई


 


सोमवार, 13 अप्रैल 2026

316 वाँ एक शे’र गिरह-नामा: 11 अप्रैल, 2026

316 वाँ एक शे’र गिरह-नामा:  11 अप्रैल, 2026

एक‌ शे'र‌ अर्ज़ किया है’ मंच के साप्ताहिक 2 तरही मिसरों पर आधारित #डिजिटल_वीडियो_गोष्ठी का  316 वाँ तरही मुशायरा कार्यक्रम।

 आज का मुशायरा इन दो मिसरों पर आधारित था:

 631 वाँ मिसरा:  'जो भी करना है इसी नस्ल को करना होगा' । 

~ 'मेराज' फ़ैज़ाबादी


632 वाँ मिसरा: 'इससे बेहतर तो यही है कि भुला दो मुझको'।

~ देवीचरण कश्यप' । 


                                 *****^*****


 जायज़ा लीजिए अलग अलग ज़ावियों से इन मिसरों पर लगाई हुई गिरह का;

631 वें मिसरे:  ' जो भी करना है इसी नस्ल को करना होगा' 

पर 'एक शे'र अर्ज़ किया है' के शायरों की लगाई गईं गिरह:


जैसे हालात हैं उनसे तो यही लगता है 
‘जो भी करना है इसी नस्ल को करना होगा’।
~सज्जाद अख्तर, भारत


गैर को पाठ पढ़ाने से नही कुछ हासिल!
‘जो भी करना है इसी नस्ल को करना होगा’।
~के पी सक्सेना, भारत 


सबके मज़हब रहें महफ़ूज़ , मगर इसके लिए
‘जो भी करना है इसी नस्ल को करना होगा’।
~ प्रज्ञा त्रिवेदी , भारत


अपने खोते हुए आदाब बचाने के लिये 
'जो भी करना है इसी नस्ल को करना होगा' ।
`डा आदेश त्यागी, भारत


क्यों तको राह कोई आ के उजाला देगा
‘जो भी करना है इसी नस्ल को करना होगा’।
~ममता किरण, भारत


बात ये सदियों से हर नस्ल ही कहती आई,
‘जो भी करना है इसी नस्ल को करना होगा’।
~ अशोक सिंह, न्यूयॉर्क 


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 632 वें मिसरे: 'इससे बेहतर तो यही है कि भुला दो मुझको' 

 पर 'एक शे'र अर्ज़ किया है' के शायरों की लगाई गईं गिरह:


गुफ़्तगू से रहे महरूम अगर उल्फ़त ये
‘इससे बेहतर तो यही है कि भुला दो मुझको’।
~प्रज्ञा त्रिवेदी ,भारत


साथ देना नहीं मुमकिन है अगर उल्फ़त में
‘इससे बेहतर तो यही है कि भुला दो मुझको’।
~प्रज्ञा त्रिवेदी ,भारत


तुम को जीने ही न दें चैन से यादें मेरी 
‘इससे बेहतर तो यही है कि भुला दो मुझको’।
~लक्ष्मी शंकर बाजपेई, भारत


डर सताता है अगर इस क़दर ज़माने का
‘इससे बेहतर तो यही है कि भुला दो मुझको’।
~लक्ष्मी शंकर बाजपेई, भारत


बात नज़रों की तेरे दिल में उतर जाने लगे
‘इससे बेहतर तो यही है कि भुला दो मुझको’।
~रेनू हुसैन, भारत 


ग़म बहुत होगा तुम्हें आगे इसी माज़ी का
‘इससे बेहतर तो यही है कि भुला दो मुझको’।
~अनमोल प्रकाश शुक्ला, भारत 


शक न छूटेगा तो हर बात पे झगड़ा होगा 
‘इससे बेहतर तो यही है कि भुला दो मुझको’।
~ दिगंबर नासवा, मलेशिया


रास आने लगीं तनहाइयां यदि तुमको अब
‘इससे बेहतर तो यही है कि भुला दो मुझको’।
~प्रेम बिहारी मिश्रा, भारत


इश्क़ है तुमको मगर खौफ़ जमाने का है 
‘इससे बेहतर तो यही है कि भुला दो मुझको’।
~प्रेम बिहारी मिश्रा, भारत


नाम मेरा कहीं बदनाम न तुमको कर दे!
‘इससे बेहतर तो यही है कि भुला दो मुझको’।
~के पी सक्सेना, भारत 


अब उदासी नहीं छिप पाती है मुस्कानों में 
'इस से बेहतर तो यही है कि भुला दो मुझ को'। 1 ।
~डाॅ. आदेश त्यागी, भारत


सुनो, बरबाद न हो जाये कहीं मुस्तक़बिल 
'इस से बेहतर तो यही है कि भुला दो मुझ को'। 2 ।
~डाॅ. आदेश त्यागी, भारत


बारहा अश्क बहाने से मिलेगा क्या अब 
'इस से बेहतर तो यही है कि भुला दो मुझ को'। 3 ।
~डाॅ. आदेश त्यागी, भारत


मेरी हस्ती से फ़क़त रंज ही पहुँचेगा अब 
‘इससे बेहतर तो यही है कि भुला दो मुझको’।
~शिव मोहन, किर्गिस्तान


याद कर के मुझे क्यों ज़ख्म कुरेदो कल के
‘इससे बेहतर तो यही है कि भुला दो मुझको’।
~खुर्रम नूर, भारत


दो क़दम साथ अगर मेरे नहीं चल सकते
‘इससे बेहतर तो यही है कि भुला दो मुझको’।
~ममता किरण, भारत 


दाद-फ़रियाद करो जा-ब-जा दर -दर जा कर, 
‘इससे बेहतर तो यही है कि भुला दो मुझको’।
~ अशोक सिंह , न्यू यॉर्क 


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इस कार्यक्रम का यू-ट्यूब वीडियो देखने के लिए यहाँ क्लिक करिये:


©️सर्वाधिकार सुरक्षित। इस पोस्ट में साझा किए गए सभी गिरह के शे'र 'एक शे'र अर्ज़ किया है' पटल पर शामिल शायरों के हैं। इनमें से कोई भी शे'र शायर की लिखित पूर्व सहमति के बग़ैर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है।

संपादक

~ कौसर भुट्टो, दुबई


 


332 वाँ सप्ताह एक शे’र गिरह-नामा: 1 अगस्त, 2026

 332 वाँ सप्ताह एक शे’र गिरह-नामा: 1 अगस्त, 2026 एक‌ शे'र‌ अर्ज़ किया है’ मंच के साप्ताहिक 2 तरही मिसरों पर आधारित  332 वाँ सप्ताहिक गिरह...