रविवार, 11 जनवरी 2026

303 वाँ एक शे’र गिरह-नामा: 10 जनवरी, 2026

303 वाँ एक शे’र गिरह-नामा: 10 जनवरी, 2026

एक‌ शे'र‌ अर्ज़ किया है’ मंच के साप्ताहिक 2 तरही मिसरों पर आधारित #डिजिटल_वीडियो_गोष्ठी का 303 वाँ तरही मुशायरा कार्यक्रम।

 आज का मुशायरा इन दो मिसरों पर आधारित था:

605 वाँ मिसरा: "हम मुद्दतों उदास रहे कुछ नहीं बना" ।
~कोमल जोविया


606 वाँ मिसरा: "आज तो रूह पे मारा है तमाचा तू ने"।
~ हिमांशी बावरा

                                 *****^*****

 जायज़ा लीजिए अलग अलग ज़ावियों से इन मिसरों पर लगाई हुई गिरह का;

605 वें मिसरे: 'हम मुद्दतों उदास रहे कुछ नहीं बना'

पर 'एक शे'र अर्ज़ किया है' के शायरों की लगाई गईं गिरह:


आ जाये फ़िक्र ओ फ़न का अदब ये ही सोचकर,
 'हम मुद्दतों उदास रहे कुछ नहीं बना'।
~ प्रज्ञा त्रिवेदी , भारत


उस बेवफ़ा ने भूल के अपनी ख़बर न ली
 'हम मुद्दतों उदास रहे कुछ नहीं बना'।
~ लक्ष्मी शंकर बाजपेई, भारत


जिसका बना हो हाथ खड़ा कर के बोल दे 
 'हम मुद्दतों उदास रहे कुछ नहीं बना'।
~ दिगंबर नासवा, मलेशिया


सारी ये कायनात हँसी जब वो हँस पड़ी,
 'हम मुद्दतों उदास रहे कुछ नहीं बना' ।
~आलोक 'अविरल', भारत


जब टूटने लगी हमारी निस्बतों की डोर,
'हम मुद्दतों उदास रहे कुछ नहीं बना' ।
~रेनू हुसैन, भारत


उनको बगैर मांगे हर इक शय हुई नसीब,
'हम मुद्दतों उदास रहे कुछ नहीं बना' । 1 l
~सज्जाद अख़्तर, भारत


साला ससुर या सास रहे कुछ नहीं बना 
'हम मुद्दतों उदास रहे कुछ नहीं बना' l 2 l
~सज्जाद अख़्तर, भारत


हर कोई आ गया तेरी दिल जोई के लिए 
'हम मुद्दतों उदास रहे कुछ नहीं बना' l 3 l
~ सज्जाद अख्तर ,भारत 


इक दिन की मयकशी में ही सब कुछ लगे अलग, 
‘हम मुद्दतों उदास रहे कुछ नहीं बना’।
~ अशोक सिंह, न्यूयॉर्क 


*✨*☀️**✨**


 606 वें मिसरे: ‘आज तो रूह पे मारा है तमाचा तू ने’

 पर 'एक शे'र अर्ज़ किया है' के शायरों की लगाई गईं गिरह:


क़ौल पे, अहद- ए- वफ़ा पे मेरे यूँ शक करके
'आज तो रूह पे मारा है तमाचा तूने' l 1 ।
~प्रज्ञा त्रिवेदी ,भारत


बिल डिनर का कभी तुम भी तो चुकाओ , (कहकर)
'आज तो रूह पे मारा है तमाचा तूने' l 2 ।
~प्रज्ञा त्रिवेदी, भारत


बातों बातों में जो अहसान जता बैठा है,
'आज तो रूह पे मारा है तमाचा तू ने' l
~अनमोल प्रकाश शुक्ला, भारत 


छोड़ते आए थे  नादांन समझकर पहले
‘आज तो रूह पे मारा है तमाचा तू ने’।
~के पी सक्सेना , भारत 


ज़ख़्म जो तू ने दिए हैं वो दिखें भी कैसे
‘आज तो रूह पे मारा है तमाचा तू ने’।
~संजीव दुआ, भारत 


बेरुख़ी सामने ग़ैरों के नहीं ठीक सनम 
'आज तो रूह पे मारा है तमाचा तू ने' l
~ दिगंबर नासवा, मलेशिया


ज़ख़्म चेहरे का ही होता तो मैं सह भी लेता
'आज तो रूह पे मारा है तमाचा तू ने' l
~अकबर 'शाद', भारत


आज देखी है मैंने तल्ख जुबाँ तेरी भी,
'आज तो रूह पे मारा है तमाचा तूने' ।
~रेनू हुसैन, भारत 


कर के शक यूँ मेरी नीयत पे, मेरी ग़ैरत पर,
‘आज तो रूह पे मारा है तमाचा तू ने’।
~ अशोक सिंह , न्यू यॉर्क 


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इस कार्यक्रम का यू-ट्यूब वीडियो देखने के लिए यहाँ क्लिक करिये:


©️सर्वाधिकार सुरक्षित। इस पोस्ट में साझा किए गए सभी गिरह के शे'र 'एक शे'र अर्ज़ किया है' पटल पर शामिल शायरों के हैं। इनमें से कोई भी शे'र शायर की लिखित पूर्व सहमति के बग़ैर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है।

संपादक

~ कौसर भुट्टो, दुबई


 


302 वाँ एक शे’र गिरह-नामा: 3 जनवरी , 2026

 302 वाँ एक शे’र गिरह-नामा: 3 जनवरी , 2026

एक‌ शे'र‌ अर्ज़ किया है’ मंच के साप्ताहिक 2 तरही मिसरों पर आधारित #डिजिटल_वीडियो_गोष्ठी का 302 वाँ तरही मुशायरा कार्यक्रम।

 आज का मुशायरा इन दो मिसरों पर आधारित था:

603 वाँ मिसरा: "जो सँभल कर चल रहा था रेंगता देखा गया"।
 ~ अंजुम लुधियानवी

604 वाँ मिसरा: ''तब कहीं फूल मुस्कुराते हैं" ।
~ अज़्म शाकिरी

                                 *****^*****

 जायज़ा लीजिए अलग अलग ज़ावियों से इन मिसरों पर लगाई हुई गिरह का;

603 वें मिसरे: '"जो सँभल कर चल रहा था रेंगता देखा गया"

पर 'एक शे'र अर्ज़ किया है' के शायरों की लगाई गईं गिरह:


वक्त की रफ़्तार के आगे है बेबस हर कोई,
'जो सँभल कर चल रहा था रेंगता देखा गया' l
~दिगंबर नसवा, मलेशिया 


जो भी थे बैसाखियों पर पा गए मंज़िल मगर,
‘जो सँभल कर चल रहा था रेंगता देखा गया’।
~अनमोल शुक्ल 'अनमोल' , भारत


जिसकी थी ग़लती अकड़ता ही रहा रिश्तों में वो,
‘जो सँभल कर चल रहा था रेंगता देखा गया’। 1 ।
~ प्रज्ञा त्रिवेदी , भारत


सामने तूफ़ाँ के ,बस था टिक सका दुस्साहसी,
‘जो सँभल कर चल रहा था रेंगता देखा गया’। 2 ।
~ प्रज्ञा त्रिवेदी , भारत


बार्डर पर देख दहशतगर्द को छुपते हुए ,
‘जो सँभल कर चल रहा था रेंगता देखा गया’। 1 ।
~लक्ष्मी शंकर वाजपेई, भारत 


जब शिकंजा और भी कसने लगा क़ानून का,
‘जो सँभल कर चल रहा था रेंगता देखा गया’। 2 ।
~लक्ष्मी शंकर वाजपेई, भारत 


वो था सत्ता के शिखर पर छल कपट के ज़ोर से ,
‘जो सँभल कर चल रहा था रेंगता देखा गया’।
~ममता किरण, भारत


तिकड़मों की होड़ में शकुनी के पॉंसे ही चलें,
‘जो सँभल कर चल रहा था रेंगता देखा गया’।
~के.पी. सक्सेना, भारत


एक सीधे रास्ते पर चलने वाला आदमी,
‘जो सँभल कर चल रहा था रेंगता देखा गया’।
~सज्जाद अख्तर, भारत


वाहनों और यात्रियों की बेतहाशा भीड़ में,
‘जो सँभल कर चल रहा था रेंगता देखा गया’।
~सज्जाद अख्तर, भारत


जो उसूलों को बताते थे धता वे बढ़ गए,
‘जो सँभल कर चल रहा था रेंगता देखा गया’।
~प्रेम बिहारी मिश्रा, भारत


क्या से क्या होता गया इस वक्त की रफ़्तार में ,
‘जो सँभल कर चल रहा था रेंगता देखा गया’।
`रेनू हुसैन भारत


जो परिंदा फ़िक्र से बिंदास था वो उङ गया,
'जो संभल कर चल रहा था, रेंगता देखा गया' ।
आलोक 'अविरल', भारत


फ़ाख्ता कल तक उड़ाते थे जो मन्त्री पद पे हैं,
‘जो सँभल कर चल रहा था रेंगता देखा गया’।
~ अशोक सिंह, न्यूयॉर्क 


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 604 वें मिसरे: "तब कहीं फूल मुस्कुराते हैं"

 पर 'एक शे'र अर्ज़ किया है' के शायरों की लगाई गईं गिरह:


मिट्टी सहती है कितनी तकलीफें 
'तब कहीं फूल मुस्कुराते हैं । 1 ।
~ लक्ष्मी शंकर बाजपेई, भारत


जब हिफ़ाज़त मिली हो कांटों की
'तब कहीं फूल मुस्कुराते हैं' । 2 ।
~ लक्ष्मी शंकर बाजपेई, भारत


जब पसीना बहाता है माली,
'तब कहीं फूल मुस्कुराते हैं। 1 ।
~अनमोल शुक्ल ' अनमोल' , भारत


जब मिले खाद औ हवा पानी,
'तब कहीं फूल मुस्कुराते हैं'। 2 ।
~अनमोल शुक्ल ' अनमोल' , भारत


रंग भरता है रात भर कोई 
'तब कहीं फूल मुस्कुराते हैं' ।
~ दिगंबर नासवा, मलेशिया


जब वो हँसता है खिलखिलाकर के
'तब कहीं फूल मुस्कुराते हैं' । 1 ।
~ प्रज्ञा त्रिवेदी , भारत


बीज उगता है चीरकर मिट्टी
'तब कहीं फूल मुस्कुराते हैं’। 2 ।
~ प्रज्ञा त्रिवेदी , भारत


जब वो होता है ख़ुश ज़रा सा भी
'तब कहीं फूल मुस्कुराते हैं'। 3 ।
~ प्रज्ञा त्रिवेदी , भारत


आप जब हमको याद आते हैं 
'तब कहीं फूल मुस्कुराते हैं’।
~ सज्जाद अख्तर ,भारत 


रात-दिन बागबॉं करे मेहनत 
'तब कहीं फूल मुस्कुराते हैं'।
~ममता किरण, भारत


हो कभी कातिले खिज़ाँ मौसम,
 'तब कहीं फूल मुस्कुराते हैं'। 1 ।
~प्रेम बिहारी मिश्रा, भारत


प्यार देता है जब उन्हें माली 
‘तब कहीं फूल मुस्कुराते हैं’। 2 ।
~प्रेम बिहारी मिश्रा, भारत


खाद पानी मिले मुहब्बत का
‘तब कहीं फूल मुस्कुराते हैं’। 3 ।
~प्रेम बिहारी मिश्रा, भारत


जब हिफ़ाज़त करें कई काँटे
‘तब कहीं फूल मुस्कुराते हैं’। 4 ।
~प्रेम बिहारी मिश्रा, भारत


जब मुहब्बत लुटाती है शबनम
‘तब कहीं फूल मुस्कुराते हैं’। 5 ।
~प्रेम बिहारी मिश्रा, भारत


जब बहारों का आता है मौसम 
‘तब कहीं फूल मुस्कुराते हैं’। 6 ।
~प्रेम बिहारी मिश्रा, भारत


जब भ्रमर मिल के गुनगुनाते हैं 
‘तब कहीं फूल मुस्कुराते हैं’। 7 ।
~प्रेम बिहारी मिश्रा, भारत


सौंप देता है दिल उन्हें माली
‘तब कहीं फूल मुस्कुराते हैं’। 8 ।
~प्रेम बिहारी मिश्रा, भारत


जब खिज़ाँ का वज़ूद मिट जाए
‘तब कहीं फूल मुस्कुराते हैं’। 9 ।
~प्रेम बिहारी मिश्रा, भारत


रात दिन चैन बागवां खोए
‘तब कहीं फूल मुस्कुराते हैं’। 10 ।
~प्रेम बिहारी मिश्रा, भारत


प्रेम की जब हवा चले मोहक
‘तब कहीं फूल मुस्कुराते हैं’। 11 ।
~प्रेम बिहारी मिश्रा, भारत


साथ जब आसमान देता है
'तब कहीं फूल मुस्कुराते हैं’ ।
~के पी सक्सेना, भारत


तितलियाँ चूमती हैं शरमा कर
'तब कहीं फूल मुस्कुराते हैं'।
अनिमेष शर्मा 'आतिश', भारत 


जब मुहब्बत दिलों में तारी हो,
'तब कहीं फूल मुस्कुराते हैं'।
रेनू हुसैन, भारत


साल भर धूप सहती है धरती,
'तब कहीं फूल मुस्कुराते हैं' ।
~शिव मोहन सिंह, किर्गिस्तान

भौरों की भन्न जब भनक आए, 
'तब कहीं फूल मुस्कुराते हैं’ ।
~ अशोक सिंह , न्यू यॉर्क 


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संपादक

~ कौसर भुट्टो, दुबई


 



301 वाँ एक शे’र गिरह-नामा: 27 दिसंबर , 2025

301 वाँ एक शे’र गिरह-नामा: 27 दिसंबर , 2025

एक‌ शे'र‌ अर्ज़ किया है’ मंच के साप्ताहिक 2 तरही मिसरों पर आधारित #डिजिटल_वीडियो_गोष्ठी का 301 वाँ तरही मुशायरा कार्यक्रम।

 आज का मुशायरा इन दो मिसरों पर आधारित था:

601 वाँ मिसरा: "अभी तलक तो ये पत्ता शजर का हिस्सा है"।
~खुशबीर सिंह 'शाद


602 वाँ मिसरा: ''सफ़र हमारा अभी गीली रहगुज़र पर है'। ~ शमीम अनवर

                                 *****^*****

 जायज़ा लीजिए अलग अलग ज़ावियों से इन मिसरों पर लगाई हुई गिरह का;

601 वें मिसरे: 'अभी तलक तो ये पत्ता शजर का हिस्सा है'

पर 'एक शे'र अर्ज़ किया है' के शायरों की लगाई गईं गिरह:


शजर के साथ अभी तक वजूद है इसका 
'अभी तलक तो ये पत्ता शजर का हिस्सा है'।
~सज्जाद अख्तर, भारत


मनाएं जश्न इसी बात का न क्यों आख़िर!
‘अभी तलक तो ये पत्ता शजर का हिस्सा है’। 1 l
~के.पी. सक्सेना, भारत


इसी ही बात पे उसको सुकून है कितना!
‘अभी तलक तो ये पत्ता शजर का हिस्सा है’। 2 l
~के.पी. सक्सेना, भारत


हुआ जो ज़र्द तो ख़ुद शाख इसे गिरा देगी 
'अभी तलक तो ये पत्ता शजर का हिस्सा है' । 1।
~लक्ष्मी शंकर वाजपेई, भारत ।


पड़ेगा छोड़ना इक दिन बगीचा दुनिया का 
‘अभी तलक तो ये पत्ता शजर का हिस्सा है’।2।
~लक्ष्मी शंकर वाजपेई, भारत ।


कभी तो छोड़ के नैहर ये ,जायेगी बेटी
‘अभी तलक तो ये पत्ता शजर का हिस्सा है’।
~ प्रज्ञा त्रिवेदी , भारत


तमाम भीड़ में खो जाना डर का हिस्सा है।
‘अभी तलक तो ये पत्ता शजर का हिस्सा है’।1।
~खुर्रम 'नूर', भारत ।


अभी कहाँ है अलग कोई शख़्सियत इसकी?
‘अभी तलक तो ये पत्ता शजर का हिस्सा है’।2।
~खुर्रम 'नूर', भारत ।


रही न कोई भी पहचान आज तक इस की,
‘अभी तलक तो ये पत्ता शजर का हिस्सा है’।3।
~खुर्रम 'नूर', भारत ।


न कुछ बिगाड़ सकेंगी ये आँधियाँ इसका,
‘अभी तलक तो ये पत्ता शजर का हिस्सा है’।4।
~खुर्रम 'नूर', भारत ।


ये जब मिलेगा अकेला तो इस को देखेंगे,
‘अभी तलक तो ये पत्ता शजर का हिस्सा है’।5।
~खुर्रम 'नूर', भारत ।


ये क्या रहेगा अलग होके देखते रहिए-
‘अभी तलक तो ये पत्ता शजर का हिस्सा है’।6।
~खुर्रम 'नूर', भारत ।


लगा है कबसे इसे तोड़ने में वो लेकिन
‘अभी तलक तो ये पत्ता शजर का हिस्सा है’।
~दिगंबर नसवा, मलेशिया ।


न जाने कब किसी आँगन में जा के गिर जाए,
‘अभी तलक तो ये पत्ता शजर का हिस्सा है’।
रमणी थापर, कैलिफोर्निया ।


अभी तलक तो है इसका वजूद दुनिया में,
‘अभी तलक तो ये पत्ता शजर का हिस्सा है’।
~मनोज 'अबोध', भारत


अभी तो फूल भी उगाएगी वही डाली,
‘अभी तलक तो ये पत्ता शजर का हिस्सा है’।
~अनमोल शुक्ल ' अनमोल' , भारत


हवा के झॉंसे में आ जाए ये न जाने कब,
‘अभी तलक तो ये पत्ता शजर का हिस्सा है’।
~ अशोक सिंह, न्यूयॉर्क 


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 602 वें मिसरे: 'सफ़र हमारा अभी गीली रहगुज़र पर है'

 पर 'एक शे'र अर्ज़ किया है' के शायरों की लगाई गईं गिरह:


न गीली आंखें बनें अपने प्यार की मंज़िल 
'सफ़र हमारा अभी गीली रहगुज़र पर है' ।
~ लक्ष्मी शंकर बाजपेई, भारत


गिरे तो हाथ बढ़ाने न आयेगा कोई 
'सफ़र हमारा अभी गीली रहगुज़र पर है' ।
~ दिगंबर नासवा, मलेशिया


ज़रा सी आग की दरकार है मुहब्बत में
'सफ़र हमारा अभी गीली रहगुज़र पर है' ।
~प्रज्ञा त्रिवेदी ,भारत


ये लड़खड़ाहटें अपनी हैं बस इसी बाइस,
'सफ़र हमारा अभी गीली रहगुज़र पर है' ।
~ सज्जाद अख्तर ,भारत 


अभी भी वक़्त है पाँओं फ़िसलना चाहें तो, 
‘सफ़र हमारा अभी गीली रहगुज़र पर है’।
~ अशोक सिंह , न्यू यॉर्क 


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इस कार्यक्रम का यू-ट्यूब वीडियो देखने के लिए यहाँ क्लिक करिये:


©️सर्वाधिकार सुरक्षित। इस पोस्ट में साझा किए गए सभी गिरह के शे'र 'एक शे'र अर्ज़ किया है' पटल पर शामिल शायरों के हैं। इनमें से कोई भी शे'र शायर की लिखित पूर्व सहमति के बग़ैर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है।

संपादक

~ कौसर भुट्टो, दुबई


 


गुरुवार, 25 दिसंबर 2025

300 वाँ एक शे’र गिरह-नामा: 20 दिसंबर , 2025

300 वाँ एक शे’र गिरह-नामा: 20 दिसंबर , 2025

एक‌ शे'र‌ अर्ज़ किया है’ मंच के साप्ताहिक 2 तरही मिसरों पर आधारित #डिजिटल_वीडियो_गोष्ठी का 300 वाँ तरही मुशायरा कार्यक्रम।

 आज का मुशायरा इन दो मिसरों पर आधारित था:

599 वाँ मिसरा: "अपनी तरह से कोई अकेला नहीं मिला"।
 ~ मुस्तफ़ा ज़ैदी

600 वाँ मिसरा: ''कुछ इजाज़त मगर आपकी तो मिले''। 
~ मंज़र भोपाली

                                 *****^*****

 जायज़ा लीजिए अलग अलग ज़ावियों से इन मिसरों पर लगाई हुई गिरह का;

599 वें मिसरे: 'अपनी तरह से कोई अकेला नहीं मिला'

पर 'एक शे'र अर्ज़ किया है' के शायरों की लगाई गईं गिरह:


परिवार दोस्त रिश्ते सभी यूं तो थे मगर,
‘अपनी तरह से कोई अकेला नहीं मिला’।
~लक्ष्मी शंकर वाजपेई, भारत ।


तन्हाइयों का दर्द सभी को मिला था पर,
‘अपनी तरह से कोई अकेला नहीं मिला’।
~दिगंबर नसवा, मलेशिया ।


मैं ख़ुद भी अपने साथ नहीं हूँ,कमाल है!
‘अपनी तरह से कोई अकेला नहीं मिला’।
~खुर्रम 'नूर', भारत ।


हर इक को था भरम कि अकेला है वो मगर
‘अपनी तरह से कोई अकेला नहीं मिला’।1।
~ प्रज्ञा त्रिवेदी , भारत


हैं वर्चुअल तो दोस्त सभी के हज़ार पर
‘अपनी तरह से कोई अकेला नहीं मिला’। 2।
~ प्रज्ञा त्रिवेदी , भारत


एक भीड़ सी आती है नज़र यूँ तो आस पास ,
‘अपनी तरह से कोई अकेला नहीं मिला’।
~रेखा मैत्रा

है सबसे ज़ुदा अपनी तबीयत तो क्या कहें 
‘अपनी तरह से कोई अकेला नहीं मिला’।
~रमणी थापर, कैलिफोर्निया 


हर कोई अपने-अपने ख़ाबों के साथ था 
‘अपनी तरह से कोई अकेला नहीं मिला’।
~रूबी मोहंती, भारत 


कोई न कोई पास हर इक के मिला मुझे,
‘अपनी तरह से कोई अकेला नहीं मिला’।
~अनमोल शुक्ल ' अनमोल' , भारत


तन्हा मिले हैं यूं तो कई लोग भीड़ में 
‘अपनी तरह से कोई अकेला नहीं मिला’।
~सज्जाद अख्तर, भारत


जिसको भी देखिए वही दो-दो के साथ है 
‘अपनी तरह से कोई अकेला नहीं मिला'।
~मनोज 'अबोध', भारत


कहने को तो सभी ने सुनाई थी दास्तां
'अपनी तरह से कोई अकेला नहीं मिला’।
~के.पी. सक्सेना, भारत


जो भी मिला, मिला है मिलावट के साथ ही
‘अपनी तरह से कोई अकेला नहीं मिला’।
~प्रेम बिहारी मिश्रा, भारत


चल तो रहे थे लोग सभी मेरे साथ पर
‘अपनी तरह से कोई अकेला नहीं मिला’।1।
~रेनू हुसैन भारत


मैं जिस तरह से भीड़ में भी हो गई तन्हा
‘अपनी तरह से कोई अकेला नहीं मिला’।2।
`रेनू हुसैन भारत


रूठे अगरचे एक, मना लेगा दूसरा,
‘अपनी तरह से कोई अकेला नहीं मिला’।
~पूनम माटिया,


तनहाइयाँ तो साथ में सबके ही थीं मगर, 
‘अपनी तरह से कोई अकेला नहीं मिला’ ।
~डॉ० भावना कुँअर, ऑस्ट्रेलिया 


औरों के साथ उनकी ही परछाई तो रही 
‘अपनी तरह से कोई अकेला नहीं मिला’।
~प्रगीत कुँअर ,ऑस्ट्रेलिया


लाए थे साथ कुछ तो शगूफ़े सभी कोई,  
‘अपनी तरह से कोई अकेला नहीं मिला’।
~ अशोक सिंह, न्यूयॉर्क 


*✨*☀️**✨**


 600 वें मिसरे: 'कुछ इजाज़त मगर आपकी तो मिले' 

 पर 'एक शे'र अर्ज़ किया है' के शायरों की लगाई गईं गिरह:


आपको आपसे ही चुरा लूँ न क्यों,
‘कुछ इजाज़त मगर आपकी तो मिले’।
~प्रज्ञा त्रिवेदी ,भारत


बन के धड़कन हृदय की में बजता रहूँ ,
‘कुछ इजाज़त मगर आपकी तो मिले’।
~ दिगंबर नासवा, मलेशिया


अपने नग्मों मे मै आपको बुन तो दूँ,
‘कुछ इजाज़त मगर आपकी तो मिले’।
~अनमोल शुक्ल ' अनमोल' , भारत


आपके ग़म लगा लें कलेजे से हम,
‘कुछ इजाज़त मगर आपकी तो मिले’।
~ सज्जाद अख्तर ,भारत 


दूर जाने को मजबूर हूं आपसे 
‘कुछ इजाज़त मगर आपकी तो मिले’।1।
~ लक्ष्मी शंकर बाजपेई, भारत


कोर्ट मैरिज की अर्जी तो कल दे दूं मैं 
‘कुछ इजाज़त मगर आपकी तो मिले’।2।
~ लक्ष्मी शंकर बाजपेई, भारत


चाहे जब हम तो मर कर भी देंगे दिखा।
‘कुछ इजाज़त मगर आपकी तो मिले’।
~के पी सक्सेना, भारत


यूँ तो मेरे इरादे बड़े नेक हैं,
‘कुछ इजाज़त मगर आपकी तो मिले’।
~खुर्रम 'नूर', भारत


आपका नाम मैं ज़िदगी ये लिखूं,
‘कुछ इजाज़त मगर आपकी तो मिले’।1।
~प्रेम बिहारी मिश्रा, भारत


ज़िन्दगी मैं हवाले करूं आपके,
‘कुछ इजाज़त मगर आपकी तो मिले’।2।
~प्रेम बिहारी मिश्रा, भारत


मैं कसीदे सदा आपके ही पढूं,
‘कुछ इजाज़त मगर आपकी तो मिले’।3।
~प्रेम बिहारी मिश्रा, भारत


ग़म हरिक आपका नाम अपने करूं
‘कुछ इजाज़त मगर आपकी तो मिले’।4।
~प्रेम बिहारी मिश्रा, भारत


हम भी शामिल कहानी में हो जाएंगे,
‘कुछ इजाज़त मगर आपकी तो मिले’।
~कौसर भुट्टो, दुबई


हम बनायेंगे मिल ख़्वाब का इक महल
‘कुछ इजाज़त मगर आपकी तो मिले’ ।
~डॉ० भावना कुँअर, ऑस्ट्रेलिया 


आँखों-आँखों में हम बात कर लें अभी 
‘कुछ इजाज़त मगर आपकी तो मिले’।
~प्रगीत कुँअर, ऑस्ट्रेलिया


कर दूँ इज़हार दिल की ख़लिश तो हो कम, 
‘कुछ इजाज़त मगर आपकी तो मिले’।
~ अशोक सिंह , न्यू यॉर्क 


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इस कार्यक्रम का यू-ट्यूब वीडियो देखने के लिए यहाँ क्लिक करिये:


©️सर्वाधिकार सुरक्षित। इस पोस्ट में साझा किए गए सभी गिरह के शे'र 'एक शे'र अर्ज़ किया है' पटल पर शामिल शायरों के हैं। इनमें से कोई भी शे'र शायर की लिखित पूर्व सहमति के बग़ैर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है।

संपादक

~ कौसर भुट्टो, दुबई


 


सोमवार, 15 दिसंबर 2025

299 वाँ एक शे’र गिरह-नामा: 13 दिसंबर , 2025

299 वाँ एक शे’र गिरह-नामा: 13 दिसंबर , 2025

एक‌ शे'र‌ अर्ज़ किया है’ मंच के साप्ताहिक 2 तरही मिसरों पर आधारित #डिजिटल_वीडियो_गोष्ठी का 299 वाँ तरही मुशायरा कार्यक्रम।

 आज का मुशायरा इन दो मिसरों पर आधारित था:

597 वाँ मिसरा: ''क़ैद-ए-सय्याद से कैसे कोई पछी निकले" l

~विभा जैन 'ख्वाब'


598 वाँ मिसरा: "सिकंदरों के सामने गुलाम बोलने लगे"। 

~ शफ़क़ तनवीर
                                 *****^*****

 जायज़ा लीजिए अलग अलग ज़ावियों से इन मिसरों पर लगाई हुई गिरह का;

597 वें मिसरे: '''क़ैद-ए-सय्याद से कैसे कोई पछी निकले"

पर 'एक शे'र अर्ज़ किया है' के शायरों की लगाई गईं गिरह:


एक ही वार से पर काट दिए हों जिनके,
‘क़ैद-ए-सय्याद से कैसे कोई पंछी निकले’।
अनमोल शुक्ल ' अनमोल' , भारत


रख पकड़ ढीली मुहब्बत में ,उसे ये न लगे,
‘क़ैद-ए-सय्याद से कैसे कोई पंछी निकले’। 1।
~ प्रज्ञा त्रिवेदी , भारत


एक पूरी जो हुई दूजी मुरादें हैं खड़ी
‘क़ैद-ए-सय्याद से कैसे कोई पंछी निकले’। 2 ।
~ प्रज्ञा त्रिवेदी , भारत


 सोचने देगी जो बीवी, न तभी सोचेगा!
‘क़ैद-ए-सय्याद से कैसे कोई पंछी निकले’। 3 ।
~ प्रज्ञा त्रिवेदी , भारत


ज़हनो दिल से न तेरी याद पुरानी निकले,
‘क़ैद-ए-सय्याद से कैसे कोई पंछी निकले’।
~सज्जाद अख्तर, भारत


उसने जकड़ा है उन्हें दे के सुनहरे मोती ,
‘क़ैद-ए-सय्याद से कैसे कोई पंछी निकले’।
ममता 'किरण', भारत


अब तो आराम-तलब जैसे कफ़स में ही सभी,
‘क़ैद-ए-सय्याद से कैसे कोई पंछी निकले’।
~ अशोक सिंह, न्यूयॉर्क 


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 598 वें मिसरे: ‘'सिकंदरों के सामने गुलाम बोलने लगे"।

 पर 'एक शे'र अर्ज़ किया है' के शायरों की लगाई गईं गिरह:


मेरी ग़ज़ल के चंद शेर सुन के ये असर हुआ,
‘सिकंदरों के सामने ग़ुलाम बोलने लगे’।
~ आलोक 'अविरल', भारत


जो दे दी दफ़्तरों में बॉस ने ज़रा सी छूट क्या,
‘सिकंदरों के सामने ग़ुलाम बोलने लगे’।
~प्रज्ञा त्रिवेदी ,भारत


समय-समय की बात है समय-समय का फेर है,
‘सिकंदरों के सामने ग़ुलाम बोलने लगे’।
~मनोज अबोध, भारत 


हुआ है जुल्म उनपे, अपने हक़ की जब तलब जगी,
‘सिकंदरों के सामने ग़ुलाम बोलने लगे’।
~अनमोल शुक्ल ' अनमोल' , भारत


बचाव मार का विरोध सा लगा तो यूँ कहा,
‘सिकंदरों के सामने ग़ुलाम बोलने लगे’। 1 ।
~ दिगंबर नासवा, मलेशिया


कफ़न लपेट कर सरों पे आ गए तो यूँ कहा 
‘सिकंदरों के सामने ग़ुलाम बोलने लगे’। 2 ।
~ दिगंबर नासवा, मलेशिया


मिरे ही फ़ैसलों से शाद अवाम बोलने लगे,
‘सिकंदरों के सामने ग़ुलाम बोलने लगे’।
~ अकबर शाद 'उदयपुरी', भारत  


हदें उबूर हो गईं अवाम बोलने लगे
‘सिकंदरों के सामने ग़ुलाम बोलने लगे’। ।1।
~ सज्जाद अख्तर ,भारत 


इक ऐसा वक़्त आ गया कि चीख़ उठीं ख़मोशियां,
 ‘सिकंदरों के सामने ग़ुलाम बोलने लगे’। । 2 ।
~ सज्जाद अख्तर ,भारत 


सिपाही ने उगल दिया, है घूंस आई जी ने ली 
‘सिकंदरों के सामने ग़ुलाम बोलने लगे’।
~ लक्ष्मी शंकर बाजपेई, भारत


हदें भी पार हो गयीं तो यूं हुआ जनाब फिर 
‘सिकंदरों के सामने ग़ुलाम बोलने लगे’।
~ममता किरण, भारत 


कुएं के मेंढ़कों को भी जुकाम हो चला है क्या!
‘सिकंदरों के सामने ग़ुलाम बोलने लगे’।
~के पी सक्सेना, भारत


निज़ाम की समझ नहीं, न सूझ बूझ राज की,
‘सिकंदरों के सामने ग़ुलाम बोलने लगे’। 1 ।
~खुर्रम 'नूर', भारत


 अनाड़ियों को हक़ मिला है किस क़दर अजीब सा,
‘सिकंदरों के सामने ग़ुलाम बोलने लगे’। 2 ।
~खुर्रम 'नूर', भारत


 सियासती मु’आमलों से छूट इतनी मिल गई,
‘सिकंदरों के सामने ग़ुलाम बोलने लगे’।
~ अशोक सिंह , न्यू यॉर्क 


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इस कार्यक्रम का यू-ट्यूब वीडियो देखने के लिए यहाँ क्लिक करिये:


©️सर्वाधिकार सुरक्षित। इस पोस्ट में साझा किए गए सभी गिरह के शे'र 'एक शे'र अर्ज़ किया है' पटल पर शामिल शायरों के हैं। इनमें से कोई भी शे'र शायर की लिखित पूर्व सहमति के बग़ैर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है।

संपादक

~ कौसर भुट्टो, दुबई


 


मंगलवार, 9 दिसंबर 2025

298 वाँ एक शे’र गिरह-नामा: 6 दिसंबर , 2025

298 वाँ एक शे’र गिरह-नामा:  6 दिसंबर , 2025

एक‌ शे'र‌ अर्ज़ किया है’ मंच के साप्ताहिक 2 तरही मिसरों पर आधारित #डिजिटल_वीडियो_गोष्ठी का 298 वाँ तरही मुशायरा कार्यक्रम।

 आज का मुशायरा इन दो मिसरों पर आधारित था:

595 वाँ मिसरा: ''हम तो डूबे हैं ख़ुदाओं पे भरोसा करके''। 

~ इशरत किरतपुरी


596 वाँ मिसरा: ‘'जब ये लगता है कि वो देखने.वाला है मुझे'। 

~ सुदेश कुमार मेहर

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 जायज़ा लीजिए अलग अलग ज़ावियों से इन मिसरों पर लगाई हुई गिरह का;

595 वें मिसरे: ''हम तो डूबे हैं ख़ुदाओं पे भरोसा करके''

पर 'एक शे'र अर्ज़ किया है' के शायरों की लगाई गईं गिरह:


मस्त बैठे थे किनारे पे थे बेफिक्र बहुत, 
‘हम तो डूबे हैं ख़ुदाओं पे भरोसा करके’।
अनमोल शुक्ल ' अनमोल' , भारत


सबको तिनकों के सहारे ही मिला है साहिल
‘हम तो डूबे हैं ख़ुदाओं पे भरोसा करके’।
~ प्रज्ञा त्रिवेदी , भारत


न तो हसरत ही थी ऐसी न कोई मज़बूरी
‘हम तो डूबे हैं ख़ुदाओं पे भरोसा करके’।
अनिमेष शर्मा, भारत


बद से बदतर हैं जो हालात मेरी बस्ती के
‘हम तो डूबे हैं ख़ुदाओं पे भरोसा करके’।
~ लक्ष्मी शंकर बाजपेई, भारत


हमको तूफ़ां से निकलने का हुनर आता था 
‘हम तो डूबे हैं ख़ुदाओं पे भरोसा करके’।
सज्जाद अख्तर, भारत


इक ख़ुदा रखते तो हर हाल बचा लेता हमें 
‘हम तो डूबे हैं ख़ुदाओं पे भरोसा करके’।
मनोज अबोध, भारत


मुझ पे विश्वास है तो आप न करना हरगिज़ 
‘हम तो डूबे हैं ख़ुदाओं पे भरोसा करके’।
~ दिगंबर नासवा, मलेशिया


हमसे बेहतर हैं वही लोग, भले! काफ़िर हैं!
‘हम तो डूबे हैं ख़ुदाओं पे भरोसा करके’।
के पी सक्सेना, भारत


तुझको किसने है डुबाया ये तो तू ही जाने,
‘हम तो डूबे हैं ख़ुदाओं पे भरोसा करके’।
ममता किरण, भारत 


जब तलक था न यकीं उसपे हमें क्या ग़म था,
 ‘हम तो डूबे हैं ख़ुदाओं पे भरोसा करके’।
रेनू हुसैन, भारत


मर भी जाएँगे तो अफ़सोस नहीं होगा कोई, 
‘हम तो डूबे हैं ख़ुदाओं पे भरोसा करके’।
~ अशोक सिंह, न्यूयॉर्क 


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 596 वें मिसरे: ‘'जब ये लगता है कि वो देखने.वाला है मुझे' 

 पर 'एक शे'र अर्ज़ किया है' के शायरों की लगाई गईं गिरह:


मैं उसी वक़्त बन लेता हूँ रोनी सूरत 
‘जब ये लगता है कि वो देखने वाला है मुझे’।
~मनोज अबोध, भारत 


एक मुस्कान चढा लेता हू मै चेहरे पर
‘जब ये लगता है कि वो देखने वाला है मुझे’।
अनमोल शुक्ल ' अनमोल' , भारत


कर लिया करती हूँ पलकों को ही चिलमन अपनी
‘जब ये लगता है कि वो देखने वाला है मुझे’। 1 l
~प्रज्ञा त्रिवेदी ,भारत


दे दूँ गच्चा मैं परीक्षा में निरीक्षक को भी
‘जब ये लगता है कि वो देखने वाला है मुझे’। 2 l
~ प्रज्ञा त्रिवेदी , भारत


गोलगप्पों को निगल प्लेट छुपा देती हूँ
‘जब ये लगता है कि वो देखने वाला है मुझे’। 3 l
~ प्रज्ञा त्रिवेदी , भारत


हर बुरे काम से डर जाता हूं तन्हाई में
‘जब ये लगता है कि वो देखने वाला है मुझे’। 1 l
~ सज्जाद अख्तर ,भारत 


हाथ चुपके से मैं पॉकेट से हटा लेता हूं
‘जब ये लगता है कि वो देखने वाला है मुझे’। 2 l
~ सज्जाद अख्तर ,भारत 


मैं समोसे को भी पॉकेट में छिपा लेता हूं
‘जब ये लगता है कि वो देखने वाला है मुझे’। 3 l
~ सज्जाद अख्तर ,भारत 


झेल जाता हूं मेरी ज़ीस्त का हर ज़ेरो ज़बर 
‘जब ये लगता है कि वो देखने वाला है मुझे’। 4 l
~ सज्जाद अख्तर ,भारत 


झेंपता हूं कि नहीं उसका कहा कर पाया 
‘जब ये लगता है कि वो देखने वाला है मुझे’।
~ लक्ष्मी शंकर बाजपेई, भारत


फट से चैनल को बदल देता हूं मैं चुपके से 
‘जब ये लगता है कि वो देखने वाला है मुझे’। 2 l
~ लक्ष्मी शंकर बाजपेई, भारत


फिर से अखबार पड़ोसी का वहीं रख देता 
‘जब ये लगता है कि वो देखने वाला है मुझे’। 3 l
~ लक्ष्मी शंकर बाजपेई, भारत


एक इन्सान का चेहरा में चढ़ा लेता हूँ 
‘जब ये लगता है कि वो देखने वाला है मुझे’।
~ दिगंबर नासवा, मलेशिया


मुस्कुरा देता हूँ मैं अश्क छुपा कर अपने
‘जब ये लगता है कि वो देखने वाला है मुझे’ l
प्रेम बिहारी मिश्र, भारत


फुर से उड़ जाती हूँ मैं चोंच में भर के दाना 
‘जब ये लगता है कि वो देखने वाला है मुझे’।
रमनी थापर, कैलिफोर्निया


उसकी महफ़िल से मैं ख़ामोश गुज़र जाता हूँ
‘जब ये लगता है कि वो देखने वाला है मुझे’।
~ अकबर शाद 'उदयपुरी', भारत  


बस उसी पल में ही छा जाती है रंगत मुझमें 
‘जब ये लगता है कि वो देखने वाला है मुझे’।
ममता किरण, भारत


ख़ुद को अपनी ही नज़र से छिपा लेती हूँ
‘जब ये लगता है कि वो देखने वाला है मुझे’।
-रेणु हुसैन, भारत


उसको अपना मैं तो आईना बना लेती हूँ
‘जब ये लगता है कि वो देखने वाला है मुझे’। 1 l
मधु शर्मा, अमेरिका


देखती रहती गिरा मुख पे हया की चिलमन
‘जब ये लगता है कि वो देखने वाला है मुझे’। 2 l
मधु शर्मा, अमेरिका


ख़ुद ब ख़ुद चेहरे पे आ जाती है रौनक सी कोई, 
‘जब ये लगता है कि वो देखने वाला है मुझे’।
~ अशोक सिंह , न्यू यॉर्क 


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इस कार्यक्रम का यू-ट्यूब वीडियो देखने के लिए यहाँ क्लिक करिये:


©️सर्वाधिकार सुरक्षित। इस पोस्ट में साझा किए गए सभी गिरह के शे'र 'एक शे'र अर्ज़ किया है' पटल पर शामिल शायरों के हैं। इनमें से कोई भी शे'र शायर की लिखित पूर्व सहमति के बग़ैर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है।

संपादक

~ कौसर भुट्टो, दुबई


 


मंगलवार, 2 दिसंबर 2025

297 वाँ एक शे’र गिरह-नामा: 29 नवंबर , 2025

 297 वाँ एक शे’र गिरह-नामा: 29 नवंबर , 2025

एक‌ शे'र‌ अर्ज़ किया है’ मंच के साप्ताहिक 2 तरही मिसरों पर आधारित #डिजिटल_वीडियो_गोष्ठी का 297 वाँ तरही मुशायरा कार्यक्रम।

 आज का मुशायरा इन दो मिसरों पर आधारित था:

593 वाँ मिसरा: 'मगर वो क्या करे जिस का भरोसा टूट जाता है' |

~ हसीब सोज़


594 वाँ मिसरा: ‘हम से नादानी हुई या तुम से नादानी हुई’।

~ दाग़ देहलवी

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 जायज़ा लीजिए अलग अलग ज़ावियों से इन मिसरों पर लगाई हुई गिरह का;

593 वें मिसरे: 'मगर वो क्या करे जिस का भरोसा टूट जाता है'

पर 'एक शे'र अर्ज़ किया है' के शायरों की लगाई गईं गिरह:


 भरोसे की इमारत पर खड़ा होता है हर रिश्ता,
'मगर वो क्या करे जिसका भरोसा टूट जाता है' |
~ अकबर शाद 'उदयपुरी', भारत  


न सोचो खुदकुशी, ये पाप है, समझाता हूं उसको,
'मगर वो क्या करे जिसका भरोसा टूट जाता है' |
~ लक्ष्मी शंकर बाजपेई, भारत


है मुमकिन कि दिखा आँखों सुना कानों ग़लत होगा 
'मगर वो क्या करे जिसका भरोसा टूट जाता है' | 1 ।
~ प्रज्ञा त्रिवेदी , भारत


कहा माँ ने न पीटूंगी तो पीटेगी नहीं तय है,
'मगर वो क्या करे जिसका भरोसा टूट जाता है' | 2 ।
~ प्रज्ञा त्रिवेदी , भारत


फ़िज़ूली है तजस्सुस बाकियों में तो न हो हैरत, 
'मगर वो क्या करे जिस का भरोसा टूट जाता है।
 * तजस्सुस जिज्ञासा
~ अशोक सिंह, न्यूयॉर्क 


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 594 वें मिसरे: ‘हम से नादानी हुई या तुम से नादानी हुई’

 पर 'एक शे'र अर्ज़ किया है' के शायरों की लगाई गईं गिरह:


भाग कर शादी रचा ली हमने आकर जोश में,
‘हम से नादानी हुई या तुम से नादानी हुई’।
अनमोल प्रकाश शुक्ला, भारत 


अब भला सर पीटने का रह गया क्या ही सबब!
‘हम से नादानी हुई या तुम से नादानी हुई’।
के पी सक्सेना , भारत 


होगा दोनों को भुगतना जो भी अब अंजाम हो
‘हम से नादानी हुई या तुम से नादानी हुई’। 1 |
~ लक्ष्मी शंकर बाजपेई, भारत


एक अपराधी विधायक बन गया है शान से
‘हम से नादानी हुई या तुम से नादानी हुई’। 2 |
~ लक्ष्मी शंकर बाजपेई, भारत


हमको खारा क्यों किया सागर से बोली इक नदी 
‘हम से नादानी हुई या तुम से नादानी हुई’। 3 |
~ लक्ष्मी शंकर बाजपेई, भारत


सोचने दो आने वाली इस सदी की ज़ात को,
‘हम से नादानी हुई या तुम से नादानी हुई’।
-रेणु हुसैन, भारत


तुम मुकर जाओगे वादा करके ये सोचा न था,
‘हम से नादानी हुई या तुम से नादानी हुई’।
ममता किरण, भारत 


लग़ज़िशों के बाद अब ये सोचना बेकार है,
‘हम से नादानी हुई या तुम से नादानी हुई’। 1 ।
~ सज्जाद अख्तर ,भारत 


परवरिश दोनों करेंगे छोड़िए इस बात को
‘हम से नादानी हुई या तुम से नादानी हुई’। 2 ।
~ सज्जाद अख्तर ,भारत 


एक नन्हीं जान का तो कुछ नहीं इसमें क़ुसूर,
‘हम से नादानी हुई या तुम से नादानी हुई’। 3 ।
~ सज्जाद अख्तर ,भारत 


दो कदम भी चल न पाये ज़िन्दगी की राह पर 
‘हम से नादानी हुई या तुम से नादानी हुई’।
~ दिगंबर नासवा, मलेशिया


फ़ैसले की रात में चुप थे मगर दोनों तरफ़,
‘हम से नादानी हुई या तुम से नादानी हुई’।
~ अकबर शाद 'उदयपुरी', भारत  


उम्र के इस मोड़ पर, क्या फ़ायदा ये सोचकर 
‘हम से नादानी हुई या तुम से नादानी हुई’ ।
~मनोज अबोध, भारत 

 
हो गई तो हो गई अब क्या करोगे जानकर,
'हमसे नादानी हुई या तुमसे नादानी हुई' ।
~प्रज्ञा त्रिवेदी ,भारत


उस घड़ी को याद करके, झाँक कर दिल में कहो, 
'हम से नादानी हुई? या तुम से नादानी हुई?'
~खुर्रम नूर, भारत


होना था जो हो गया, अब सोच कर क्या फायदा,
हम से नादानी हुई या तुमसे नादानी हुई ।
कौसर भुट्टो,  दुबई 


बॉंध दें सेहरा किसी नादान के सर पर चलो, 
‘हम से नादानी हुई या तुम से नादानी हुई’। 1 |
~ अशोक सिंह , न्यू यॉर्क 


अक़्ल वालों में कहॉं से खेल दिल का हो गया, 
‘हम से नादानी हुई या तुम से नादानी हुई’। 2 |
~ अशोक सिंह , न्यू यॉर्क 


****^*****


इस कार्यक्रम का यू-ट्यूब वीडियो देखने के लिए यहाँ क्लिक करिये:

©️सर्वाधिकार सुरक्षित। इस पोस्ट में साझा किए गए सभी गिरह के शे'र 'एक शे'र अर्ज़ किया है' पटल पर शामिल शायरों के हैं। इनमें से कोई भी शे'र शायर की लिखित पूर्व सहमति के बग़ैर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है।

संपादक

~ कौसर भुट्टो, दुबई


 


332 वाँ सप्ताह एक शे’र गिरह-नामा: 1 अगस्त, 2026

 332 वाँ सप्ताह एक शे’र गिरह-नामा: 1 अगस्त, 2026 एक‌ शे'र‌ अर्ज़ किया है’ मंच के साप्ताहिक 2 तरही मिसरों पर आधारित  332 वाँ सप्ताहिक गिरह...