शुक्रवार, 26 जून 2026

326 वाँ सप्ताह एक शे’र गिरह-नामा: 20 जून, 2026

326 वाँ सप्ताह एक शे’र गिरह-नामा: 20 जून, 2026

एक‌ शे'र‌ अर्ज़ किया है’ मंच के साप्ताहिक 2 तरही मिसरों पर आधारित 326 वाँ सप्ताह गिरह-नामा।

 आज का मुशायरा इन दो मिसरों पर आधारित था:

651 वाँ मिसरा: 'वो मेरे साथ रहा और मुझे कभी न मिला'। 

~ बशीर बद्र


652 वाँ मिसरा: 'किसी आवारा बादल सा गुज़र जा'।

~ राजेंद्र नाथ 'रहबर'


                                 *****^*****

 जायज़ा लीजिए अलग अलग ज़ावियों से इन मिसरों पर लगाई हुई गिरह का;

 651 वें मिसरे: 'वो मेरे साथ रहा और मुझे कभी न मिला'

पर 'एक शे'र अर्ज़ किया है' के शायरों की लगाई गईं गिरह:


किया तलाश जो भीतर था आदमी मुझ में 
'वो मेरे साथ रहा और मुझे कभी न मिला' l
~लक्ष्मी शंकर बाजपेई,  भारत


हमारा क़ुर्ब था कुछ रात और सहर की तरह 
'वो मेरे साथ रहा और मुझे कभी न मिला'l
~डाॅ. आदेश त्यागी, भारत


न जाने कैसा रहा रिश्ता मेरा साथ उसके  
'वो मेरे साथ रहा और मुझे कभी न मिला'।
~ममता 'किरण', भारत


मैं इसको कातिबे तक़दीर की रज़ा समझूँ?
'वो मेरे साथ रहा और मुझे कभी न मिला' l
~सज्जाद अख्तर, भारत


करेगा कौन यकीं हाय इस मुक़द्दर पर!
'वो मेरे साथ रहा और मुझे कभी न मिला’ l
~के पी सक्सेना, भारत


वो मेरा ख़ाब था , अहसास था कि और ही कुछ 
'वो मेरे साथ रहा और मुझे कभी न मिला' l 1 l
~रेनू हुसैन, भारत


निभा रहा था मेरा इश्क़ यूँ रवायत में 
'वो मेरे साथ रहा और मुझे कभी न मिला'l 2 l
~रेनू हुसैन, भारत


अगर बताऊँ हक़ीक़त तो कोई मानेगा 
'वो मेरे साथ रहा और मुझे कभी न मिला' l
~अनिमेष शर्मा, भारत


न जाने कौन से कोने में छुपा था दिल के 
'वो मेरे साथ रहा और मुझे कभी न मिला'l
~ दिगंबर नासवा, मलेशिया


तमाम उम्र उसे ढूँढ़ता रहा ख़ुद में 
‘वो मेरे साथ रहा और मुझे कभी न मिला’ l
~मनोज अबोध, भारत


हमारी जीस्त रही जैसे रेल की पटरी,
'वो मेरे साथ रहा औऱ मुझे कभी न मिला'।
~अनमोल प्रकाश शुक्ला, भारत


नहीं मैं मानती ऐसा जो लोग कहते हैं 
‘वो मेरे साथ रहा और मुझे कभी न मिला’
~डॉ० भावना कुँअर, ऑस्ट्रेलिया


किसी नदी के जैसे साथ दो किनारे हों,
‘वो मेरे साथ रहा और मुझे कभी न मिला’। 1 ।
~ अशोक सिंह, न्यूयॉर्क 


ख़ुदा नहीं तो भला और क्या कहेंगे उसे,
‘वो मेरे साथ रहा और मुझे कभी न मिला’। 2 l
~ अशोक सिंह, न्यूयॉर्क 


अलग अलग ही हमेशा थीं काम की शिफ़्टें, 
‘वो मेरे साथ रहा और मुझे कभी न मिला’। 3 l
~ अशोक सिंह, न्यूयॉर्क 


*✨*☀️**✨**


  652 वें मिसरे: 'किसी आवारा बादल सा गुज़र जा'

 पर 'एक शे'र अर्ज़ किया है' के शायरों की लगाई गईं गिरह:


गुज़रना है हसीनों की गली से,
'किसी आवारा बादल सा गुज़र जा' ।
~अनिमेष शर्मा, भारत


बरसने पर भी कुछ मिलना नहीं है,
 'किसी आवारा बादल सा गुज़र जा' ।
~ दिगंबर नासवा, मलेशिया


जगत की माया में आसक्त मत हो 
'किसी आवारा बादल सा गुज़र जा'।
~डाॅ. आदेश त्यागी, भारत


ये दुनिया चार दिन का इक तमाशा,
 'किसी आवारा बादल सा गुज़र जा'।
~अकबर शाद उदयपुरी, भारत


न ठहर इस दिल के वीराने में अब तू 
“किसी आवारा बादल सा गुज़र जा”
डॉ० भावना कुँअर, ऑस्ट्रेलिया


तुझे रुकना नहीं है उस गली में 
'किसी आवारा बादल सा गुज़र जा' ।
~रेनू हुसैन, भारत


बरसना है नहीं पर उस गली से,  
‘किसी आवारा बादल सा गुज़र जा’।
~ अशोक सिंह , न्यू यॉर्क 


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संपादक

~ कौसर भुट्टो, दुबई


 


बुधवार, 24 जून 2026

325 वाँ सप्ताह एक शे’र गिरह-नामा: 13 जून, 2026

 325 वाँ सप्ताह एक शे’र गिरह-नामा: 13 जून, 2026

एक‌ शे'र‌ अर्ज़ किया है’ मंच के साप्ताहिक 2 तरही मिसरों पर आधारित 322 वाँ सप्ताह गिरह-नामा।

 आज का मुशायरा इन दो मिसरों पर आधारित था:

649 वाँ मिसरा: 'तुम परिंदे  हो वतन छोड़ के जा सकते हो' ।

~अम्मार इक़बाल


 650 वाँ मिसरा: 'रोज़ जीना रोज़ मरना चाहिए'।

~ अंजुम रहबर
                                 *****^*****

 जायज़ा लीजिए अलग अलग ज़ावियों से इन मिसरों पर लगाई हुई गिरह का;

649 वें मिसरे: 'तुम परिंदे  हो वतन छोड़ के जा सकते हो'

पर 'एक शे'र अर्ज़ किया है' के शायरों की लगाई गईं गिरह:


सरहदें तो हैं बनाई गईं मेरी ख़ातिर
‘तुम परिंदे हो वतन छोड़ के जा सकते हो’।
~ प्रज्ञा त्रिवेदी , भारत


हम तो मिट्टी की मुहब्बत में यहाँ रहते हैं 
‘तुम परिंदे हो वतन छोड़ के जा सकते हो’।
~रेनू हुसैन, भारत 


हम हैं इंसान जहाँ जन्मे वहीं मरते हैं,
‘तुम परिंदे हो वतन छोड़ के जा सकते हो’।
~अनिमेष शर्मा, भारत


देश और माँ को नहीं छोड़ के जाते हम लोग 
'तुम परिन्दे हो, वतन छोड़ के जा सकते हो' ।
~डाॅ. आदेश त्यागी, भारत


ये गगन पंख ये परवाज़ तुम्हारा हक़ है 
'तुम परिन्दे हो वतन छोड़ के जा सकते हो' ।
~ दिगंबर नासवा, मलेशिया


मेरी आँखों में तेरे ख़्वाब का रहता है वतन
‘तुम परिंदे हो वतन छोड़ के जा सकते हो’।
~अकबर शाद 'उदयपुरी' भारत


मुझको तो प्यारी है अपने ही वतन की मिट्टी 
‘तुम परिंदे हो वतन छोड़ के जा सकते हो’।
~ममता 'किरण', भारत


हम तो वो पेड़ हैं जो अपनी जड़ों से हैं जुड़े
‘तुम परिंदे हो वतन छोड़ के जा सकते हो’।
~डॉ. भावना कुँअर, ऑस्ट्रेलिया


आसरा तुमको दें वो पेड़ हैं हम गुलशन के
‘तुम परिंदे हो वतन छोड़ के जा सकते हो’।
~प्रगीत कुँअर, ऑस्ट्रेलिया


हमने तो बांध लिया खुद को जड़ों से अपनी
‘तुम परिंदे हो वतन छोड़ के जा सकते हो’।
~सज्जाद अख्तर, भारत


हम तो इंसान हैं, मिट्टी से मुहब्बत हमको,
‘तुम परिंदे हो वतन छोड़ के जा सकते हो’।
~खुर्रम नूर भारत


हम तो मिट्टी से जुड़े बस्ती के बाशिंदे हैं,
‘तुम परिंदे हो वतन छोड़ के जा सकते हो’।
~ अशोक सिंह, न्यूयॉर्क 


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  650 वें मिसरे:  'रोज़ जीना रोज़ मरना चाहिए'

 पर 'एक शे'र अर्ज़ किया है' के शायरों की लगाई गईं गिरह:


रात है मृत्यु सुबह जीवन, यहाँ
'रोज़ जीना रोज़ मरना चाहिए' l
~प्रज्ञा त्रिवेदी ,भारत


फ़लसफ़ा ये भी बहुत अच्छा लगा,
'रोज़ जीना रोज़ मरना चाहिए' l
~अनिमेष शर्मा, भारत


ये भी कोई फिलसफ़ा है दोस्तो!
'रोज़ जीना रोज़ मरना चाहिए’।
~के.पी. सक्सेना, भारत


वो ग़लत है कह रहा है जो ये बात,
‘रोज़ जीना रोज़ मरना चाहिए’।
~अनमोल प्रकाश शुक्ला, भारत 


फ़ालतू बकवास झूठा ज्ञान है 
'रोज़ जीना रोज़ मारना चाहिए' l
~ दिगंबर नासवा, मलेशिया


अब तो आदत सी हुई है ज़िंदगी 
‘रोज़ जीना रोज़ मरना चाहिए’।
~रेनू हुसैन, भारत


सीख सूरज से हमें मिलती यही
 'रोज़ जीना रोज़ मरना चाहिए'।
~ममता किरण, भारत


कौन है आख़िर जो कह कर मर गया
'रोज़ जीना, रोज़ मरना चाहिये' l
~डाॅ. आदेश त्यागी, भारत


ज़िंदगी जब बोझ हो जाए तो फिर 
‘रोज़ जीना रोज़ मरना चाहिए’।
~सज्जाद अख्तर, भारत


जिंदगी को खूब जीना चाहिए,
‘रोज़ जीना रोज़ मरना चाहिए’।
~अकबर शाद 'उदयपुरी' भारत


कह गईं लहरें हमारे कान में 
'रोज़ जीना रोज़ मरना चाहिए'l
~डॉ० भावना कुँअर, ऑस्ट्रेलिया


साँस के आवागमन ने ये कहा
 ‘रोज़ जीना रोज़ मरना चाहिए’।
~प्रगीत कुँअर, ऑस्ट्रेलिया


प्यार पाना चाहते हो तुम अगर 
 ‘रोज़ जीना रोज़ मरना चाहिए’।
~प्रेम बिहारी मिश्रा , भारत


चंद पैसों के लिए क्यों आदमी,
 रोज़ जीना रोज़ मरना चाहिए
~आलोक अविरल, भारत


जाने किस ने दे दिया ये फ़लसफ़ा,
‘रोज़ जीना रोज़ मरना चाहिए’।
~ अशोक सिंह , न्यू यॉर्क 


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संपादक

~ कौसर भुट्टो, दुबई


 


सोमवार, 8 जून 2026

324 वाँ सप्ताह एक शे’र गिरह-नामा: 6 जून, 2026

324 वाँ सप्ताह एक शे’र गिरह-नामा: 6 जून, 2026

एक‌ शे'र‌ अर्ज़ किया है’ मंच के साप्ताहिक 2 तरही मिसरों पर आधारित 324 वाँ साप्ताहिक ब्लॉग ।

 आज का मुशायरा इन दो मिसरों पर आधारित था:

 647वाँ मिसरा: 'ये जानता है कि इस दिखावे से दिल-जलों                          में शुमार होगा' ।

~ अल्लामा इक़बाल


648 वाँ मिसरा: 'मगर अंदर से मैं टूटा हुआ हूँ' ।

~ जहाँगीर नायाब


                                 *****^*****

 जायज़ा लीजिए अलग अलग ज़ावियों से इन मिसरों पर लगाई हुई गिरह का;

647 वें मिसरे: 'ये जानता है कि इस दिखावे से दिल-जलों                          में शुमार होगा'  

पर 'एक शे'र अर्ज़ किया है' के शायरों की लगाई गईं गिरह:


चमन में खुश्बू लुटा के फूलों पे मुस्कुराता फिरा है कोई
'ये जानता है कि इस दिखावे से दिल-जलों में शुमार होगा' ।
~अकबर शाद उदयपुरी, भारत 


दिवाना आशिक़ सुलगते दिल का धुआँ उड़ाता फिरे है हर सू  
'ये जानता है कि इस दिखावे से दिलजलों में शुमार होगा'l
~डाॅ. आदेश त्यागी, भारत


ये रोज़ टँकी से कूदने की मुझे ही धमकी जो दे रहा है 
'ये जानता है कि इस दिखावे से दिल-जलों में शुमार होगा' ।
~ दिगंबर नासवा, मलेशिया


पलट पलट कर वो देखे मुझको जुदाई का ग़म नज़र में भर के
'ये जानता है कि इस दिखावे से दिल-जलों में शुमार होगा' ।
~प्रेम बिहारी मिश्रा, भारत


जो मेरे दिल को जला रहा है नज़र से खंजर चला रहा है
'ये जानता है कि इस दिखावे से दिलजलों में शुमार होगा' ।
~अनिमेष शर्मा भारत


बता रहा है ज़माने भर को वो इश्क़े नाकाम की कहानी,
'ये जानता है कि इस दिखावे से दिल-जलों में शुमार होगा' ।
~खुर्रम नूर, भारत


लहू से तस्वीर-ए-ग़म बनाकर दिखा रहा है वो जो सभी को 
‘ये जानता है कि इस दिखावे से दिल-जलों में शुमार होगा’।
~डॉ० भावना कुँअर, ऑस्ट्रेलिया


गली गली में सुना रहा है वो दास्तान-ए-जुदाई अपनी,
‘ये जानता है कि इस दिखावे से दिल-जलों में शुमार होगा’। 
~कौसर भुट्टो,  दुबई 


झुकाया ता’अत में सर जहॉं भी दिखा है नक़्श-ए-पा दिलरुबा का, 
‘ये जानता है कि इस दिखावे से दिल-जलों में शुमार होगा’। 
*ता’अत=उपासना, इबादत, बंदगी
~ अशोक सिंह, न्यूयॉर्क 


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 648 वें मिसरे:  'मगर अन्दर से मैं टूटा हुआ हूँ'

पर 'एक शे'र अर्ज़ किया है' के शायरों की लगाई गईं गिरह:


मैं यकजा और कामिल हूँ ब-ज़ाहिर 
'मगर अन्दर से मैं टूटा हुआ हूँ'।
`डा आदेश त्यागी, भारत


बज़ाहिर है बदन मेरा सलामत 
 'मगर अंदर से मैं टूटा हुआ हूँ' ।
~सज्जाद अख्तर, भारत


सभी को जोड़ के रक्खा है ख़ुद से
 'मगर अंदर से मैं टूटा हुआ हूँ' ।
~प्रज्ञा त्रिवेदी ,भारत


भले होठों पे मेरे कहकहे हैं,
 'मगर अंदर से मैं टूटा हुआ हूँ' ।
~अनमोल प्रकाश शुक्ला, भारत 


मानता हूँ नियम जीने के सारे 
'मगर अंदर से मैं टूटा हुआ हूँ ' । 1 l
~रेनू हुसैन, भारत 


मुसाफह कर रही हूँ सबसे हँस कर,
'मगर अंदर से मैं टूटी हुई हूं' । 2 l
~रेनू हुसैन, भारत 


दिखेगी हर घड़ी मुस्कान रुख पर,
'मगर अंदर से मैं टूटा हुआ हूँ' ।
~अनिमेष शर्मा भारत


कवच पहना हुआ है कर्ण जैसे 
'मगर अंदर से मैं टूटा हुआ हूँ' ।
~ दिगंबर नासवा, मलेशिया


हैं मेरे बाहरी तेवर तो साबुत,
'मगर अंदर से मैं टूटा हुआ हूँ ' ।
~खुर्रम नूर, भारत


अलग ये बात, धड़कन है अभी भी 
'मगर अंदर से मैं टूटा हुआ हूँ' ।
~मनोज 'अबोध', भारत 


मेरी ज़िंदादिली के सब हैं क़ाइल 
'मगर अंदर से मैं टूटा हुआ हूँ' । 1 l
~लक्ष्मी शंकर बाजपेई, भारत


हमेशा फेंकता हूं ऊंची ऊंची 
'मगर अंदर से मैं टूटा हुआ हूँ' । 2 l
~लक्ष्मी शंकर बाजपेई, भारत


भले पत्थर की दिखती हूँ शिला सी 
‘मगर अंदर से मैं टूटी हुई हूँ’।
~डॉ० भावना कुँअर, ऑस्ट्रेलिया


दिलों में वलवले उठते हैं अब भी,
‘मगर अंदर से मैं टूटा हुआ हूँ’।
~ अशोक सिंह , न्यू यॉर्क 


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©️सर्वाधिकार सुरक्षित। इस पोस्ट में साझा किए गए सभी गिरह के शे'र 'एक शे'र अर्ज़ किया है' पटल पर शामिल शायरों के हैं। इनमें से कोई भी शे'र शायर की लिखित पूर्व सहमति के बग़ैर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है।

संपादक

~ कौसर भुट्टो, दुबई


 


गुरुवार, 4 जून 2026

323 वाँ सप्ताह एक शे’र गिरह-नामा: 30 मई, 2026

323 वाँ सप्ताह एक शे’र गिरह-नामा: 30 मई, 2026

एक‌ शे'र‌ अर्ज़ किया है’ मंच के साप्ताहिक 2 तरही मिसरों पर आधारित 323 वाँ साप्ताहिक ब्लॉग ।

 आज का मुशायरा इन दो मिसरों पर आधारित था:

 645 वाँ मिसरा: 'और जब पलटे क़यामत ढा गए'।

~ अहमद नसीम कासमी 


646 वाँ मिसरा: 'राज़ दिल के तो निगाहों से अदा होते हैं'।

 ~ मजरूह सुल्तानपुरी' । 


                                 *****^*****

 जायज़ा लीजिए अलग अलग ज़ावियों से इन मिसरों पर लगाई हुई गिरह का;

645 वें मिसरे: 'और जब पलटे क़यामत ढा गए ' 

पर 'एक शे'र अर्ज़ किया है' के शायरों की लगाई गईं गिरह:


उनके चलने की अदा क़ातिल ही थी 
‘और जब पलटे क़यामत ढा गए’।
~रेनू हुसैन, भारत


इक तरफ़ सिक के थे अध पक्के कबाब, 
'और जब पलटे क़यामत ढा गए'।
खुर्रम नूर भारत


उनकी आमद जैसे रोज़ ए रस्त ख़ेज़
'और जब पलटे क़यामत ढा गए'।
खुर्रम नूर भारत


मुस्कुराये मुझसे थोड़ा दूर चल,
'और जब पलटे क़यामत ढा गए'।
~अनमोल प्रकाश शुक्ला, भारत 


हार कर वो इक क़दम पीछे हटे
'और जब पलटे क़यामत ढा गये' ।
~ममता 'किरण', भारत


आये थे लड़ के क़यामत से करीब
 'और जब पलटे क़यामत ढा गए'।
~ प्रज्ञा त्रिवेदी , भारत


रूबरू थे तो उड़ा रखे थे होश
'और जब पलटे क़यामत ढा गए'।
~ अशोक सिंह, न्यूयॉर्क 


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 646 वें मिसरे: 'राज़ दिल के तो निगाहों से अदा होते हैं ' 

 पर 'एक शे'र अर्ज़ किया है' के शायरों की लगाई गईं गिरह:


दिल के अफ़्साने ज़ुबाँ तक नहीं आया करते,
'राज़ दिल के तो निगाहों से अदा होते हैं'।
~अकबर शाद उदयपुरी, भारत 


फेर लो, ढक लो, छुपा लो, न इन्हें पढ़ने दो 
'राज़ दिल के तो निगाहों से अदा होते हैं'।
~ दिगंबर नासवा, मलेशिया


लाख कोशिश करो पर न छुपा पाओगे
‘राज़ दिल के तो निगाहों से अदा होते हैं’।
~आलोक अविरल, भारत


इश्क़ लफ़्ज़ों का तो हर्गिज़ भी नहीं है मोहताज
'राज़ दिल के तो निगाहों से अदा होते हैं'। 1 l
~प्रज्ञा त्रिवेदी ,भारत


छुप न पाएंगे तबस्सुम के लिफ़ाफ़ों में ग़म
'राज़ दिल के तो निगाहों से अदा होते हैं'। 2 l
~प्रज्ञा त्रिवेदी ,भारत


आप ये बात न पूछें कि मुहब्बत है क्या,
 'राज़ दिल के तो निगाहों से अदा होते हैं'।
~अनिमेष शर्मा भारत


मुझसे मत पूछ मेरे दर्द भरे दिल का सबब
'राज़ दिल के तो निगाहों से अदा होते हैं'।
~रेनू हुसैन, भारत 


करते गप-शप न लब-ए-नम ये मोहब्बत में कोई,
‘राज़ दिल के तो निगाहों से अदा होते हैं’।
~ अशोक सिंह , न्यू यॉर्क 


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©️सर्वाधिकार सुरक्षित। इस पोस्ट में साझा किए गए सभी गिरह के शे'र 'एक शे'र अर्ज़ किया है' पटल पर शामिल शायरों के हैं। इनमें से कोई भी शे'र शायर की लिखित पूर्व सहमति के बग़ैर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है।

संपादक

~ कौसर भुट्टो, दुबई


 


मंगलवार, 26 मई 2026

322 वाँ सप्ताह एक शे’र गिरह-नामा: 23 मई, 2026

322 वाँ सप्ताह एक शे’र गिरह-नामा: 23 मई, 2026

एक‌ शे'र‌ अर्ज़ किया है’ मंच के साप्ताहिक 2 तरही मिसरों पर आधारित 322 वाँ सप्ताह गिरह-नामा।

 आज का मुशायरा इन दो मिसरों पर आधारित था:

643 वाँ मिसरा: 'दिलों के खेल में ख़ुद्दारियां नहीं चलती' । 

~ कैफ़ भोपाली 


644 वाँ मिसरा: 'प्यार की मदहोश खुशबू का खजाना चाहिए' ।

~ रवींद्र प्रकाश हंस' । 

                                 *****^*****

 जायज़ा लीजिए अलग अलग ज़ावियों से इन मिसरों पर लगाई हुई गिरह का;

643 वें मिसरे: 'दिलों के खेल में ख़ुद्दारियां नहीं चलती'

पर 'एक शे'र अर्ज़ किया है' के शायरों की लगाई गईं गिरह:


निभा सको तो निभाओ ज़रा सा झुक करके
 'दिलों के खेल में ख़ुद्दारियां नहीं चलती' ।
~ प्रज्ञा त्रिवेदी , भारत


ग़ुरूर-ओ-ज़ात नहीं पूछती मोहब्बत भी,
 'दिलों के खेल में ख़ुद्दारियां नहीं चलती' । 1 ।
~अकबर शाद 'उदयपुरी' भारत


कभी जो टूट के चाहो तो खुद समझ जाओ,
  'दिलों के खेल में ख़ुद्दारियां नहीं चलती' । 2 l
~अकबर शाद 'उदयपुरी' भारत


बुरा नही है ये चिसमिश अगर लड़े भी अब
 'दिलों के खेल में ख़ुद्दारियां नहीं चलती' । 3 l
~अकबर शाद 'उदयपुरी' भारत


यहां तो हार में भी जश्न जीत का होगा
 'दिलों के खेल में ख़ुद्दारियां नहीं चलती' ।
~सज्जाद अख्तर, भारत


ख़ुदी के सख़्त उसूलों का इश्क़ में क्या काम 
'दिलों के खेल में ख़ुद्दारियाँ नहीं चलतीं' ।
~डाॅ. आदेश त्यागी, भारत


सरों के बल भी मुहब्बत में चलना पड़ता है 
 'दिलों के खेल में ख़ुद्दारियां नहीं चलती' ।
~ दिगंबर नासवा, मलेशिया


कि बाज़ वक्त अना को भुलाना पड़ता है 
 'दिलों के खेल में ख़ुद्दारियां नहीं चलती'।
~ममता 'किरण', भारत


मुझे ख़बर ही नहीं ख़ुद की भी सिवा उसके
 ‘दिलों के खेल में ख़ुद्दारियां नहीं चलतीं’।
~रेनू हुसैन, भारत 


अना का काम कोई हैं नहीं मोहब्बत में,
‘दिलों के खेल में ख़ुद्दारियां नहीं चलतीं’।
~ अशोक सिंह, न्यूयॉर्क 


*✨*☀️**✨**


 644 वें मिसरे: 'प्यार की मदहोश खुशबू का खजाना चाहिए'

 पर 'एक शे'र अर्ज़ किया है' के शायरों की लगाई गईं गिरह:



नाम लिख्खे जाएँगे, वे सामने आएँ, जिन्हें 
'प्यार की मदहोश खुशबू का खजाना चाहिए'।
~मनोज 'अबोध', भारत 


नाम तुम लिक्खो न लिक्खो आशिकों में पर हमें
'प्यार की मदहोश खुशबू का खजाना चाहिए'।
~अनिमेष शर्मा, भारत


चाँदनी रातों को सर पहलू में रखकर आपका,
'प्यार की मदहोश खुशबू का खजाना चाहिए'।
~अनमोल प्रकाश शुक्ला, भारत 


वो चला सरहद प तो उसने कहा ये, कब मुझे
'प्यार की मदहोश खुशबू का खजाना चाहिए'। 1 l
~रेनू हुसैन, भारत 


और कुछ ज़्यादा नहीं पर एक ख़्वाहिश है मेरी 
'प्यार की मदहोश खुशबू का खजाना चाहिए'। 2 l
~रेनू हुसैन, भारत


दूर से ही कर सकूँ महसूस जिसको बा-रहा
'प्यार की मदहोश खुशबू का खजाना चाहिए'।
~प्रज्ञा त्रिवेदी ,भारत


यूँ न केवल सन्दली साँसों की बख़्शिश से नवाज़ 
'प्यार की मदहोश ख़ुशबू का ख़ज़ाना चाहिये' ।
~डाॅ. आदेश त्यागी, भारत


आप दो या आप दो या आप दो हमको तो बस 
'प्यार की मदहोश खुशबू का खजाना चाहिए'।
~ दिगंबर नासवा, मलेशिया


सोने चॉंदी के ख़ज़ाने की नहीं हमको तलब
'प्यार की मदहोश खुशबू का खजाना चाहिए'।
~ममता किरण, भारत


चाहतों की दिल को अब भीनी महक काफ़ी नहीं, 
'प्यार की मदहोश खुशबू का ख़ज़ाना चाहिए' ।
~खुर्रम नूर, भारत


इस दिल-ए-ख़ुश-फ़ह्‌म को बस है यही ज़िद आजकल,
‘प्यार की मदहोश ख़ुशबू का ख़जाना चाहिए’।
~ अशोक सिंह , न्यू यॉर्क 


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इस कार्यक्रम का यू-ट्यूब वीडियो देखने के लिए यहाँ क्लिक करिये:



©️सर्वाधिकार सुरक्षित। इस पोस्ट में साझा किए गए सभी गिरह के शे'र 'एक शे'र अर्ज़ किया है' पटल पर शामिल शायरों के हैं। इनमें से कोई भी शे'र शायर की लिखित पूर्व सहमति के बग़ैर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है।

संपादक

~ कौसर भुट्टो, दुबई


 


मंगलवार, 19 मई 2026

321 वाँ सप्ताह एक शे’र गिरह-नामा: 16 मई, 2026

321 वाँ सप्ताह एक शे’र गिरह-नामा:  16 मई, 2026

एक‌ शे'र‌ अर्ज़ किया है’ मंच के साप्ताहिक 2 तरही मिसरों पर आधारित  321 वाँ सप्ताह एक शे’र गिरह-नामा।

 आज का  गिरह-नामा इन दो मिसरों पर आधारित है:

 641 वाँ मिसरा: 'आधी बात का उल्टा मतलब होता है'।

~ इनाम आज़मी' 


642 वाँ मिसरा: 'कोई रंग भरने को जी चाहता है'। 

~ शकील बदायूनी' 

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 जायज़ा लीजिए अलग अलग ज़ावियों से इन मिसरों पर लगाई हुई गिरह का;

641वें मिसरे:  'आधी बात का उल्टा मतलब होता है' 

पर 'एक शे'र अर्ज़ किया है' के शायरों की लगाई गईं गिरह:


बेग़म बोलें 'क्या बोले' तो यूँ समझो,
‘आधी बात का उल्टा मतलब होता है’। 1 ।
~अनमोल प्रकाश शुक्ला, भारत 


किसने क्या समझा तुमने जो कुछ भी कहा,
‘आधी बात का उल्टा मतलब होता है’। 2 ।
~अनमोल प्रकाश शुक्ला, भारत 


कुछ तो खुलकर मेरे आगे बोलो तुम
‘आधी बात का उल्टा मतलब होता है’।
~ अकबर शाद उदयपुरी, भारत


सीधे सीधे पूरी बातें कह दो तुम
‘आधी बात का उल्टा मतलब होता है’।
~ अकबर शाद उदयपुरी, भारत


देखो, तुम यूँ काम न लो कम-लफ़्ज़ी से
'आधी बात का उल्टा मतलब होता है'।
~डाॅ. आदेश त्यागी, भारत


इसीलिए तो बोली है आधी मैंने 
‘आधी बात का उल्टा मतलब होता है’।
~ दिगंबर नासवा, मलेशिया


 क्या जाता गर बात जो पूरी कह जाते!
'आधी बात का उल्टा मतलब होता है’।
~के पी सक्सेना, भारत 


पूरी बात बता देते तो अच्छा था
‘आधी बात का उल्टा मतलब होता है’।
~अनिमेष शर्मा, भारत


काश वो करने दे देता बातें पूरी
‘आधी बात का उल्टा मतलब होता है’।
~ प्रज्ञा त्रिवेदी , भारत


आप क्यों ही करते हैं बातें आधी 
‘आधी बात का उल्टा मतलब होता है’।
~रेनू हुसैन, भारत


जो सूनी पड़ी ज़ीस्त की है ये चादर,
‘आधी बात का उल्टा मतलब होता है’। 
~ममता 'किरण', भारत


उल्टी बात करो तो आधी ही करना, 
‘आधी बात का उल्टा मतलब होता है’। 1 ।
~ अशोक सिंह, न्यूयॉर्क 


आधी बात समझनी होती है मुश्किल,
‘आधी बात का उल्टा मतलब होता है’। 2 ।
~ अशोक सिंह, न्यूयॉर्क 


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 642 वें मिसरे: 'कोई रंग भरने को जी चाहता है'।

 ~ शकील बदायूनी 

 पर 'एक शे'र अर्ज़ किया है' के शायरों की लगाई गईं गिरह:


बुझी जा रही है मोहब्बत की लौ भी,
‘कोई रंग भरने को जी चाहता है’।
अकबर शाद उदयपुरी, भारत


सफ़ेद ओ सियह उनकी तस्वीर में अब
‘कोई रंग भरने को जी चाहता है’।
~प्रज्ञा त्रिवेदी ,भारत


वरक़ ज़िन्दगी का है बे-रंग कब से 
‘कोई रंग भरने को जी चाहता है’।
~ दिगंबर नासवा, मलेशिया


नहीं देखी जाती है वीरानी दिल की
‘कोई रंग भरने को जी चाहता है’।
~लक्ष्मी शंकर बाजपेई, भारत


मुझे दिल के कोरे से काग़ज़ में अब तो 
‘कोई रंग भरने को जी चाहता है’।
~रेनू हुसैन, भारत 


हैं बरसों से बे-रंग जीवन का ख़ाका  
'कोई रंग भरने को जी चाहता है'। 
~डाॅ. आदेश त्यागी, भारत


अभी तक है कोरा मेरे दिल का काग़ज़
'कोई रंग भरने को जी चाहता है'।
~अनिमेष शर्मा 'आतिश'


नहीं देखी जाती बहुत सादगी भी
'कोई रंग भरने को जी चाहता है’।
~के पी सक्सेना, भारत 


जो फीकी हुई है ये रिश्तों की रंगत 
‘कोई रंग भरने को जी चाहता है’।
~ममता किरण, भारत


वो ग़मगीन सूनी सी आँखों में उसकी,
‘कोई रंग भरने को जी चाहता है’।
~अनमोल प्रकाश शुक्ला, भारत 


तेरी श्वेत साड़ी कचोटे है दिल को, 
‘कोई रंग भरने को जी चाहता है’।
~खुर्रम नूर भारत


जो गुलबुन को भी गुल की ख़ुशबू से भर दे,
‘कोई रंग भरने को जी चाहता है’। 1 l
~ अशोक सिंह , न्यू यॉर्क 


सफ़ेद उनकी ज़ुल्फ़ें हुई इस क़दर हैं, 
‘कोई रंग भरने को जी चाहता है’। 2 l
~ अशोक सिंह , न्यू यॉर्क 


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इस कार्यक्रम का यू-ट्यूब वीडियो देखने के लिए यहाँ क्लिक करिये:


©️सर्वाधिकार सुरक्षित। इस पोस्ट में साझा किए गए सभी गिरह के शे'र 'एक शे'र अर्ज़ किया है' पटल पर शामिल शायरों के हैं। इनमें से कोई भी शे'र शायर की लिखित पूर्व सहमति के बग़ैर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है।

संपादक

~ कौसर भुट्टो, दुबई


 


गुरुवार, 14 मई 2026

320 वाँ सप्ताह - एक शे’र गिरह-नामा: 9 मई, 2026

320 वाँ सप्ताह - एक शे’र गिरह-नामा:  9 मई, 2026

एक‌ शे'र‌ अर्ज़ किया है’ मंच के साप्ताहिक 2 तरही मिसरों पर आधारित  320 वें सप्ताह का गिरह-नामा ।

 आज का  गिरह-नामा इन दो मिसरों पर आधारित है:

 639 वाँ मिसरा: ''अपनी तनख्वाह कई बार गिनी है मैंने " । 

~ नुसरत सिद्दीकी


640 वाँ मिसरा: ''किसी सूरत मेरी चाहत की उस तक भी ख़बर जाए" । 

~ डॉ० तृप्ति मिश्रा 

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 जायज़ा लीजिए अलग अलग ज़ावियों से इन मिसरों पर लगाई हुई गिरह का;

639 वें मिसरे:  'अपनी तनख्वाह कई बार गिनी है मैंने' 

पर 'एक शे'र अर्ज़ किया है' के शायरों की लगाई गईं गिरह:


नोट दो सौ का है ग़ायब तो कहूँ किससे मैं,
‘अपनी तनख़्वाह कई बार गिनी है मैंने’। 1 ।
~अनमोल प्रकाश शुक्ला, भारत 


उसको इतना ,उसे इतना ,उसे इतना देना,
‘अपनी तनख़्वाह कई बार गिनी है मैंने’। 2 ।
~अनमोल प्रकाश शुक्ला, भारत 


यार इस बार उधारी न चुका पाऊंगा,
‘अपनी तनख़्वाह कई बार गिनी है मैंने’।
~के पी सक्सेना, भारत 


दस्तख़त जिस पे किए उतनी लिफ़ाफ़े में मिली 
‘अपनी तनख़्वाह कई बार गिनी है मैंने’।
~ दिगंबर नासवा, मलेशिया


हर खुशी सोच के लेनी पड़ी किस्तों में मुझे,
‘अपनी तनख़्वाह कई बार गिनी है मैंने’। 1 ।
~अकबर शाद उदयपुरी, भारत


दोस्त ही देंगे सहारा तो गुज़ारा होगा,
‘अपनी तनख़्वाह कई बार गिनी है मैंने’। 2 ।
~अकबर शाद उदयपुरी, भारत


ख़्वाहिशो! और किसी दिल में बसो अब जाकर
‘अपनी तनख़्वाह कई बार गिनी है मैंने’। 1 ।
~सज्जाद अख्तर, भारत


इस महीने भी मुझे क़र्ज़ की पीनी होगी
‘अपनी तनख़्वाह कई बार गिनी है मैंने’। 2 ।
~सज्जाद अख्तर, भारत


तू बिरहमन है मेरे बच्चे कोई शौक़ न रख
'अपनी तनख़्वाह कई बार गिनी है मैं ने'।
~डाॅ. आदेश त्यागी, भारत


कर तो रक्खा है डिनर देने का वादा लेकिन 
‘अपनी तनख़्वाह कई बार गिनी है मैंने’।
~ लक्ष्मी शंकर बाजपेई, भारत


फ़ासला जेब औ ज़रूरत का है बढ़ता जाता
‘अपनी तनख़्वाह कई बार गिनी है मैंने’।
~ प्रज्ञा त्रिवेदी , भारत


मेरे खर्चों से सदा रहती है थोड़ी सी कम,
‘अपनी तनख़्वाह कई बार गिनी है मैंने’।
~खुर्रम नूर भारत


खर्च इस बार भी मुश्किल से ही चल पाएगा 
‘अपनी तनख़्वाह कई बार गिनी है मैंने’।
~रेनू हुसैन, भारत 


तुमको इस बार भी शॉपिंग न करा पाऊँगा 
‘अपनी तनख़्वाह कई बार गिनी है मैंने’।
~मनोज 'अबोध', भारत


हैसियत है नहीं खर्चे करूं पूरे घर के 
‘अपनी तनख़्वाह कई बार गिनी है मैंने’। 1 ।
~ममता 'किरण', भारत


पैसा छुट्टी का लगे काट लिया है उसने,
 ‘अपनी तनख़्वाह कई बार गिनी है मैंने’। 2 ।
~ममता 'किरण', भारत


शौक़ पर खर्च करूँ कैसे ये मुमकिन ही नहीं
‘अपनी तनख़्वाह कई बार गिनी है मैंने’।
~अनिमेष शर्मा 'आतिश', भारत


कम पड़ी है ये हमेशा ही सभी खर्चों से
‘अपनी तनख़्वाह कई बार गिनी है मैंने’।
आलोक अविरल, भारत


एक भी नोट इधर से न उधर कर देना,
‘अपनी तनख़्वाह कई बार गिनी है मैंने’।
~ अशोक सिंह, न्यूयॉर्क 


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 640 वें मिसरे:  'किसी सूरत मेरी चाहत की उस तक भी ख़बर जाए ' 

 पर 'एक शे'र अर्ज़ किया है' के शायरों की लगाई गईं गिरह:


नहीं कुछ और सूझे है सिवा इसके कि ऐ ऑका,
'किसी सूरत मेरी चाहत की उस तक भी ख़बर जाए’।
~के पी सक्सेना, भारत 


उसे ही प्यार करता हूँ उसी पर जाँ छिड़कता हूँ 
'किसी सूरत मेरी चाहत की उस तक भी ख़बर जाए'।
~ दिगंबर नासवा, मलेशिया


उठा ले काश मेरा ख़त जो फेंका राह में उसकी,
'किसी सूरत मेरी चाहत की उस तक भी ख़बर जाए '।
~अनमोल प्रकाश शुक्ला, भारत 


मेरी दीवानगी का उसको शायद ही पता होगा 
'किसी सूरत मेरी चाहत की उस तक भी ख़बर जाए '।
~लक्ष्मी शंकर बाजपेई, भारत


कबूतर, नामाबर, ईमेल, मोबाइल हो या कुछ हो 
'किसी सूरत मेरी चाहत की उस तक भी ख़बर जाये'।
~डाॅ. आदेश त्यागी, भारत


वो डरता है मुहब्बत से मुझे ये इल्म है फिर भी
'किसी सूरत मेरी चाहत की उस तक भी ख़बर जाए'।
~प्रज्ञा त्रिवेदी ,भारत


मैं देखूँ उसको जी भरके मेरे हो सामने दिलबर 
'किसी सूरत मेरी चाहत की उस तक भी ख़बर जाए’।
~रेनू हुसैन, भारत


उसी की याद रखता हूं मैं अपनी हर दुआओं में,
'किसी सूरत मेरी चाहत की उस तक भी ख़बर जाए’।
~अकबर शाद उदयपुरी, भारत


बुलाओ प्रेस को तुम,मैं इधर ‘टंकी’ पे चढ़ता हूँ 
‘किसी सूरत मेरी चाहत की उस तक भी ख़बर जाए’।
~मनोज 'अबोध', भारत 


मैं हर पल रब से अब ये ही दुआ बस करती रहती हूं 
'किसी सूरत मेरी चाहत की उस तक भी ख़बर जाए'।
~ममता किरण, भारत


सरे महफ़िल जो उसने दफ़अतन मुङ मुड़ के देखा है
'किसी सूरत मेरी चाहत की उस तक भी ख़बर जाए'।
~अनिमेष शर्मा 'आतिश', भारत 


 हमें कहना नहीं आता वो आंखें पढ़ नहीं सकता,
'किसी सूरत मेरी चाहत की उस तक भी ख़बर जाए' । 1 ।
~कौसर भुट्टो, दुबई


 मेरी बेचैनियों का कुछ असर उस दिल पे भी तो हो,
'किसी सूरत मेरी चाहत की उस तक भी ख़बर जाए'। 2 ।
~कौसर भुट्टो, दुबई


हवाओं में घटाओं में धनक की इन शुआओं में, 
‘किसी सूरत मेरी चाहत की उस तक भी ख़बर जाए’।
~ अशोक सिंह , न्यू यॉर्क 


****^*****
इस कार्यक्रम का यू-ट्यूब वीडियो देखने के लिए यहाँ क्लिक करिये:



©️सर्वाधिकार सुरक्षित। इस पोस्ट में साझा किए गए सभी गिरह के शे'र 'एक शे'र अर्ज़ किया है' पटल पर शामिल शायरों के हैं। इनमें से कोई भी शे'र शायर की लिखित पूर्व सहमति के बग़ैर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है।

संपादक

~ कौसर भुट्टो, दुबई


 


332 वाँ सप्ताह एक शे’र गिरह-नामा: 1 अगस्त, 2026

 332 वाँ सप्ताह एक शे’र गिरह-नामा: 1 अगस्त, 2026 एक‌ शे'र‌ अर्ज़ किया है’ मंच के साप्ताहिक 2 तरही मिसरों पर आधारित  332 वाँ सप्ताहिक गिरह...